जिस प्रकार घोर अंधकारमयी रात्रि के पश्चात जब प्रातःकाल सूर्य का उदय होता है, तो संपूर्ण संसार प्रकाश और ऊर्जा से भर उठता है, ठीक उसी प्रकार मथुरा के कारागार की उस कालिमामयी रात्रि के पश्चात जब गोकुल में प्रातःकाल हुआ, तो वह कोई साधारण सवेरा नहीं था। आज स्वयं 'आनंद' ने ही नन्दबाबा के घर अवतार लिया था। वसुदेव जी रात के अंधकार में ही यशोदा मैया की बगल में परब्रह्म श्रीकृष्ण को सुलाकर मथुरा लौट गए थे। जब प्रातःकाल माता यशोदा की निद्रा टूटी और उन्होंने अपने पास लेटे हुए उस नीलमणि (नीले रंग के अत्यंत सुंदर) शिशु को देखा, तो उनके हर्ष का कोई पार न रहा। यह शुभ समाचार वायु के वेग से नन्दबाबा के पास पहुँचा कि "मैया ने लाला को जन्म दिया है।" यहाँ से उस दिव्य 'नन्द महोत्सव' का आरम्भ होता है, जिसकी गूंज आज भी ब्रज की गलियों में सुनाई देती है。
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध का पंचम अध्याय नन्द महोत्सव (बधाई) के उल्लास का ऐसा जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है, जिसे पढ़कर भक्त का हृदय भाव-विभोर हो जाता है। आइए, शुकदेव जी महाराज के श्रीमुख से इस अलौकिक महोत्सव का रसपान करें।
जैसे ही नन्दबाबा ने यह सुना कि उनके घर में वृद्धावस्था में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई है, तो उनके रोम-रोम में आनंद की लहर दौड़ गई। नन्दबाबा अत्यंत उदार और महान हृदय वाले (महामना) थे। उन्होंने तुरंत अपने इष्टदेव का स्मरण किया।
आहूय विप्रान् वेदज्ञान् स्नातः शुचिरलङ्कृतः ॥
यहाँ नन्दबाबा की महानता देखिए। साधारण मनुष्य खुशी में अपना संतुलन खो बैठता है, परंतु नन्दबाबा ने सर्वप्रथम स्नान करके स्वयं को पवित्र किया और फिर धर्म-कर्म के लिए ब्राह्मणों को बुलाया। यह सिद्ध करता है कि सच्ची खुशी वही है जो मनुष्य को ईश्वर और धर्म की ओर ले जाए।
वेदपाठी ब्राह्मणों के गोकुल में पधारते ही वेदमंत्रों की पवित्र ध्वनि गूंजने लगी। नन्दबाबा ने अपने कुल के आचार्यों और ब्राह्मणों को श्रेष्ठ आसनों पर बैठाया और बालक का 'जातकर्म संस्कार' आरंभ किया।
पूजयामास देवांश्च पितॄंश्च भूरिदारुकः ॥
सनातन धर्म में जब भी कोई शिशु जन्म लेता है, तो 'नाल-च्छेदन' (Umbilical cord cutting) से पूर्व जातकर्म संस्कार किया जाता है। ब्राह्मणों ने नन्दबाबा के लाला (श्रीकृष्ण) के दीर्घायु होने, निरोगी रहने और तीनों लोकों में यश प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया। यद्यपि जो काल का भी काल है और सम्पूर्ण जगत का पिता है, आज उस परब्रह्म के लिए ब्राह्मण स्वस्तिवाचन कर रहे थे!
पुत्र जन्म के उल्लास में नन्दबाबा का हृदय इतना विशाल हो गया कि उन्होंने दान की कोई सीमा ही नहीं रखी। 'नन्द' शब्द का अर्थ ही है— जो स्वयं आनंदित होता है और दूसरों को भी आनंद बांटता है।
तिलाद्रीन् सप्त रत्नौघशातकौम्भाम्बरावृतान् ॥
जब यह शुभ समाचार पूरे गोकुल में फैल गया कि नन्द भवन में लाला का जन्म हुआ है, तो संपूर्ण गोकुल नगरी ऐसे सज गई मानो स्वर्ग की अलकापुरी भी उसके सामने फीकी पड़ गई हो। ब्रजवासियों ने अपने-अपने घरों को मांज-धोकर साफ किया।
गाववृषवत्सोपवाटाः स्त्रीदत्तदीपकाः ॥
सभी गलियों में सुगंधित जल और चंदन का छिड़काव किया गया। ब्रज की भूमि, जो अब साक्षात वैकुंठ बन चुकी थी, उसे ब्रजवासियों ने अपने हृदय के प्रेम और बाहरी सजावट दोनों से परिपूर्ण कर दिया।
जैसे ही ब्रज की गोपियों (ग्वालिनों) के कानों में यह मधुर शब्द पड़ा कि "यशोदा मैया ने एक अति सुंदर लाला को जन्म दिया है," तो उनका धैर्य टूट गया। वे अपने घर का सारा कामकाज छोड़कर नन्द भवन की ओर दौड़ीं। भागवतकार श्री शुकदेव जी उनके इस अलौकिक प्रेम और शृंगार का अत्यंत सजीव वर्णन करते हैं:
आत्मानं भूषयाञ्चक्रुर्वासामाल्यपरिच्छदैः ॥
गोपियों के प्रेम की यह हड़बड़ी ऐसी थी कि उन्होंने शृंगार भी ठीक से नहीं किया। किसी गोपी ने एक ही आँख में काजल लगाया और दौड़ने लगी। किसी ने गले का हार कमर में बाँध लिया और पायल हाथों में पहन ली। किसी ने वस्त्र उलटे ही पहन लिए। उन्हें केवल नन्द भवन पहुँचने और लाला के मुख-कमल का दर्शन करने की जल्दी थी।
बलिभिस्त्वरितं जग्मुः पृथुश्रोण्यश्चलत्कुचाः ॥
जब गोपियां नन्द भवन में पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि यशोदा मैया के पलने में नीलकमल के समान अत्यंत सुंदर लाला सो रहा है। भगवान के उस मनमोहक रूप को देखकर गोपियां अपनी सुध-बुध भूल गईं। वे लाला की आरती उतारने लगीं और हृदय से आशीर्वाद देने लगीं। (यह बड़ा श्लोक होने के कारण ४ पंक्तियों में है):
चित्राम्बराः पथि शिखाच्युतमाल्यवर्षाः ।
नन्दालयं सवलया व्रजतीर्विरेजुर्-
व्यालोलकुण्डलपयोधरहारशोभाः ॥
गोपियां लाला के ऊपर हल्दी, तेल और दही का छिड़काव करने लगीं। पूरे नन्द भवन में मंगलगान होने लगा। "नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की" की गूंज से दिशाएं पवित्र हो उठीं।
गोपियों के पश्चात ब्रज के सभी गोप (ग्वाल-बाल) भी अपनी-अपनी गायों का दूध, दही, माखन और अनेक प्रकार के उपहार लेकर नन्द भवन पहुँचे। उन्होंने सुंदर-सुंदर पगड़ियाँ बांधी हुई थीं और उनके अंग-अंग से उत्साह छलक रहा था।
ददौ वासांसि रत्नानि गोपानां च महामनाः ॥
ग्वालों ने उत्साह में आकर एक-दूसरे पर दही, दूध, मक्खन, हल्दी और सुगंधित जल उलीचना शुरू कर दिया। यह ब्रज की प्रसिद्ध 'दधि-काँदो' की होली थी। पूरा नन्द भवन माखन और दही की कीचड़ से सन गया, परंतु वह कीचड़ संसार की सबसे पवित्र वस्तु थी, क्योंकि वह परब्रह्म के प्राकट्य का आनंद था।
इस पूरे उत्सव में एक विशेष पात्र माता 'रोहिणी' भी थीं, जो वासुदेव जी की पत्नी थीं और कंस के भय से गोकुल में नन्दबाबा के आश्रय में गुप्त रूप से रह रही थीं। रोहिणी जी के गर्भ से कुछ दिन पूर्व ही श्री बलराम जी (संकर्षण) का जन्म हुआ था। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो माता रोहिणी का हर्ष दोगुना हो गया।
व्यचरद्दिव्यवासस्रक्कण्ठाभरणभूषिता ॥
रोहिणी जी जानती थीं कि यह लाला कोई और नहीं, उनके ही पति वासुदेव जी का पुत्र है। वे यशोदा जी के साथ मिलकर लाला की नजर उतार रही थीं और सभी अतिथियों का स्वागत कर रही थीं。
जिस घर में स्वयं भगवान नारायण शिशु रूप में आ गए हों, क्या वहाँ किसी ऐश्वर्य या सुख की कमी रह सकती है? नन्द महोत्सव के पश्चात गोकुल की दशा ही बदल गई। जो गोकुल पहले से ही समृद्ध था, अब वह साक्षात वैकुंठ बन गया।
हरेर्निवासात्मगुणै रमाक्रीडमभून्नृप ॥
श्रीमद्भागवत का यह 'नन्द महोत्सव' केवल एक जन्म-दिन का उत्सव नहीं है, यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का उत्सव है। 'नन्द' का अर्थ है— आनंद (सत्-चित्-आनंद), और 'यशोदा' का अर्थ है— यश देने वाली (भक्ति)। जब जीव के हृदय में निश्छल आनंद और पूर्ण भक्ति का मिलन होता है, तभी उस हृदय रूपी गोकुल में परब्रह्म 'श्रीकृष्ण' का प्राकट्य होता है।
और जब ईश्वर हृदय में आ जाते हैं, तो इन्द्रियों रूपी गोप-गोपियां उछलने लगती हैं, विकार शांत हो जाते हैं और जीवन 'महालक्ष्मी' (सद्गुणों) की क्रीड़ा-स्थली बन जाता है। इस कथा का श्रवण और पठन करने से भक्त के जीवन से सभी प्रकार की दरिद्रता दूर होती है और उसे भगवान श्रीकृष्ण की निष्काम भक्ति प्राप्त होती है।

