महर्षि कश्यप: सृष्टि के प्रजापति और समस्त चराचर जगत के आदि पिता
(Creation Theory, Genealogy & Ayurvedic Legacy)
यस्मात् सुरासुराद्याश्च जायन्ते सचराचराः॥" अर्थ: मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप सर्वश्रेष्ठ प्रजापति हैं, जिनसे देवता, असुर और समस्त चराचर जगत उत्पन्न हुआ है।
भारतीय संस्कृति और पुराणों के अनुसार, महर्षि कश्यप (Maharishi Kashyapa) सृष्टि के उन महान प्रजापतियों में से एक हैं, जिन्होंने ब्रह्मा की मानसिक सृष्टि को भौतिक स्वरूप प्रदान किया। वे भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र हैं। कश्यप ऋषि को 'सृष्टि का पिता' कहा जाता है क्योंकि ब्रह्मांड के अधिकांश जीव—चाहे वे दिव्य देवता हों, पराक्रमी असुर हों, या रेंगने वाले सर्प—सभी उन्हीं की संतानें हैं। उनका ज्ञान केवल वंशावली तक सीमित नहीं था; वे एक महान वैज्ञानिक और चिकित्सक भी थे।
| पिता | महर्षि मरीचि (ब्रह्मा के मानस पुत्र) |
| माता | देवी कला |
| प्रमुख पत्नियाँ | अदिति, दिति, कद्रू, विनता, दनु आदि (कुल 13) |
| प्रमुख संतानें | आदित्य (देवता), दैत्य, दानव, नाग, गरुड़ |
| मुख्य ग्रंथ | कश्यप संहिता (बाल रोग), कश्यप स्मृति |
| निवास स्थान | कश्मीर (कश्यप-मीर) और हिमालय क्षेत्र |
1. सृष्टि का विस्तार: देवताओं से नागों तक का जन्म
महर्षि कश्यप का विवाह दक्ष प्रजापति की 13 कन्याओं से हुआ था। इन्हीं पत्नियों से समस्त जीव जगत का उदय हुआ:
- अदिति: इनसे 12 आदित्यों (देवताओं) का जन्म हुआ, जिनमें इन्द्र और स्वयं भगवान वामन भी शामिल थे।
- दिति: इनसे दैत्यों (हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप) का जन्म हुआ।
- कद्रू: इनसे नाग वंश (शेषनाग, वासुकी) का प्राकट्य हुआ।
- विनता: इनसे पक्षीराज गरुड़ और अरुण का जन्म हुआ।
- दनु: इनसे दानव कुल का विस्तार हुआ।
2. कश्यप संहिता: बाल रोग चिकित्सा (Pediatrics) के जनक
शिक्षा और बाल विकास में महर्षि कश्यप का योगदान अतुलनीय है। उनके द्वारा रचित 'कश्यप संहिता' आयुर्वेद का वह ग्रंथ है जो विशेष रूप से शिशुओं और गर्भवती महिलाओं की चिकित्सा (Kaumarbhritya) पर केंद्रित है।
- शिशु पोषण: उन्होंने नवजात बच्चों के आहार और उनके विकास के चरणों का वैज्ञानिक वर्णन किया है।
- रोग निदान: बच्चों में होने वाले विभिन्न रोगों और उनके प्राकृतिक उपचारों की विस्तृत व्याख्या इस संहिता में मिलती है।
- संस्कार: गर्भाधान से लेकर जन्म के बाद के संस्कारों का वैज्ञानिक महत्व उन्होंने स्पष्ट किया।
3. कश्यप गोत्र: सर्वव्यापी ऋषि वंश
हिन्दू धर्म में 'कश्यप गोत्र' को सबसे विशाल माना जाता है। कहा जाता है कि "कश्यपो वै कूर्मः" (कश्यप ही कूर्म/आधार है)। यदि किसी व्यक्ति को अपना मूल गोत्र ज्ञात न हो, तो वह 'कश्यप गोत्र' का उच्चारण करता है क्योंकि अंततः समस्त वंशावलियाँ इन्हीं से जुड़ी हैं। कश्मीर का नाम भी ऐतिहासिक रूप से 'कश्यप-मीर' (कश्यप की झील) माना जाता है, जो उनके प्रभाव क्षेत्र को दर्शाता है।
4. निष्कर्ष
महर्षि कश्यप का व्यक्तित्व हमें एकता का संदेश देता है। यद्यपि उनके पुत्र (देवता और असुर) आपस में लड़ते रहे, लेकिन वे उन सभी के पिता थे। वे ज्ञान, करुणा और सृजन के पुंज हैं। एक ओर उन्होंने वेदों की ऋचाओं का दर्शन किया, तो दूसरी ओर 'कश्यप संहिता' के माध्यम से भविष्य की पीढ़ियों (शिशुओं) के स्वास्थ्य की चिंता की। आज का समस्त जीव जगत महर्षि कश्यप के उस तपोबल का ही विस्तार है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- श्रीमद्भागवत महापुराण (षष्ठ स्कन्ध - वंशावली वर्णन)।
- कश्यप संहिता (आयुर्वेद कौमारभृत्य भाग)।
- विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण।
- ऋग्वेद (नवम मण्डल - कुछ सूक्तों के दृष्टा)।
