Nand Mahotsav Katha: Gokul Mein Anand Aur Krishna Janm Badhai Bhagwat puran

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

नन्द भवन में आनंद: नन्द महोत्सव (बधाई) का दिव्य दर्शन और गोकुल की छटा

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 5)

जिस प्रकार घोर अंधकारमयी रात्रि के पश्चात जब प्रातःकाल सूर्य का उदय होता है, तो संपूर्ण संसार प्रकाश और ऊर्जा से भर उठता है, ठीक उसी प्रकार मथुरा के कारागार की उस कालिमामयी रात्रि के पश्चात जब गोकुल में प्रातःकाल हुआ, तो वह कोई साधारण सवेरा नहीं था। आज स्वयं 'आनंद' ने ही नन्दबाबा के घर अवतार लिया था। वसुदेव जी रात के अंधकार में ही यशोदा मैया की बगल में परब्रह्म श्रीकृष्ण को सुलाकर मथुरा लौट गए थे। जब प्रातःकाल माता यशोदा की निद्रा टूटी और उन्होंने अपने पास लेटे हुए उस नीलमणि (नीले रंग के अत्यंत सुंदर) शिशु को देखा, तो उनके हर्ष का कोई पार न रहा। यह शुभ समाचार वायु के वेग से नन्दबाबा के पास पहुँचा कि "मैया ने लाला को जन्म दिया है।" यहाँ से उस दिव्य 'नन्द महोत्सव' का आरम्भ होता है, जिसकी गूंज आज भी ब्रज की गलियों में सुनाई देती है。

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध का पंचम अध्याय नन्द महोत्सव (बधाई) के उल्लास का ऐसा जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है, जिसे पढ़कर भक्त का हृदय भाव-विभोर हो जाता है। आइए, शुकदेव जी महाराज के श्रीमुख से इस अलौकिक महोत्सव का रसपान करें।

1. नन्दबाबा का अपार हर्ष और स्नान-ध्यान

जैसे ही नन्दबाबा ने यह सुना कि उनके घर में वृद्धावस्था में पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई है, तो उनके रोम-रोम में आनंद की लहर दौड़ गई। नन्दबाबा अत्यंत उदार और महान हृदय वाले (महामना) थे। उन्होंने तुरंत अपने इष्टदेव का स्मरण किया।

॥ नन्दबाबा का हर्ष ॥
नन्दस्त्वात्मज उत्पन्ने जाताह्लादो महामनाः ।
आहूय विप्रान् वेदज्ञान् स्नातः शुचिरलङ्कृतः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— राजन्! अपने घर में पुत्र के उत्पन्न होने का समाचार सुनकर नन्दबाबा के हृदय में अपार आनंद की बाढ़ आ गई। वे अत्यंत विशाल हृदय वाले (महामना) थे। उन्होंने तुरंत अत्यंत शुद्ध जल से स्नान किया, पवित्र वस्त्र धारण किए, आभूषणों से स्वयं को अलंकृत किया और वेदपाठी (वेद जानने वाले) ब्राह्मणों को आदरपूर्वक बुलवाया।

यहाँ नन्दबाबा की महानता देखिए। साधारण मनुष्य खुशी में अपना संतुलन खो बैठता है, परंतु नन्दबाबा ने सर्वप्रथम स्नान करके स्वयं को पवित्र किया और फिर धर्म-कर्म के लिए ब्राह्मणों को बुलाया। यह सिद्ध करता है कि सच्ची खुशी वही है जो मनुष्य को ईश्वर और धर्म की ओर ले जाए।

2. जातकर्म संस्कार और स्वस्तिवाचन

वेदपाठी ब्राह्मणों के गोकुल में पधारते ही वेदमंत्रों की पवित्र ध्वनि गूंजने लगी। नन्दबाबा ने अपने कुल के आचार्यों और ब्राह्मणों को श्रेष्ठ आसनों पर बैठाया और बालक का 'जातकर्म संस्कार' आरंभ किया।

॥ जातकर्म संस्कार ॥
वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्म समाचरत् ।
पूजयामास देवांश्च पितॄंश्च भूरिदारुकः ॥
अर्थ: अत्यंत दानी नन्दबाबा ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन (कल्याणकारी वेदमंत्रों का पाठ) करवाया और विधिपूर्वक अपने शिशु का 'जातकर्म संस्कार' संपन्न किया। इसके पश्चात उन्होंने अत्यंत भक्ति-भाव से सभी देवताओं और पितरों की विधिवत पूजा की।

सनातन धर्म में जब भी कोई शिशु जन्म लेता है, तो 'नाल-च्छेदन' (Umbilical cord cutting) से पूर्व जातकर्म संस्कार किया जाता है। ब्राह्मणों ने नन्दबाबा के लाला (श्रीकृष्ण) के दीर्घायु होने, निरोगी रहने और तीनों लोकों में यश प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया। यद्यपि जो काल का भी काल है और सम्पूर्ण जगत का पिता है, आज उस परब्रह्म के लिए ब्राह्मण स्वस्तिवाचन कर रहे थे!

3. नन्दबाबा का महादान: बीस लाख गायों का गोदान

पुत्र जन्म के उल्लास में नन्दबाबा का हृदय इतना विशाल हो गया कि उन्होंने दान की कोई सीमा ही नहीं रखी। 'नन्द' शब्द का अर्थ ही है— जो स्वयं आनंदित होता है और दूसरों को भी आनंद बांटता है।

॥ गोदान का अद्भुत दृश्य ॥
धेनूनां नियुते प्रादाद्विप्रेभ्यः समलङ्कृते ।
तिलाद्रीन् सप्त रत्नौघशातकौम्भाम्बरावृतान् ॥
अर्थ: नन्दबाबा ने ब्राह्मणों को अलंकारों से सजी हुई बीस लाख (दो नियुत) दुधारू गायों का दान किया। इसके साथ ही उन्होंने रत्नों, स्वर्ण (सोने) और रेशमी वस्त्रों से ढके हुए तिलों के सात विशाल पर्वत (तिल के पहाड़) भी दान में दिए।
सोचिए नन्दबाबा का ऐश्वर्य कितना विशाल था! बीस लाख गायें कोई साधारण दान नहीं है। ये सभी गायें स्वस्थ थीं, दुधारू थीं, और उनके सींगों पर सोने का पानी चढ़ा हुआ था। उनके गले में मोतियों की मालाएं थीं और पीठ पर रेशमी वस्त्र पड़े हुए थे। इसके साथ ही तिलों के सात बड़े-बड़े पहाड़ दान किए गए, ताकि तिल के दानों के बराबर ही उनके लाला की आयु में वृद्धि हो।
4. गोकुल नगरी का भव्य शृंगार और सजावट

जब यह शुभ समाचार पूरे गोकुल में फैल गया कि नन्द भवन में लाला का जन्म हुआ है, तो संपूर्ण गोकुल नगरी ऐसे सज गई मानो स्वर्ग की अलकापुरी भी उसके सामने फीकी पड़ गई हो। ब्रजवासियों ने अपने-अपने घरों को मांज-धोकर साफ किया।

॥ गोकुल की सजावट ॥
वितानैर्विविधैर्माल्यैश्चैलपल्लवतोरणैः ।
गाववृषवत्सोपवाटाः स्त्रीदत्तदीपकाः ॥
अर्थ: गोकुल के घर-घर में विविध प्रकार के चंदोवे (Canopies) ताने गए, पुष्पों की मालाएं, रेशमी वस्त्रों और आम के पल्लवों (पत्तों) के तोरण (वंदनवार) बांधे गए। गायों, बैलों और बछड़ों के रहने के स्थानों को सजाया गया और स्त्रियों ने घर-घर में दीप जलाकर मंगल आरती की।

सभी गलियों में सुगंधित जल और चंदन का छिड़काव किया गया। ब्रज की भूमि, जो अब साक्षात वैकुंठ बन चुकी थी, उसे ब्रजवासियों ने अपने हृदय के प्रेम और बाहरी सजावट दोनों से परिपूर्ण कर दिया।

5. ब्रज की गोपियों का आनंद और उनका शृंगार

जैसे ही ब्रज की गोपियों (ग्वालिनों) के कानों में यह मधुर शब्द पड़ा कि "यशोदा मैया ने एक अति सुंदर लाला को जन्म दिया है," तो उनका धैर्य टूट गया। वे अपने घर का सारा कामकाज छोड़कर नन्द भवन की ओर दौड़ीं। भागवतकार श्री शुकदेव जी उनके इस अलौकिक प्रेम और शृंगार का अत्यंत सजीव वर्णन करते हैं:

॥ गोपियों का उल्लास ॥
गोप्य आकर्ण्य मुदिता यशोदायाः सुतोद्भवम् ।
आत्मानं भूषयाञ्चक्रुर्वासामाल्यपरिच्छदैः ॥
अर्थ: माता यशोदा के गर्भ से पुत्र-जन्म का अत्यंत मंगलमय समाचार सुनकर गोपियों का हृदय आनंद से उछल पड़ा। वे अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने तुरंत नए सुंदर वस्त्रों, रंग-बिरंगी पुष्प मालाओं और आभूषणों से अपने आप को सजाना आरंभ कर दिया।

गोपियों के प्रेम की यह हड़बड़ी ऐसी थी कि उन्होंने शृंगार भी ठीक से नहीं किया। किसी गोपी ने एक ही आँख में काजल लगाया और दौड़ने लगी। किसी ने गले का हार कमर में बाँध लिया और पायल हाथों में पहन ली। किसी ने वस्त्र उलटे ही पहन लिए। उन्हें केवल नन्द भवन पहुँचने और लाला के मुख-कमल का दर्शन करने की जल्दी थी।

॥ गोपियों का नन्द भवन की ओर दौड़ना ॥
नवकुङ्कुमकिञ्जल्कमुखपङ्कजभूतयः ।
बलिभिस्त्वरितं जग्मुः पृथुश्रोण्यश्चलत्कुचाः ॥
अर्थ: गोपियों ने अपने कमल-समान मुखमंडलों पर ताजे कुमकुम और केसर का लेप (तिलक) लगाया हुआ था। वे अपने हाथों में अनेक प्रकार की भेंट (उपहार) लेकर नन्द भवन की ओर अत्यंत शीघ्रता से (दौड़ते हुए) जा रही थीं।
6. गोपियों द्वारा लाला को आशीर्वाद और मंगल गान

जब गोपियां नन्द भवन में पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि यशोदा मैया के पलने में नीलकमल के समान अत्यंत सुंदर लाला सो रहा है। भगवान के उस मनमोहक रूप को देखकर गोपियां अपनी सुध-बुध भूल गईं। वे लाला की आरती उतारने लगीं और हृदय से आशीर्वाद देने लगीं। (यह बड़ा श्लोक होने के कारण ४ पंक्तियों में है):

॥ गोपियों का आशीर्वाद ॥
गोप्यः सुमृष्टमणिकुण्डलनिष्ककण्ठ्यश्-
चित्राम्बराः पथि शिखाच्युतमाल्यवर्षाः ।
नन्दालयं सवलया व्रजतीर्विरेजुर्-
व्यालोलकुण्डलपयोधरहारशोभाः ॥
अर्थ: कानों में चमकते हुए मणिमय कुंडल, गले में स्वर्ण के हार और रंग-बिरंगे वस्त्र पहने हुए जब गोपियां मार्ग में दौड़ रही थीं, तो उनकी चोटियों से पुष्पों की वर्षा हो रही थी। नन्द भवन में पहुँचकर उन्होंने बालक को आशीर्वाद दिया— "पाहि चिरं" (हे लाला! तुम चिरंजीवी हो, युगों-युगों तक हमारी रक्षा करो)।

गोपियां लाला के ऊपर हल्दी, तेल और दही का छिड़काव करने लगीं। पूरे नन्द भवन में मंगलगान होने लगा। "नन्द के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की" की गूंज से दिशाएं पवित्र हो उठीं।

7. ग्वाल-बालों का आगमन और दधि-काँदो (हल्दी-दही की होली)

गोपियों के पश्चात ब्रज के सभी गोप (ग्वाल-बाल) भी अपनी-अपनी गायों का दूध, दही, माखन और अनेक प्रकार के उपहार लेकर नन्द भवन पहुँचे। उन्होंने सुंदर-सुंदर पगड़ियाँ बांधी हुई थीं और उनके अंग-अंग से उत्साह छलक रहा था।

॥ ग्वालों का उल्लास ॥
गोपानेवागतान् दृष्ट्वा नन्दः प्रहृष्टमानसः ।
ददौ वासांसि रत्नानि गोपानां च महामनाः ॥
अर्थ: अपने घर पर आए हुए सभी गोपों (ग्वालों) को देखकर नन्दबाबा का मन अत्यंत प्रसन्न हो गया। उस महामना नन्द ने उन सभी ग्वालों का आदर-सत्कार किया और उन्हें अनेक प्रकार के मूल्यवान वस्त्र, आभूषण और रत्न उपहार स्वरूप प्रदान किए।

ग्वालों ने उत्साह में आकर एक-दूसरे पर दही, दूध, मक्खन, हल्दी और सुगंधित जल उलीचना शुरू कर दिया। यह ब्रज की प्रसिद्ध 'दधि-काँदो' की होली थी। पूरा नन्द भवन माखन और दही की कीचड़ से सन गया, परंतु वह कीचड़ संसार की सबसे पवित्र वस्तु थी, क्योंकि वह परब्रह्म के प्राकट्य का आनंद था।

8. माता रोहिणी का शृंगार और वात्सल्य

इस पूरे उत्सव में एक विशेष पात्र माता 'रोहिणी' भी थीं, जो वासुदेव जी की पत्नी थीं और कंस के भय से गोकुल में नन्दबाबा के आश्रय में गुप्त रूप से रह रही थीं। रोहिणी जी के गर्भ से कुछ दिन पूर्व ही श्री बलराम जी (संकर्षण) का जन्म हुआ था। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो माता रोहिणी का हर्ष दोगुना हो गया।

॥ माता रोहिणी की प्रसन्नता ॥
रोहिण्यपि महाभागा नन्दगोपाभिनन्दिता ।
व्यचरद्दिव्यवासस्रक्कण्ठाभरणभूषिता ॥
अर्थ: परम भाग्यशालिनी माता रोहिणी भी, जिनका नन्दबाबा ने अत्यंत आदर और अभिनंदन किया था, उस दिन दिव्य वस्त्रों, सुंदर पुष्प मालाओं और गले के अत्यंत कीमती आभूषणों से सज-धजकर नन्द भवन के उस महान उत्सव में आनंदपूर्वक विचरण कर रही थीं।

रोहिणी जी जानती थीं कि यह लाला कोई और नहीं, उनके ही पति वासुदेव जी का पुत्र है। वे यशोदा जी के साथ मिलकर लाला की नजर उतार रही थीं और सभी अतिथियों का स्वागत कर रही थीं。

9. गोकुल में महालक्ष्मी का स्थायी निवास

जिस घर में स्वयं भगवान नारायण शिशु रूप में आ गए हों, क्या वहाँ किसी ऐश्वर्य या सुख की कमी रह सकती है? नन्द महोत्सव के पश्चात गोकुल की दशा ही बदल गई। जो गोकुल पहले से ही समृद्ध था, अब वह साक्षात वैकुंठ बन गया।

॥ गोकुल बना वैकुंठ ॥
तत आरभ्य नन्दस्य व्रजः सर्वसमृद्धिमान् ।
हरेर्निवासात्मगुणै रमाक्रीडमभून्नृप ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— हे राजा परीक्षित! उसी दिन से नन्दबाबा का वह ब्रज (गोकुल) सभी प्रकार की धन-धान्य और समृद्धियों से परिपूर्ण हो गया। क्योंकि अब वह साक्षात श्रीहरि (भगवान श्रीकृष्ण) का निवास स्थान बन गया था, इसलिए उनके स्वाभाविक गुणों के कारण महालक्ष्मी (रमा) ने ब्रज को अपना स्थायी क्रीड़ा-स्थल (निवास) बना लिया।
महालक्ष्मी वहीं निवास करती हैं, जहाँ उनके पति श्रीहरि होते हैं। जब भगवान ही नन्द भवन में पलने में झूलने लगे, तो लक्ष्मी जी गोकुल की गायों में, ब्रज की रज में, गोपियों के आभूषणों में और नन्दबाबा के खजाने में हमेशा-हमेशा के लिए बस गईं। गोकुल का कण-कण आनंद और ऐश्वर्य से भर उठा।
कथा का आध्यात्मिक रहस्य (सार)

श्रीमद्भागवत का यह 'नन्द महोत्सव' केवल एक जन्म-दिन का उत्सव नहीं है, यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का उत्सव है। 'नन्द' का अर्थ है— आनंद (सत्-चित्-आनंद), और 'यशोदा' का अर्थ है— यश देने वाली (भक्ति)। जब जीव के हृदय में निश्छल आनंद और पूर्ण भक्ति का मिलन होता है, तभी उस हृदय रूपी गोकुल में परब्रह्म 'श्रीकृष्ण' का प्राकट्य होता है।

और जब ईश्वर हृदय में आ जाते हैं, तो इन्द्रियों रूपी गोप-गोपियां उछलने लगती हैं, विकार शांत हो जाते हैं और जीवन 'महालक्ष्मी' (सद्गुणों) की क्रीड़ा-स्थली बन जाता है। इस कथा का श्रवण और पठन करने से भक्त के जीवन से सभी प्रकार की दरिद्रता दूर होती है और उसे भगवान श्रीकृष्ण की निष्काम भक्ति प्राप्त होती है।

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