भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्धरात्रि का वह परम पुनीत समय! मथुरा के उस लौह-कारागार में जब देवकी जी के आठवें गर्भ से साक्षात परब्रह्म परमात्मा ने अवतार लिया, तो दिशाएं मुस्कुरा उठीं, आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और गंधर्व मधुर गान करने लगे। वह कोई साधारण शिशु नहीं था, वह साक्षात नारायण का चतुर्भुज रूप था। इस अध्याय में हम उस अद्भुत रात्रि का विस्तार से दर्शन करेंगे, जब वसुदेव जी ने उस परम शक्ति को एक सूप (टोकरी) में रखकर उफनती यमुना को पार किया और कंस के हाथों से छूटकर कैसे देवी योगमाया ने अपने अष्टभुजा रूप में उसे मृत्यु की चेतावनी दी।
जब वसुदेव जी ने देवकी के पास उस अत्यंत सुंदर और तेजमय शिशु को देखा, तो वे विस्मित रह गए। बालक के चार हाथ थे, जिनमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। गले में कौस्तुभ मणि चमक रही थी और वे पीताम्बर धारण किए हुए थे। वसुदेव जी समझ गए कि यह साक्षात ईश्वर हैं। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान की स्तुति आरंभ की:
केवलानुभवानन्दस्वरूपः सर्वबुद्धिदृक् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.3.13)
वसुदेव जी के पश्चात माता देवकी ने भी भगवान की अत्यंत करुण स्तुति की। देवकी ने कहा— "प्रभो! यह कंस अत्यंत दुष्ट है। यदि उसे पता चल गया कि आपने जन्म लिया है, तो वह अपने हथियार लेकर आ जाएगा। कृपा करके आप अपने इस अलौकिक चतुर्भुज रूप को छिपा लीजिए और एक साधारण शिशु बन जाइए।"
भगवान ने मुस्कुराते हुए अपने माता-पिता को उनके पूर्व जन्म (सुतपा और पृश्नि) की तपस्या का स्मरण कराया और उन्हें बताया कि उनकी इच्छा पूरी करने के लिए ही उन्होंने तीसरी बार उनके पुत्र के रूप में अवतार लिया है। इसके पश्चात भगवान ने अपनी ईश्वरीय लीला का आरंभ करते हुए वसुदेव जी को एक अत्यंत रहस्यमयी आज्ञा दी:
जातां तस्यां सुतां चादायागच्छ त्वरितं मयि ॥
(श्रीमद्भागवत 10.3.45)
इतना कहकर भगवान तत्काल एक साधारण नवजात शिशु बन गए। भगवान की आज्ञा पाते ही वसुदेव जी ने उस परम अद्भुत बालक को एक सूप (टोकरी) में रखा और उसे अपने सिर पर उठा लिया।
जैसे ही वसुदेव जी शिशु रूपी परब्रह्म को लेकर कारागार से बाहर निकलने को उद्यत हुए, भगवान की योगमाया ने अपना अपार प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया।
सुप्ताः प्रमत्ताः पालाश्च द्वारपाश्चापि सर्वशः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.3.48)
कारागार के वे बड़े-बड़े लोहे के दरवाजे, जिनमें भारी ताले और जंजीरें जड़ी थीं, वे वसुदेव जी के पहुँचते ही अपने आप वैसे ही खुल गए, जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार दूर हो जाता है। भगवान के स्पर्श मात्र से सब बंधन स्वतः खुल गए।
बाहर भादों की अंधेरी रात थी, मेघ भयंकर गर्जना कर रहे थे और मूसलाधार वर्षा हो रही थी। परंतु जब त्रिलोकीनाथ स्वयं किसी यात्रा पर निकलें, तो प्रकृति उनकी सेवा कैसे न करे?
अनन्तोऽप्यन्वगाच्छत्रीकृत्य फणान्मूर्ध्नि ॥
(श्रीमद्भागवत 10.3.49)
वसुदेव जी जब यमुना जी के तट पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि यमुना जी में भयंकर बाढ़ आई हुई थी। यमुना का जल गंभीर गर्जना करता हुआ फेन उड़ा रहा था और भंवर पड़ रहे थे। परंतु वसुदेव जी उस उफनती नदी को देखकर तनिक भी विचलित नहीं हुए, क्योंकि उनके सिर पर तो स्वयं जगतपति बैठे थे।
मार्गं ददौ सिन्धुरिव श्रियः पतेः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.3.50)
वसुदेव जी यमुना पार करके सुरक्षित गोकुल में नंदबाबा के घर पहुँचे। वहां भी योगमाया के प्रभाव से नंदबाबा, यशोदा मैया और सभी गोकुलवासी गहरी नींद में सो रहे थे। किसी को कुछ भी भान नहीं था। प्रसव की पीड़ा और योगमाया के प्रभाव से माता यशोदा को यह भी पता नहीं चला कि उन्होंने पुत्र को जन्म दिया है या पुत्री को।
न तल्लिङ्गं परिश्रान्ता निद्रयापहतस्मृतिः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.3.53)
वसुदेव जी ने अत्यंत सावधानी से अपने पुत्र श्रीकृष्ण को यशोदा जी की बगल में सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को उठाकर वे तुरंत उसी मार्ग से मथुरा की ओर चल पड़े।
वसुदेव जी उस कन्या को लेकर मथुरा के कारागार में वापस आ गए। उन्होंने कन्या को देवकी की गोद में दे दिया और स्वयं पहले की तरह बेड़ियाँ पहनकर बैठ गए। कारागार के दरवाजे अपने आप बंद हो गए और पहरेदार जाग गए।
तभी उस नवजात कन्या ने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। कन्या के रोने की आवाज सुनकर पहरेदारों ने तुरंत दौड़कर कंस को सूचना दी कि देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो गया है। मृत्यु के भय से व्याकुल कंस हड़बड़ाकर उठा और नंगी तलवार हाथ में लिए कारागार की ओर दौड़ा।
देवकी ने रोते हुए कंस के पैर पकड़ लिए और बहुत अनुनय-विनय की— "भैया! यह तो कन्या है। आकाशवाणी तो पुत्र के लिए हुई थी। मेरी इस अंतिम संतान को छोड़ दो, यह तुम्हारी भांजी है।" परंतु क्रूर कंस के हृदय में तनिक भी दया नहीं आई। उसने झपटकर उस कन्या को देवकी की गोद से छीन लिया।
निर्भर्त्स्य बालामपिनक् शिलायामष्टमं भवम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.4.8)
लेकिन वह कन्या कोई साधारण शिशु नहीं थी, वह तो भगवान की साक्षात 'योगमाया' (देवी दुर्गा) थी। जैसे ही कंस ने उसे पत्थर पर पटकना चाहा, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और अपना अष्टभुजा (आठ हाथों वाला) दिव्य रूप धारण कर लिया।
दृश्यतानुजा विष्णोः सायुधाष्टमहाभुजा ॥
(श्रीमद्भागवत 10.4.9)
आकाश में स्थित देवी ने अनेक आभूषण धारण किए हुए थे और सिद्ध, गंधर्व उनकी स्तुति कर रहे थे। देवी योगमाया ने अत्यंत क्रोध में कंस को जोर से डांटते हुए मृत्यु की वह चेतावनी दी, जिसने कंस की रातों की नींद उड़ा दी:
यत्र क्व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसीः कृपणान् वृथा ॥
(श्रीमद्भागवत 10.4.12)
इतना कहकर देवी योगमाया वहां से अंतर्धान हो गईं और विंध्याचल पर्वत पर जाकर 'विंध्यवासिनी' तथा अनेक शक्तिपीठों के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। कंस अपनी मृत्यु की बात सुनकर भय और आश्चर्य से स्तब्ध रह गया। उसे अपनी भूल का भान हुआ और उसने वसुदेव-देवकी को बेड़ियों से मुक्त कर दिया (यद्यपि बाद में उसने फिर उन्हें बंदी बना लिया)। इस प्रकार, भगवान की लीला का प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ और ब्रज में आनंद की वर्षा आरंभ हो गई।
