ईश्वर कहाँ मौजूद है?
"बाहर भटकना छोड़िये, उत्तर भीतर है"
परमेश्वर की दुविधा
एक बार सृष्टि के रचयिता, परमपिता परमेश्वर बड़ी दुविधा में पड़ गए। उन्होंने देखा कि मनुष्य जब भी थोड़ी सी मुसीबत में पड़ता है, तो तुरंत भागकर उनके पास आ जाता है। वह कभी शिकायत करता है, तो कभी कुछ न कुछ माँगने लगता है।
परेशान होकर ईश्वर ने सोचा—"मैंने मनुष्य को उसके कर्मानुसार सब कुछ दिया है, फिर भी वह संतुष्ट नहीं है। मेरी तपस्या और शांति में निरंतर व्यवधान पड़ रहा है।"
इस समस्या के निवारण के लिए उन्होंने सभी देवताओं की एक आपातकालीन बैठक बुलाई और पूछा—"हे देवगण! मुझे कोई ऐसा गुप्त स्थान बताएं, जहाँ मनुष्य नाम का यह प्राणी कदापि न पहुँच सके।"
देवताओं के सुझाव
देवताओं ने एक-एक करके अपने विचार रखने शुरू किए:
एक देवता ने कहा: "प्रभु, आप हिमालय पर्वत की सबसे ऊँची चोटी पर चले जाएं।"
ईश्वर का उत्तर: "नहीं, यह स्थान मनुष्य की पहुँच के भीतर है। वह साहसी है, एक दिन वहाँ भी पहुँच जाएगा।"
दूसरे देवता ने कहा: "तो आप समुद्र की गहराइयों में छिप जाएं।"
ईश्वर का उत्तर: "नहीं, मनुष्य बुद्धिमान है। वह तैरना और गोता लगाना सीख जाएगा और वहाँ भी मुझे ढूँढ लेगा।"
तीसरे ने कहा: "आप सुदूर अंतरिक्ष या किसी दूसरे ग्रह पर चले जाएं।"
ईश्वर का उत्तर: "भविष्य में मनुष्य विज्ञान की सहायता से वहाँ भी अवश्य पहुँच जाएगा।"
प्रभु निराश होने लगे थे। क्या ब्रह्मांड में कोई ऐसी जगह नहीं जहाँ शांति मिल सके?
अंतिम निर्णय: हृदय रूपी गुफा
अंत में एक बुद्धिमान देवता मुस्कुराए और बोले—"प्रभु! एक स्थान है जहाँ मनुष्य आपको कभी नहीं ढूँढेगा।"
❤️ मनुष्य का हृदय ❤️
"प्रभु, आप चुपचाप मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ जाएँ। मनुष्य मन्दिर, मस्जिद, पहाड़, आकाश और पाताल—हर जगह आपको ढूँढेगा, लेकिन वह अपने भीतर झांकना भूल जाएगा।"
सुझाव ईश्वर को बहुत पसंद आया। उन्होंने ऐसा ही किया और वे मनुष्य के हृदय में जाकर विराजमान हो गए। उस दिन से मनुष्य ईश्वर को बाहर ढूँढ रहा है, पर वे उसे मिल नहीं रहे हैं।
ईश्वर को कैसे पाएं?
हम ईश्वर को तीर्थों और मूरतों में खोजते हैं, जबकि वह हमारी हर गतिविधि को भीतर से देख रहा है। उसे पाने के लिए बाहर जाने की नहीं, बल्कि अपने अंदर के विकारों (राग-द्वेष, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या) को त्यागने की आवश्यकता है।
"निर्मल मन जन सो मोहिं पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।"
(अर्थात्: मुझे वही पा सकता है जिसका मन निर्मल है, मुझे छल-कपट कतई नहीं भाता।)
कबीर साहेब का अनमोल भजन
संत कबीर ने इसी सत्य को अपने इस प्रसिद्ध भजन में पिरोया है:

