टी.वी. कपाली शास्त्री: श्री अरविंद के वैदिक दर्शन के भाष्यकार और तंत्र-विद्या के मर्मज्ञ
एक विस्तृत शोधपरक और आध्यात्मिक विश्लेषण: वह विद्वान जिसने 'सिद्धाञ्जन' के माध्यम से सिद्ध किया कि वेद और तंत्र विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य की दो धाराएं हैं (The Bridge between Veda and Tantra)
महर्षि अरविंद ने वेदों की 'मनोवैज्ञानिक व्याख्या' (Psychological Interpretation) अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत की थी, जिसे पाश्चात्य जगत ने सराहा। लेकिन भारत के रूढ़िवादी पंडित इसे तब तक स्वीकार करने को तैयार नहीं थे जब तक कि यह **संस्कृत** में और **शास्त्रीय विधि** से न लिखा जाए। इस महान कार्य को पूरा करने वाले विद्वान थे—टी.वी. कपाली शास्त्री (T.V. Kapali Sastry)।
कपाली शास्त्री एक अद्भुत व्यक्तित्व थे—वे एक पारंपरिक संस्कृत पंडित थे, एक उच्च कोटि के **तांत्रिक साधक** थे, और श्री अरविंद के **पूर्ण योग** (Integral Yoga) के अनुयायी थे। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ **'सिद्धाञ्जन'** (Siddhanjana) के माध्यम से वेदों के आध्यात्मिक अर्थ को व्याकरण और निरुक्त की कसौटी पर सिद्ध किया।
| पूरा नाम | तिरुवोट्रियुर वेंकटरमण कपाली शास्त्री |
| काल | 3 सितंबर 1886 – 1953 |
| जन्म स्थान | मैलापुर, चेन्नई (तमिलनाडु) |
| गुरु | काव्यकण्ठ गणपति मुनि (संस्कृत/तंत्र), श्री अरविंद (योग/दर्शन) |
| महानतम कृति | ऋग्भाष्य-भूमिका, सिद्धाञ्जन (ऋग्वेद भाष्य) |
| अन्य कृतियाँ | Lights on the Veda, Sri Aurobindo: Lights on the Teachings |
| विशेष योगदान | श्री अरविंद के वैदिक दर्शन का संस्कृत में शास्त्रीय प्रतिपादन |
2. जीवन परिचय: मैलापुर से पांडिचेरी तक
कपाली शास्त्री का जन्म एक पारंपरिक वैदिक परिवार में हुआ था। उनके पिता भी संस्कृत के विद्वान थे। बचपन से ही उन्होंने संस्कृत व्याकरण, तर्कशास्त्र और वेदों का गहन अध्ययन किया।
आध्यात्मिक प्यास: वे केवल पांडित्य से संतुष्ट नहीं थे। वे श्री विद्या (Sri Vidya) के उपासक थे। उनकी साधना की प्यास उन्हें पहले रमण महर्षि के आश्रम और अंततः श्री अरविंद आश्रम (पांडिचेरी) ले गई। 1929 में वे स्थायी रूप से श्री अरविंद आश्रम में बस गए और अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक वहीं रहे।
3. गुरु परंपरा: गणपति मुनि और श्री अरविंद
कपाली शास्त्री के जीवन को दो महापुरुषों ने गढ़ा:
- काव्यकण्ठ गणपति मुनि: वे रमण महर्षि के शिष्य और महान संस्कृत कवि थे। कपाली शास्त्री ने उनसे मंत्र शास्त्र और तंत्र की गहराइयां सीखीं। गणपति मुनि ने उन्हें वेदों को एक नई दृष्टि से देखना सिखाया।
- श्री अरविंद: जब शास्त्री जी ने श्री अरविंद के "The Secret of the Veda" को पढ़ा, तो उन्हें लगा कि उन्हें अपनी मंजिल मिल गई है। श्री अरविंद ने उन्हें वह **'दृष्टि'** (Vision) दी, और शास्त्री जी ने उस दृष्टि को **'वाणी'** (Voice/Structure) दी।
4. 'सिद्धाञ्जन': ऋग्वेद का आध्यात्मिक भाष्य
कपाली शास्त्री की अमर कृति **'सिद्धाञ्जन'** (Siddhanjana) है। यह ऋग्वेद के प्रथम अष्टक (First Ashtaka) पर लिखा गया संस्कृत भाष्य है।
'सिद्ध' + 'अञ्जन' = वह अंजन (काजल) जिससे सत्य का दर्शन हो।
1. सायण का आदर और विरोध: उन्होंने आचार्य सायण का सम्मान किया, लेकिन जहाँ सायण ने शब्दों का अर्थ केवल 'यज्ञ' (Ritual) के लिए किया, वहाँ शास्त्री जी ने पाणिनी के व्याकरण का ही प्रयोग करके उनका **'आध्यात्मिक'** अर्थ निकाला।
2. उदाहरण: 'घृत' (Ghee) का अर्थ सायण के लिए 'घी' है, लेकिन शास्त्री जी ने व्युत्पत्ति के आधार पर सिद्ध किया कि इसका अर्थ **'दीप्ति'** (Illumination/Light) भी है।
उन्होंने "ऋग्भाष्य-भूमिका" (Introduction to Rigveda Bhashya) लिखी, जो अपने आप में एक स्वतंत्र ग्रंथ है और वैदिक शोध के नियमों को परिभाषित करता है।
5. वेद और तंत्र का समन्वय
भारतीय परंपरा में अक्सर माना जाता है कि वेद और तंत्र (आगम) विरोधी हैं। कपाली शास्त्री ने इस भ्रांति को तोड़ा।
उन्होंने अपनी पुस्तक "Sadhana of Veda and Tantra" में सिद्ध किया:
- वेद: यह 'ज्ञान' और 'अंतर्दृष्टि' (Vision) है।
- तंत्र: यह उस ज्ञान को पाने की 'तकनीक' (Method/Practice) है।
शास्त्री जी के अनुसार, तंत्र वेदों की अगली कड़ी है। उपनिषदों ने वेदों के 'ज्ञान' को लिया, और तंत्र ने वेदों की 'उपासना' को विकसित किया। उन्होंने श्री विद्या साधना को वैदिक साधना का ही विकसित रूप बताया।
6. 'लाइट्स ऑन द वेद': वैदिक रहस्यों की कुंजी
अंग्रेजी पाठकों के लिए उन्होंने "Lights on the Veda" लिखी। इसमें उन्होंने अत्यंत सरल भाषा में समझाया कि:
- वैदिक ऋषि 'बर्बर' नहीं थे।
- सोम (Soma) केवल शराब नहीं, बल्कि 'आनंद' (Delight of Existence) का रस है।
- वृत्र (Vritra) कोई असुर नहीं, बल्कि अज्ञान का अंधकार है जो हमारे ज्ञान को ढकता है।
7. संस्कृत शैली और साहित्यिक योगदान
कपाली शास्त्री की संस्कृत शैली अत्यंत प्रांजल, गंभीर और व्याकरण सम्मत है। उन्हें आधुनिक युग का **'बाणभट्ट'** या **'पतंजलि'** कहा जा सकता है।
उन्होंने श्री अरविंद की कविताओं का संस्कृत में अनुवाद भी किया। उनका गद्य (Prose) इतना सशक्त है कि पढ़ते समय लगता है कि हम किसी प्राचीन ऋषि को पढ़ रहे हैं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि संस्कृत एक 'मृत भाषा' नहीं है, बल्कि उसमें आधुनिकतम दार्शनिक विचारों (जैसे Supermind/अतिमानस) को व्यक्त करने की पूरी क्षमता है।
8. निष्कर्ष: आधुनिक ऋषि
टी.वी. कपाली शास्त्री एक मौन तपस्वी थे। उन्होंने श्री अरविंद के दर्शन को पारंपरिक विद्वानों के लिए ग्राह्य (Acceptable) बनाया।
आज यदि हम यह कह सकते हैं कि "वेदों में केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि योग है", और इसे व्याकरण के आधार पर सिद्ध कर सकते हैं, तो यह कपाली शास्त्री जी की तपस्या का फल है। वे भारतीय ज्ञान परंपरा की उस कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो दिखाती है कि **'नया'** (Modernity) **'पुराने'** (Tradition) का विरोधी नहीं, बल्कि उसका विस्तार है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Siddhanjana (Commentary on Rigveda) - T.V. Kapali Sastry (Sri Aurobindo Kapali Sastry Institute of Vedic Culture).
- Lights on the Veda - T.V. Kapali Sastry.
- Collected Works of T.V. Kapali Sastry (Vol 1-2).
- Veda, Upanishad and Tantra - M.P. Pandit (His disciple).
