॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥
चतुर्थोऽध्यायः (शक्रादय स्तुति)
॥ ध्यानम् ॥
ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्।
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥
अर्थ: मैं सिद्धियों की इच्छा रखने वाले पुरुषों द्वारा सेवित और देवताओं से घिरी हुई जया नामक दुर्गा देवी का ध्यान करता हूँ। उनके शरीर की कान्ति काले मेघ के समान है। वे अपने कटाक्षों से शत्रुओं के समूह को भयभीत कर रही हैं। उनके मस्तक पर आबद्ध मुकुट में चन्द्रमा की रेखा सुशोभित है। वे अपने हाथों में शंख, चक्र, तलवार और त्रिशूल धारण किए हुए हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे सिंह के कंधे पर सवार हैं और अपने तेज से सम्पूर्ण त्रिभुवन को परिपूर्ण कर रही हैं।
ॐ ऋषिरुवाच ॥१॥
शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये
तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या ।
तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा
वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥२॥
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या
निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या ।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥३॥
यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो
ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च ।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ॥४॥
तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या ।
तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा
वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥२॥
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या
निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या ।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥३॥
यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो
ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च ।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय
नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ॥४॥
अर्थ: महर्षि मेधा कहते हैं - अत्यंत पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर और उसकी असुर-सेना के देवी द्वारा मारे जाने पर, इन्द्र आदि देवता जिनके शरीर प्रसन्नता के कारण रोमांचित हो रहे थे, अपने सिर और कंधों को झुकाकर भगवती की स्तुति करने लगे: "जिस देवी ने अपनी शक्ति से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है और जो समस्त देवताओं की सम्मिलित शक्ति का ही साकार रूप हैं, उन सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियों द्वारा पूजनीय जगदम्बा को हम भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं। वे हमारा कल्याण करें। जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन भगवान शेषनाग, ब्रह्मा और शिवजी भी नहीं कर सकते, वे भगवती चण्डिका सम्पूर्ण जगत् के पालन और अशुभ भय के नाश का विचार करें।"
या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥५॥
किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत्
किञ्चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि ।
किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि
सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥६॥
हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै-
र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा ।
सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत-
मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ॥७॥
पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा
तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥५॥
किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत्
किञ्चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि ।
किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि
सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥६॥
हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै-
र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा ।
सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत-
मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ॥७॥
अर्थ: "जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं 'लक्ष्मी' रूप से, पापियों के यहाँ 'दरिद्रता' (अलक्ष्मी) रूप से, शुद्ध अन्तःकरण वाले पुरुषों के हृदय में 'सद्बुद्धि' रूप से, सत्पुरुषों में 'श्रद्धा' रूप से तथा कुलीन मनुष्यों में 'लज्जा' रूप से निवास करती हैं, उन भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं। हे देवि! आप इस सम्पूर्ण विश्व का पालन करें। हे देवि! हम आपके इस अचिन्त्य रूप का, असुरों का नाश करने वाले आपके भारी पराक्रम का तथा देवताओं और असुरों के सामने युद्ध में दिखाए गए आपके अद्भुत चरित्रों का कैसे वर्णन करें? आप सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण हैं। आपमें सत्त्व, रज और तम तीनों गुण मौजूद हैं, फिर भी आप इन दोषों से सर्वथा मुक्त हैं। भगवान विष्णु और शिव भी आपका पार नहीं पा सकते। यह सम्पूर्ण जगत् आपका ही अंश है, क्योंकि आप आद्या और अव्याकृत परमा प्रकृति हैं।"
यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन
तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि ।
स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु-
रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥८॥
या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्वं
अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः ।
मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै-
र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि ॥९॥
शब्दात्मिका सुविमलग्यजुषां निधान-
मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम् ।
देवी त्रयी भगवती भवभावनाय
वार्ता च सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री ॥१०॥
मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा
दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा ।
श्रीः कैटभारिहृदयैकाकृताधिवासा
गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥११॥
तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि ।
स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु-
रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥८॥
या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्वं
अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः ।
मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै-
र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि ॥९॥
शब्दात्मिका सुविमलग्यजुषां निधान-
मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम् ।
देवी त्रयी भगवती भवभावनाय
वार्ता च सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री ॥१०॥
मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा
दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा ।
श्रीः कैटभारिहृदयैकाकृताधिवासा
गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥११॥
अर्थ: "हे देवि! जिसके उच्चारण मात्र से समस्त देवता सभी यज्ञों में तृप्ति प्राप्त करते हैं, वह 'स्वाहा' आप ही हैं। इसके अतिरिक्त आप पितरों की तृप्ति का कारण 'स्वधा' भी हैं। जो मोक्ष की प्राप्ति का साधन है, जिसका व्रत अत्यंत महान और अचिन्त्य है तथा जिसे जितेन्द्रिय और दोषरहित मुनि मोक्ष की इच्छा से अभ्यास करते हैं, वह परम भगवती 'विद्या' (ब्रह्मविद्या) आप ही हैं। आप ही शब्द-स्वरूपा हैं, आप ही अत्यंत निर्मल ऋग्वेद, यजुर्वेद और मनोहर पदों वाले सामवेद का आधार हैं। आप ही तीनों वेदमयी (त्रयी) भगवती हैं। आप ही जगत् की उत्पत्ति और पालन करने वाली 'वार्ता' (कृषि, व्यापार आदि) हैं तथा संपूर्ण दुखों का नाश करने वाली हैं। हे देवि! आप ही संपूर्ण शास्त्रों का सार जानने वाली 'मेधा' (बुद्धि) हैं। आप ही दुर्गम भवसागर से पार उतारने वाली नौका रूप 'दुर्गा' हैं। आप ही भगवान विष्णु के वक्षःस्थल में निवास करने वाली 'श्री' (लक्ष्मी) और भगवान शिव द्वारा सम्मानित 'गौरी' (पार्वती) हैं।"
ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र-
बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् ।
अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि
वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥१२॥
दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल-
मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः ।
प्राणान् मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं
कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥१३॥
देवि प्रसीद परमा भवती भवाय
सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि ।
विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत-
न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ॥१४॥
ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां
तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः ।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा
येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥१५॥
बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् ।
अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि
वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥१२॥
दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल-
मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः ।
प्राणान् मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं
कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥१३॥
देवि प्रसीद परमा भवती भवाय
सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि ।
विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत-
न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ॥१४॥
ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां
तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः ।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा
येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥१५॥
अर्थ: "आपका मुख मंद मुस्कान से युक्त, निर्मल, पूर्ण चन्द्रमा के समान और उत्तम सुवर्ण की कांति से चमकने वाला है। यह अत्यंत आश्चर्य की बात है कि महिषासुर ने ऐसे सुंदर मुख को देखकर भी क्रोध में आकर उस पर प्रहार किया। हे देवि! इससे भी बड़ा आश्चर्य तो यह है कि जब आपका वही मुख क्रोध से भयानक हो गया और उदय होते हुए चंद्रमा की तरह लाल हो गया, तब उसे देखकर महिषासुर के तुरंत प्राण क्यों नहीं निकल गए? भला क्रोध में भरे हुए काल को देखकर कौन जीवित रह सकता है? हे परमेश्वरि! आप प्रसन्न हों। आप प्रसन्न होने पर संसार का कल्याण करती हैं और क्रोधित होने पर कुलों का तुरंत नाश कर देती हैं। यह बात अभी प्रत्यक्ष देखी गई है कि आपने महिषासुर की इतनी विशाल सेना को पल भर में नष्ट कर दिया। जिन पर आप प्रसन्न होती हैं, वे ही देश में सम्मानित होते हैं, उन्हीं को धन और यश मिलता है, उनका धर्म कभी नष्ट नहीं होता और वे ही अपने स्त्री, पुत्रों और सेवकों के साथ धन्य माने जाते हैं।"
धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्म्मा-
ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति ।
स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादा-
ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥१६॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥१७॥
एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते
कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् ।
संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु
मत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि ॥१८॥
दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म
सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् ।
लोकान् प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता
इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ॥१९॥
खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः
शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम् ।
यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड-
योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत् ॥२०॥
ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति ।
स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादा-
ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥१६॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥१७॥
एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते
कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् ।
संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु
मत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि ॥१८॥
दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म
सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् ।
लोकान् प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता
इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ॥१९॥
खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः
शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम् ।
यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड-
योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत् ॥२०॥
अर्थ: "हे देवि! आपकी कृपा से ही पुण्यात्मा पुरुष प्रतिदिन अत्यंत आदरपूर्वक सभी धर्मानुकूल कर्म करता है और उसके प्रभाव से स्वर्ग को जाता है। इसलिए आप तीनों लोकों में मनोवांछित फल देने वाली हैं। हे दुर्गे! स्मरण करने पर आप सब प्राणियों के भय हर लेती हैं और स्वस्थ (भयरहित) पुरुषों द्वारा चिंतन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दुःख, दरिद्रता और भय को हरने वाली हे देवि! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा दया से भरा रहता हो? इन असुरों के मारे जाने से संसार को सुख मिलता है। 'भले ही इन्होंने नरक में ले जाने वाले पाप किए हों, लेकिन मेरे द्वारा युद्ध में मारे जाकर ये सीधे स्वर्ग को प्राप्त हों'—यही सोचकर आप शत्रुओं का वध करती हैं। आप चाहें तो अपनी दृष्टि मात्र से ही सभी असुरों को भस्म कर सकती हैं, फिर भी जो आप शत्रुओं पर अस्त्र-शस्त्र चलाती हैं, उसका उद्देश्य यही है कि आपके शस्त्रों से पवित्र होकर ये शत्रु भी उत्तम लोकों में जाएँ। शत्रुओं के प्रति भी आपके विचार कितने उत्तम हैं! आपके खड्ग और त्रिशूल की भयंकर चमक से असुरों की आँखें अंधी क्यों नहीं हो गईं? इसका कारण यही है कि वे उस समय चंद्रमा के समान शीतल और सुंदर आपके मुख के दर्शन कर रहे थे।"
दुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं
रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः ।
वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां
वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ॥२१॥
केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य
रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र ।
चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा
त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ॥२२॥
त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन
त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा ।
नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तम-
स्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते ॥२३॥
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके ।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥२४॥
प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे ।
भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥२५॥
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते ।
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥२६॥
रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः ।
वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां
वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ॥२१॥
केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य
रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र ।
चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा
त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ॥२२॥
त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन
त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा ।
नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तम-
स्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते ॥२३॥
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके ।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥२४॥
प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे ।
भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥२५॥
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते ।
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥२६॥
अर्थ: "हे देवि! आपका स्वभाव दुराचारियों के बुरे आचरण को शांत करने वाला है। आपका रूप अचिन्त्य और अतुलनीय है। आपका पराक्रम देवताओं का बल छीनने वाले असुरों का नाश करने वाला है। आपने शत्रुओं पर भी इस प्रकार दया ही प्रकट की है। आपके इस पराक्रम की तुलना किससे की जा सकती है? शत्रुओं को भयभीत करने वाला और देखने में इतना मनमोहक रूप और कहाँ है? हे वरदायिनी देवि! हृदय में दया और युद्ध में कठोरता—ये दोनों बातें तीनों लोकों में केवल आपमें ही देखी गई हैं। आपने शत्रुओं का नाश करके इस संपूर्ण त्रिलोकी की रक्षा की है। युद्धभूमि में उन शत्रुओं को मारकर आपने उन्हें भी स्वर्ग पहुँचा दिया और उन्मत्त असुरों से होने वाले हमारे भय को भी दूर कर दिया। आपको नमस्कार है। हे देवि! आप त्रिशूल से हमारी रक्षा करें। हे अम्बिके! खड्ग से हमारी रक्षा करें। घंटे की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें। हे चण्डिके! अपने त्रिशूल को घुमाकर पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर दिशा में हमारी रक्षा करें। आपके जो सौम्य (शांत) और अत्यंत घोर रूप तीनों लोकों में विचरते हैं, उनके द्वारा हमारी और इस पृथ्वी की रक्षा करें।"
खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके ।
करपल्लवसङ्गीनि तैरुस्मान् रक्ष सर्वतः ॥२७॥
ऋषिरुवाच ॥२८॥
एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः ।
अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥२९॥
भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैः सुधूपिता ।
प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ॥३०॥
देव्युवाच ॥३१॥
व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम् ।
ददाम्यहमतिप्रीत्या स्तवैरेभिः सुपूजिता ॥३२॥
देवा ऊचुः ॥३३॥
करपल्लवसङ्गीनि तैरुस्मान् रक्ष सर्वतः ॥२७॥
ऋषिरुवाच ॥२८॥
एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः ।
अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥२९॥
भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैः सुधूपिता ।
प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ॥३०॥
देव्युवाच ॥३१॥
व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम् ।
ददाम्यहमतिप्रीत्या स्तवैरेभिः सुपूजिता ॥३२॥
देवा ऊचुः ॥३३॥
अर्थ: "हे अम्बिके! आपके कोमल हाथों में जो खड्ग, शूल, गदा आदि अस्त्र-शस्त्र शोभा पाते हैं, उन सबके द्वारा आप सब ओर से हमारी रक्षा करें।"
महर्षि मेधा कहते हैं— देवताओं ने जब इस प्रकार जगन्माता दुर्गा की स्तुति की और नंदनवन के दिव्य पुष्पों तथा गंध-चंदन आदि से उनका पूजन किया, और भक्तिपूर्वक दिव्य धूप जलाई, तब प्रसन्न मुख वाली देवी ने उन सभी विनम्र देवताओं से कहा:
देवी बोलीं— "हे देवताओ! तुम सब मुझसे अपनी इच्छानुसार वर मांगो। तुम्हारी इन स्तुतियों से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ और बड़े प्रेम से तुम्हें वह वर दूँगी।"
महर्षि मेधा कहते हैं— देवताओं ने जब इस प्रकार जगन्माता दुर्गा की स्तुति की और नंदनवन के दिव्य पुष्पों तथा गंध-चंदन आदि से उनका पूजन किया, और भक्तिपूर्वक दिव्य धूप जलाई, तब प्रसन्न मुख वाली देवी ने उन सभी विनम्र देवताओं से कहा:
देवी बोलीं— "हे देवताओ! तुम सब मुझसे अपनी इच्छानुसार वर मांगो। तुम्हारी इन स्तुतियों से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ और बड़े प्रेम से तुम्हें वह वर दूँगी।"
भगवत्या कृतं सर्वं न किञ्चिदवशिष्यते ।
यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः ॥३४॥
यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि ।
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः ॥३५॥
यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ।
तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् ॥३६॥
वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥३७॥
ऋषिरुवाच ॥३८॥
इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः ।
तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥३९॥
इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा ।
देव्याः शरीरेभ्यो सुरगणानां शिवङ्करी ॥४०॥
पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत् ।
वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥४१॥
रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी ।
तच्छृणुष्व मयाख्यातं यथावत् कथयामि ते ॥४२॥
यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः ॥३४॥
यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि ।
संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः ॥३५॥
यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ।
तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् ॥३६॥
वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥३७॥
ऋषिरुवाच ॥३८॥
इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽऽत्मनः ।
तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥३९॥
इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा ।
देव्याः शरीरेभ्यो सुरगणानां शिवङ्करी ॥४०॥
पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत् ।
वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥४१॥
रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी ।
तच्छृणुष्व मयाख्यातं यथावत् कथयामि ते ॥४२॥
अर्थ: देवता बोले— "हे भगवती! आपने हमारा महान शत्रु महिषासुर मारकर हमारा सब कार्य सिद्ध कर दिया है, अब कुछ भी शेष नहीं है। फिर भी हे महेश्वरि! यदि आप हमें कोई वर देना ही चाहती हैं, तो हम जब भी आपका स्मरण करें, आप आकर हमारी भारी विपत्तियों का नाश कर दिया करें। हे निर्मल मुख वाली अम्बिके! जो भी मनुष्य इन स्तुतियों के द्वारा आपकी प्रार्थना करे, आप उस पर प्रसन्न होकर उसकी संपत्ति, धन, वैभव और स्त्री-पुत्र आदि की सदा वृद्धि करें।"
महर्षि मेधा कहते हैं— "हे राजन्! देवताओं द्वारा संसार और अपने कल्याण के लिए इस प्रकार प्रार्थना करने पर, भद्रकाली 'तथास्तु' (ऐसा ही होगा) कहकर वहीं अंतर्ध्यान (लुप्त) हो गईं। हे राजन्! यह मैंने तुम्हें सुनाया कि पूर्वकाल में देवताओं का कल्याण करने वाली वे देवी देवताओं के शरीरों (तेज) से किस प्रकार प्रकट हुई थीं। अब, देवताओं का उपकार करने वाली वे भगवती दुष्ट दैत्यों शुम्भ और निशुम्भ का वध करने तथा तीनों लोकों की रक्षा करने के लिए जिस प्रकार गौरी (पार्वती) के शरीर से प्रकट हुई थीं, वह प्रसंग मैं तुमसे कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनो।"
महर्षि मेधा कहते हैं— "हे राजन्! देवताओं द्वारा संसार और अपने कल्याण के लिए इस प्रकार प्रार्थना करने पर, भद्रकाली 'तथास्तु' (ऐसा ही होगा) कहकर वहीं अंतर्ध्यान (लुप्त) हो गईं। हे राजन्! यह मैंने तुम्हें सुनाया कि पूर्वकाल में देवताओं का कल्याण करने वाली वे देवी देवताओं के शरीरों (तेज) से किस प्रकार प्रकट हुई थीं। अब, देवताओं का उपकार करने वाली वे भगवती दुष्ट दैत्यों शुम्भ और निशुम्भ का वध करने तथा तीनों लोकों की रक्षा करने के लिए जिस प्रकार गौरी (पार्वती) के शरीर से प्रकट हुई थीं, वह प्रसंग मैं तुमसे कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनो।"
