त्रिदेवों की परीक्षा: महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु की छाती पर लात क्यों मारी? (Shrimad Bhagwat Katha)

Sooraj Krishna Shastri
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त्रिदेवों की परीक्षा: महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु की छाती पर लात क्यों मारी?
सनातन धर्म के शास्त्रों में ईश्वर को निर्गुण, निराकार और सर्वव्यापी माना गया है। परन्तु सृष्टि के संचालन के लिए उसी एक परब्रह्म ने स्वयं को तीन स्वरूपों— ब्रह्मा (सृजनकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता) और शिव (संहारकर्ता) के रूप में विभक्त किया है। अक्सर मानव मन में यह प्रश्न उठता है कि इन त्रिदेवों (Tridev) में सर्वश्रेष्ठ कौन है? किसके भीतर 'सत्त्व गुण' की पूर्णता है? इसी शंका का निवारण करने के लिए श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध (अध्याय 89) में महर्षि भृगु द्वारा ली गई 'त्रिदेवों की परीक्षा' की एक अत्यंत अद्भुत और रोमांचक कथा का वर्णन मिलता है। आइए, इस कथा के दार्शनिक और आध्यात्मिक रहस्यों को विस्तार से समझें।
१. सरस्वती नदी के तट पर ऋषियों का समागम और विवाद
प्राचीन काल की बात है, पवित्र सरस्वती नदी के सुरम्य तट पर शौनक आदि महान ऋषि-मुनि एकत्रित होकर एक विशाल यज्ञ (सत्र) का आयोजन कर रहे थे। यज्ञ के विश्राम के समय ऋषियों के बीच एक अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक और तात्त्विक विषय पर चर्चा छिड़ गई।
सरस्वत्या जलतटे ऋषयः सत्रमासत ।
तर्हि तत्रोत्थितः प्रश्नस्त्रिष्वधीशेषु को महान् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.89.2)
भावार्थ:
"सरस्वती नदी के तट पर यज्ञ करते हुए ऋषियों के बीच यह प्रश्न उठा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश— इन तीनों अधीश्वरों (स्वामियों) में सबसे बड़ा और श्रेष्ठ (महान) कौन है? यज्ञ का वास्तविक फल किसे समर्पित किया जाना चाहिए?"
काफी देर तक शास्त्रार्थ होता रहा, परन्तु इस विषय का कोई सर्वमान्य निष्कर्ष न निकल सका। अंततः, सभी ऋषियों ने सर्वसम्मति से यह निश्चय किया कि शास्त्रों के प्रमाण के साथ-साथ प्रत्यक्ष 'परीक्षा' ली जानी चाहिए। इस अत्यंत कठिन और दुस्साहसिक कार्य के लिए उन्होंने महर्षि भृगु (Maharishi Bhrigu) को नियुक्त किया।
महर्षि भृगु कौन थे?
महर्षि भृगु साक्षात् प्रजापति ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनका विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री 'ख्याति' से हुआ था। भृगु जी सप्तर्षिमंडल के अत्यंत प्रमुख ऋषि हैं। ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तक के रूप में उनकी 'भृगु संहिता' आज भी प्रामाणिक है। सावन और भाद्रपद के महीनों में वे भगवान सूर्य के रथ पर सवार रहते हैं। अपनी निर्भीकता और तपोबल के कारण वे त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिए सबसे योग्य माने गए।
२. सत्यलोक की यात्रा: पिता ब्रह्माजी की परीक्षा (रजोगुण का प्रभाव)
महर्षि भृगु ने यह तय किया कि वे यह देखेंगे कि किसके भीतर अहंकार (Ego) और क्रोध (Anger) का लेशमात्र भी नहीं है, क्योंकि जो सर्वोच्च सत्ता है, वह इन विकारों से पूर्णतः मुक्त होनी चाहिए।
महर्षि भृगु सर्वप्रथम अपने पिता ब्रह्माजी के लोक (सत्यलोक) गए। ब्रह्माजी अपनी सभा में विराजमान थे। भृगु ने सभा में प्रवेश किया, परन्तु उन्होंने जानबूझकर पिता और सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी का कोई सम्मान नहीं किया। उन्होंने न तो ब्रह्माजी को प्रणाम किया, न उनके चरण छुए और न ही उनकी कोई स्तुति की। वे उद्दंडतापूर्वक जाकर एक आसन पर बैठ गए।
अपने ही पुत्र को इस प्रकार अमर्यादित और उद्दंड आचरण करते देख ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। सृष्टि की रचना करने के कारण ब्रह्माजी में 'रजोगुण' (Rajoguna) की प्रधानता है। रजोगुण से अहंकार उत्पन्न होता है कि 'मैं रचयिता हूँ'। क्रोध की अधिकता से ब्रह्माजी का मुख लाल हो गया और उनकी आँखों में अंगारे दहकने लगे। वे भृगु को शाप देना ही चाहते थे, लेकिन फिर यह सोचकर कि 'यह मेरा ही पुत्र है', उन्होंने अपने हृदय में उठे क्रोध के भयंकर आवेग को अपनी विवेक-बुद्धि से दबा लिया।
भृगु मुनि समझ गए कि ब्रह्माजी के भीतर अभी भी मान-अपमान का बोध और रजोगुणी क्रोध शेष है, अतः वे परमसत्ता (सर्वश्रेष्ठ) नहीं हो सकते।
३. कैलाश पर्वत की यात्रा: भगवान शिव की परीक्षा (तमोगुण का प्रभाव)
सत्यलोक से निकलकर महर्षि भृगु सीधे कैलाश पर्वत पर पहुँचे। देवाधिदेव भगवान महादेव (शिवजी) अपनी पत्नी माता पार्वती (सती) के साथ विराजमान थे। जैसे ही शिवजी ने देखा कि उनके प्रिय भ्राता (ब्रह्मा के पुत्र होने के नाते) भृगु आ रहे हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न होकर अपने आसन से उठ खड़े हुए। भगवान शिव ने प्रेम से भृगु का आलिंगन (गले लगाने) करने के लिए अपनी भुजाएँ फैला दीं।
किंतु उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि पीछे हट गए और उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए अत्यंत कठोर वचनों में बोले:
"महादेव! दूर रहिए, मुझे मत छुइए। आप तो भस्म रमाते हैं, श्मशान में रहते हैं और सदा वेदों तथा धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। आप बिना सोचे-समझे दुष्टों, असुरों और पापियों को ऐसे भयंकर वरदान दे देते हैं जिनसे पूरी सृष्टि पर संकट आ जाता है। इसलिए मैं आप जैसे अमर्यादित देवता का आलिंगन कदापि नहीं करूँगा।"
अपने अतिथि और भाई द्वारा किए गए इस घोर अपमान और कटु वचनों को सुनकर भगवान शिव का त्रिनेत्र फड़कने लगा। शिवजी संहार के देवता हैं, उनमें 'तमोगुण' (Tamoguna) का वास है, जो त्वरित क्रोध को जन्म देता है। वे क्रोध से तिलमिला उठे। उनकी आँखें प्रलयकाल की अग्नि के समान जलने लगीं। उन्होंने उसी क्षण अपना भयंकर 'त्रिशूल' उठा लिया और भृगु को मार डालने के लिए दौड़े।
यह भयंकर दृश्य देखकर भगवती सती (पार्वती) दौड़कर बीच में आ गईं। उन्होंने शिवजी के चरण पकड़ लिए और बहुत अनुनय-विनय करके किसी प्रकार उनका क्रोध शांत किया। भृगु मुनि वहाँ से भी बिना कुछ कहे लौट आए। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि शिवजी भी शीघ्र ही तमो-क्रोध के वशीभूत हो जाते हैं।
४. वैकुण्ठ धाम की यात्रा: भगवान विष्णु की परीक्षा (सत्त्वगुण की पराकाष्ठा)
ब्रह्मा और शिव की परीक्षा के पश्चात, अब महर्षि भृगु क्षीरसागर स्थित वैकुण्ठ लोक पहुँचे। वैकुण्ठ में शांति और दिव्यता का साम्राज्य था। उस समय जगत् के पालनहार भगवान श्रीविष्णु शेषनाग की शय्या पर विश्राम कर रहे थे। उन्होंने अपने नेत्र बंद किए हुए थे और वे योगनिद्रा में थे। भगवती जगज्जननी देवी लक्ष्मी अत्यंत प्रेम से उनके सिर को अपनी गोद में रखकर उनके चरण दबा रही थीं।
भृगु मुनि ने देखा कि भगवान सो रहे हैं। अपनी परीक्षा की अंतिम और सबसे कठोर योजना के तहत, भृगु ने न कोई आवाज़ दी, न प्रतीक्षा की। वे सीधे शेषनाग की शय्या के पास गए और उन्होंने पूरी शक्ति से भगवान विष्णु के वक्षस्थल (छाती) पर एक तेज़ लात मारी!
यह दृश्य ब्रह्मांड को स्तब्ध कर देने वाला था। एक साधारण ऋषि द्वारा त्रिलोकीनाथ पर प्रहार! परन्तु जो इसके बाद हुआ, उसने इतिहास में भगवान विष्णु को करुणा और सत्त्वगुण का निर्विवाद सम्राट सिद्ध कर दिया।
५. भगवान विष्णु का अद्भुत प्रेम-व्यवहार और क्षमाशील स्वरूप
छाती पर प्रहार होते ही भगवान विष्णु की योगनिद्रा टूट गई। वे तुरंत अपने आसन से उठ खड़े हुए। किसी भी साधारण व्यक्ति या देवता को इस कृत्य पर भयंकर क्रोध आता और वह भृगु को उसी क्षण भस्म कर देता। परंतु भक्त-वत्सल भगवान विष्णु ने क्रोध करने के बजाय हाथ जोड़कर महर्षि भृगु को प्रणाम किया।
भगवान विष्णु भृगु मुनि के दोनों पैर अपने हाथों में लेकर सहलाने लगे और अत्यंत मधुर तथा चिंता-भरे स्वर में बोले:
"हे भगवन! हे विप्रवर! आपके इस कोमल पैर पर कहीं मेरे कठोर वक्षस्थल से चोट तो नहीं लग गई? कृपया मेरे इस आसन पर विश्राम कीजिए। हे मुने! मुझे आपके शुभ आगमन का तनिक भी ज्ञान न था, मैं सो रहा था। इसलिए मैं आपका स्वागत करने के लिए खड़ा नहीं हो सका, कृपया मेरे इस अपराध को क्षमा करें।"
भगवान विष्णु इतने पर ही नहीं रुके, उन्होंने आगे कहा— "हे महर्षि! ब्राह्मणों और ऋषियों के चरणों का स्पर्श तो बड़े-बड़े तीर्थों को भी पवित्र करने वाला है। आज आपके इस चरण-प्रहार से मेरा वक्षस्थल पवित्र हो गया। आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया हूँ। आज से आपके इस चरण-चिह्न को मैं आभूषण की तरह सदैव अपनी छाती पर धारण करूँगा।"
श्रीवत्स का रहस्य (The Mystery of Srivatsa)
कथा के अनुसार, भगवान विष्णु और उनके अवतारों (श्रीराम, श्रीकृष्ण) की छाती पर जो एक विशेष चिह्न पाया जाता है, जिसे 'श्रीवत्स' (Srivatsa) या 'भृगु-लता' कहा जाता है, वह महर्षि भृगु के उसी चरण प्रहार का चिह्न है। भगवान ने उसे अपने अपमान के रूप में नहीं, बल्कि संतों के प्रेम के आभूषण के रूप में जीवन भर के लिए अपनी छाती पर सजा लिया।
६. भृगु मुनि का पश्चाताप और ऋषियों को संदेश
त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु का ऐसा अलौकिक प्रेम-व्यवहार, असीम क्षमाशीलता और पूर्ण निरहंकारिता देखकर महर्षि भृगु हतप्रभ रह गए। उन्हें अपने कृत्य पर भयंकर ग्लानि हुई। उनकी आँखों से प्रेमाश्रु (आँसू) बहने लगे। भगवान विष्णु की इस असीम करुणा (सत्त्वगुण) के आगे उनका गला रुंध गया और वे एक शब्द भी न बोल सके।
रोते हुए और भगवान की स्तुति करते हुए भृगु मुनि वापस सरस्वती नदी के तट पर उसी ऋषि-मंडली के पास लौट आए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने ब्रह्माजी के रजोगुण (अहंकार-युक्त क्रोध), शिवजी के तमोगुण (संहार-युक्त क्रोध) और अंत में भगवान श्रीविष्णु के विशुद्ध सत्त्वगुण (क्षमा, प्रेम और निरहंकारिता) के अपने सभी अनुभव विस्तार से कह सुनाए।
भृगु मुनि के ये प्रत्यक्ष अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनि बड़े हैरान हुए। उनका यह संदेह हमेशा के लिए दूर हो गया कि सर्वश्रेष्ठ कौन है।
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा विस्मिता मुनयोऽभवन् ।
विष्णुं सर्वोत्तमो मत्वा शान्तिं प्रापुः परां मुने ॥
तभी से सभी ऋषियों और मुनियों ने भगवान विष्णु को ही सत्त्वगुण का प्रतीक, यज्ञों का सच्चा भोक्ता और त्रिदेवों में सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूर्ण श्रद्धा से पूजा-अर्चना करना प्रारंभ कर दिया।
निष्कर्ष: इस कथा का वास्तविक दार्शनिक अर्थ (The Leela)
क्या त्रिदेवों में वास्तव में कोई श्रेष्ठ या कोई छोटा है? क्या भगवान शिव और ब्रह्माजी में सच में दोष हैं? इसका उत्तर है— नहीं। शिव, ब्रह्मा और विष्णु एक ही परमसत्ता (परमेश्वर) के तीन अलग-अलग कार्य रूप हैं।
वास्तव में, उन परम ज्ञानी ऋषि-मुनियों और स्वयं त्रिदेवों ने अपने लिए नहीं, बल्कि हम मनुष्यों के संदेहों को मिटाने और हमें एक जीवन-मूल्य सिखाने के लिए ही ऐसी 'लीला' रची थी। इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि "क्षमा" (Forgiveness) सबसे बड़ा बल है। जो व्यक्ति जितना महान होता है, वह उतना ही अधिक विनम्र और निरहंकारी होता है। क्रोध (चाहे वह ब्रह्माजी का हो या शिवजी का) मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है, जबकि भगवान विष्णु की तरह 'क्षमा' करने वाला और दुष्ट के प्रति भी प्रेम दिखाने वाला ही इस संसार में सर्वश्रेष्ठ (विष्णु-तुल्य) कहलाने का अधिकारी होता है।
त्रिदेवों की परीक्षा: महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु की छाती पर लात क्यों मारी? (Shrimad Bhagwat Katha)

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