डॉ. आर.एन. दांडेकर: वैदिक बिब्लियोग्राफी के निर्माता और इंडोलॉजी के भीष्म पितामह
एक विस्तृत अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह विद्वान जिसने पुणे के 'भंडारकर इंस्टिट्यूट' को विश्व प्रसिद्ध बनाया और वेदों के 'इतिहासवादी' (Evolutionary) स्वरूप को परिभाषित किया (The Doyen of Modern Indology)
- 1. प्रस्तावना: संस्कृत अध्ययन के वैश्विक राजदूत
- 2. जीवन परिचय: सातारा से हीडलबर्ग तक
- 3. 'वैदिक बिब्लियोग्राफी': एक असम्भव कार्य
- 4. महाभारत का समीक्षात्मक संस्करण (Critical Edition)
- 5. 'विकासात्मक पौराणिक शास्त्र' (Evolutionary Mythology)
- 6. 'श्रौतकोष': वैदिक यज्ञों का विश्वकोश
- 7. BORI और अकादमिक नेतृत्व
- 8. निष्कर्ष: ज्ञान के संगठक
बीसवीं शताब्दी में भारतीय प्राच्य विद्या (Indology) को यदि किसी एक व्यक्ति ने **'संगठित'** (Organized) किया, तो वे थे **डॉ. रामचंद्र नारायण दांडेकर** (Dr. R.N. Dandekar)। वे लगभग 60 वर्षों तक पुणे के प्रतिष्ठित **भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI)** के मानद सचिव रहे।
उनका योगदान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था। उन्होंने दुनिया भर के संस्कृत विद्वानों को एक मंच पर लाया। लेकिन उनका सबसे महान अकादमिक कार्य **"Vedic Bibliography"** (वैदिक ग्रंथ सूची) है, जो इंटरनेट के बिना गूगल (Google) जैसा कार्य था। उन्होंने वेदों पर हुए हर छोटे-बड़े शोध को सूचीबद्ध किया।
| पूरा नाम | रामचंद्र नारायण दांडेकर |
| काल | 17 मार्च 1909 – 11 दिसंबर 2001 |
| जन्म स्थान | सातारा, महाराष्ट्र |
| शिक्षा | डेक्कन कॉलेज (पुणे), हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी (जर्मनी) |
| कर्मभूमि | भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI), पुणे |
| महानतम कृति | Vedic Bibliography (6 Volumes), Srautakosa |
| विशेष योगदान | महाभारत का समीक्षात्मक संस्करण (Critical Edition), वर्ल्ड संस्कृत कॉन्फ्रेंस के संस्थापक |
| सम्मान | पद्म भूषण (1962), साहित्य अकादमी पुरस्कार |
2. जीवन परिचय: सातारा से हीडलबर्ग तक
डॉ. दांडेकर का जन्म 1909 में सातारा में एक विद्वान परिवार में हुआ था। उन्होंने पुणे के डेक्कन कॉलेज से संस्कृत में एम.ए. किया। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें जर्मनी के **हीडलबर्ग विश्वविद्यालय** (Heidelberg University) भेजा गया।
जर्मन प्रभाव: जर्मनी में उन्होंने ऐतिहासिक-आलोचनात्मक पद्धति (Historical-Critical Method) सीखी। वहां वे मैक्स मूलर की परंपरा के विद्वानों के संपर्क में आए। भारत लौटने पर वे फर्ग्यूसन कॉलेज और बाद में पुणे विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष बने। लेकिन उनकी आत्मा हमेशा **BORI** (भंडारकर संस्थान) में बसी रही, जहाँ उन्होंने 1939 से 1994 तक सचिव के रूप में कार्य किया।
3. 'वैदिक बिब्लियोग्राफी': एक असम्भव कार्य
डॉ. दांडेकर का सबसे बड़ा और अद्वितीय योगदान "Vedic Bibliography" है।
कल्पना कीजिए कि इंटरनेट नहीं है और आपको पता करना है कि "1800 से 1990 के बीच दुनिया की किसी भी भाषा (अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, हिंदी) में 'ऋग्वेद के अग्नि सूक्त' पर कितने लेख लिखे गए हैं?"
डॉ. दांडेकर ने अकेले दम पर इस जानकारी को इकट्ठा किया। उन्होंने 6 विशाल खंडों में **हजारों शोध पत्रों और पुस्तकों** की सूची बनाई।
- इसमें लेखक का नाम, प्रकाशन वर्ष और विषय का संक्षिप्त विवरण है।
- आज भी दुनिया का कोई भी वैदिक शोधकर्ता अपना काम शुरू करने से पहले 'दांडेकर की बिब्लियोग्राफी' देखता है। यह एक बौद्धिक स्मारक है।
4. महाभारत का समीक्षात्मक संस्करण (Critical Edition)
BORI का सबसे महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट था—महाभारत की हजारों पांडुलिपियों (Manuscripts) को इकट्ठा करके उसका **'शुद्धतम पाठ'** (Critical Edition) तैयार करना। यह कार्य 1919 से 1966 तक चला।
डॉ. दांडेकर इस प्रोजेक्ट के प्रमुख स्तंभों में से थे। उन्होंने स्वयं दो महत्वपूर्ण पर्वों का संपादन किया:
1. शल्य पर्व (Salyaparvan)
2. अनुशासन पर्व (Anushasanaparvan)
उनकी सूक्ष्म दृष्टि ने यह निर्धारित किया कि कौन सा श्लोक वेद व्यास का मूल है और कौन सा बाद में जोड़ा गया (प्रक्षिप्त) है।
5. 'विकासात्मक पौराणिक शास्त्र' (Evolutionary Mythology)
वेदों के देवताओं (इंद्र, अग्नि, वरुण) की व्याख्या में डॉ. दांडेकर ने एक नया सिद्धांत दिया जिसे **'विकासात्मक पौराणिक शास्त्र'** (Evolutionary Mythology) कहते हैं।
पश्चिमी विद्वान (मैक्स मूलर) इंद्र को 'वर्षा का देवता' (Nature Myth) मानते थे।
डॉ. दांडेकर ने तर्क दिया: "इंद्र मूल रूप से एक **ऐतिहासिक मानव नायक** (Hero) था, जिसने आर्यों का नेतृत्व किया। उसकी वीरता के कारण बाद में उसे 'वर्षा का देवता' और अंत में 'ब्रह्मांडीय शक्ति' बना दिया गया।"
इसे **'एंथ्रोपोमोर्फिज्म'** (Anthropomorphism) का उल्टा क्रम माना गया। इसी तरह उन्होंने 'विष्णु' और 'रुद्र' के विकास को समझाया।
6. 'श्रौतकोष': वैदिक यज्ञों का विश्वकोश
डॉ. दांडेकर ने **"Srautakosa"** (Encyclopedia of Vedic Rituals) का संपादन किया।
वेदों का एक बड़ा भाग यज्ञ-विधियों (Rituals) से भरा है जो अत्यंत जटिल हैं। श्रौतकोष में उन्होंने:
- अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, सोमयाग आदि यज्ञों की विधियों का संस्कृत और अंग्रेजी में विस्तृत वर्णन किया।
- यह ग्रंथ बताता है कि वैदिक काल में यज्ञशाला का नक्शा कैसा होता था और मंत्रों का विनियोग कैसे होता था।
7. BORI और अकादमिक नेतृत्व
डॉ. दांडेकर एक महान **संगठनकर्ता** (Organizer) थे।
- AIOC: वे 'अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन' (All India Oriental Conference) के महासचिव रहे।
- World Sanskrit Conference: उन्होंने 'इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ संस्कृत स्टडीज' की स्थापना की और दुनिया भर में संस्कृत सम्मेलनों का आयोजन किया।
- BORI: उनके कार्यकाल में भंडारकर इंस्टिट्यूट दुनिया में इंडोलॉजी का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। वे संस्थान की 'आंख और कान' थे।
8. निष्कर्ष: ज्ञान के संगठक
डॉ. आर.एन. दांडेकर 2001 में 92 वर्ष की आयु में दिवंगत हुए। वे एक ऐसे 'सेतु' थे जिन्होंने पारंपरिक संस्कृत पंडितों और आधुनिक पश्चिमी विद्वानों को जोड़ा।
उनकी कार्यशैली जर्मन विद्वानों जैसी **सटीक** (Precise) और **शुष्क** (Dry - तथ्यों पर आधारित) थी। उन्होंने भावनाओं में बहे बिना वेदों का वैज्ञानिक और ऐतिहासिक विश्लेषण किया। आज यदि दुनिया भर में भारतीय विद्या का सम्मान है, तो इसमें डॉ. दांडेकर के **'वैदिक बिब्लियोग्राफी'** और **'महाभारत प्रोजेक्ट'** की नींव का बहुत बड़ा हाथ है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Vedic Bibliography (Vol 1-6) - R.N. Dandekar (BORI).
- Vedic Mythological Tracts - R.N. Dandekar.
- Insights into Hinduism - R.N. Dandekar.
- The Mahabharata (Critical Edition) - BORI Pune.
