सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर एक न्यायालय: न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र और कुलिया डाकू की सत्यकथा
मनुष्य अज्ञानतावश यह सोचता है कि यदि उसने अपने अपराधों को दुनिया की नज़रों से छिपा लिया, या किसी चतुर वकील की सहायता से अदालत के कानूनों को चकमा दे दिया, तो वह सज़ा से बच जाएगा। परन्तु, वह यह भूल जाता है कि इस संसार के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के ऊपर भी एक 'ईश्वरीय न्यायालय' है, जहाँ न कोई गवाह काम आता है, न कोई दलील। वहाँ केवल कर्मों का बहीखाता (अदृश्य सीसीटीवी कैमरा) चलता है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) रहे स्वर्गीय न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र के जीवन की यह सत्य और हृदयस्पर्शी घटना इसी शाश्वत सत्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि 'कर्मों का फल हर जीव को भुगतना ही पड़ता है।'
१. जगन्नाथ पुरी की वह ऐतिहासिक यात्रा
यह कुछ दशक पुरानी बात है, जब न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन थे। पूरे देश की न्याय व्यवस्था उनके निर्देशों पर चलती थी। एक बार उन्हें ओडिशा के पुरी शहर में स्थित एक प्रतिष्ठित लॉ कॉलेज के वार्षिक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया।
चूँकि पुरी भगवान जगन्नाथ का पावन धाम है, इसलिए कॉलेज के समारोह में जाने से पूर्व, जस्टिस मिश्र ने भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने का निश्चय किया। वे अपने पूरे सरकारी लाव-लश्कर और सुरक्षाकर्मियों के साथ श्रीमंदिर पहुँचे। भगवान के दर्शन कर, अत्यंत भावविभोर होकर जब वे मंदिर के प्रवेश द्वार (सिंहद्वार) से बाहर निकल रहे थे, तभी उनके कानों में एक अत्यंत परिचित किन्तु क्षीण सी आवाज़ पड़ी।
२. "रंगनाथ बाबू!" - एक भिखारी की पुकार
भीड़ के बीच से कोई उन्हें बार-बार पुकार रहा था— "रंगनाथ बाबू... ओ रंगनाथ बाबू!"
जस्टिस मिश्र आश्चर्यचकित रह गए। भारत के मुख्य न्यायाधीश को उनके प्रथम नाम "रंगनाथ बाबू" से इस तरह ऊँची आवाज़ में पुकारने का साहस कौन कर सकता था, वह भी मंदिर के प्रवेश द्वार के पास? असमंजस की स्थिति में जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो उनकी दृष्टि एक भिखारी पर पड़ी।
वह एक अत्यंत भयानक और हृदय-विदारक दृश्य था। उस व्यक्ति का चेहरा बदसूरत हो चुका था, उसका पूरा शरीर भयंकर कुष्ठ रोग (Leprosy) से ग्रस्त था, हाथ-पैरों की उंगलियाँ गल चुकी थीं और उन पर मैली पट्टियाँ बंधी हुई थीं। वह सड़क की धूल में रेंग रहा था। उसी कोढ़ी भिखारी ने उन्हें पुकारा था।
३. कुलिया डाकू का स्वीकारोक्ति और ईश्वरीय दंड
जस्टिस मिश्र सुरक्षा घेरे को दरकिनार कर उस भिखारी के पास गए और पूछा— "आप कौन हैं और मुझे इस प्रकार क्यों बुला रहे हैं?"
उस कुष्ठ रोगी ने जो उत्तर दिया, उसने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। मरीज ने कांपती हुई आवाज़ में कहा:
"सर, क्या आप मुझे भूल गए? मैं कुख्यात 'कुलिया डकैत' हूँ। कुछ साल पहले, जब आप न्यायाधीश नहीं थे और ओडिशा उच्च न्यायालय (High Court) में एक नामी वकील के रूप में वकालत कर रहे थे, तो मैं आपका मुवक्किल (Client) था।"
कुलिया ने आगे बताया— "डकैती और हत्या के एक अत्यंत जघन्य मामले में निचली अदालत (Lower Court) ने मुझे आजीवन कारावास (कठोर सजा) सुनाई थी। लेकिन आपने ओडिशा उच्च न्यायालय में मेरे पक्ष में ऐसी ज़बरदस्त और तार्किक बहस की, कि कानून और सबूतों के अभाव में मुझे बिना किसी सज़ा के बाइज्ज़त रिहा कर दिया गया। आपकी वकालत ने मुझे इंसानी अदालत से तो बचा लिया, लेकिन वास्तव में मैं ही दोषी था! मैंने ही उस निर्दोष व्यक्ति की निर्मम हत्या की थी और उसका सारा पैसा और सोना लूट लिया था। इसके अलावा भी कई अन्य मामलों में मैं कानून की खामियों का फायदा उठाकर बचता रहा।"
४. सर्वशक्तिमान की अदालत का न्याय (The Cosmic Justice)
कुलिया की आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। उसने रोते हुए कहा:
"सर! यद्यपि आपके तर्कों ने मुझे इंसानों के न्यायालय से मुक्त करा दिया था, पर सर्वशक्तिमान (भगवान जगन्नाथ) के दरबार में कोई झूठ और कोई वकील काम नहीं आया। वहाँ से मुझे मेरे कर्मों की सबसे कड़ी सज़ा दी गई। मेरे पूरे शरीर में कुष्ठ रोग फूट पड़ा और परिणामस्वरूप मेरे अंग गल-गल कर गिरने लगे। जिस पैसे और परिवार के लिए मैंने हत्याएँ की थीं, उसी परिवार और रिश्तेदारों ने मुझसे नफरत की और मुझे गाँव से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।"
"आज मेरी यह दुर्दशा है कि मैं सड़क पर कीड़े की तरह रेंगकर खाना माँगने को मजबूर हूँ। मंदिर के गेट के पास कभी कोई दया करके कुछ दे देता है, तो खा लेता हूँ, अन्यथा भूखे ही तड़पता रहता हूँ। यह मेरी सज़ा है, सर!"
यह सुनकर जस्टिस मिश्र स्तब्ध रह गए। उनके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे। उन्होंने कांपते हाथों से अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकाला, उसे दिया और भारी मन से, सिर झुकाए चुपचाप वहाँ से चले गए।
५. लॉ कॉलेज में नम आँखों से दिया गया संदेश
कुछ ही समय बाद, जब जस्टिस रंगनाथ मिश्र लॉ कॉलेज के भव्य मंच पर पहुँचे, तो सामने देश के भावी वकील और न्यायाधीश बैठे थे। जस्टिस मिश्र ने अपनी पूर्व-लिखित स्पीच किनारे रख दी। उन्होंने नम आँखों और रुंधे हुए गले से 'कुलिया डाकू' की वह ताज़ा और सच्ची घटना सभी छात्रों को सुनाई।
उन्होंने कहा - “हम और आप यहाँ अपनी बुद्धि, किताबों और दलीलों के अनुसार किसी को रिहा करने या सज़ा देने वाले न्यायाधीश और वकील हैं। लेकिन याद रखना, ऊपर आसमान में एक और ऊपरी अदालत (Supreme Divine Court) है, जहाँ इंसानी बुद्धि और चालाकी काम नहीं करती। वहाँ अपराधी को उसके कर्मों की सज़ा हर हाल में मिलती है।”
६. शास्त्रों के आलोक में कर्म फल का सिद्धांत
कुलिया डाकू की यह घटना हमारे सनातन शास्त्रों में वर्णित 'कर्म सिद्धांत' का साक्षात् प्रमाण है। महाभारत (अनुशासन पर्व) में भीष्म पितामह ने कर्मों के अटल विधान को अत्यंत स्पष्ट रूप से समझाया है:
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ॥
भावार्थ एवं दार्शनिक विवेचन:
"मनुष्य को अपने द्वारा किए गए शुभ (अच्छे) और अशुभ (बुरे) कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। करोड़ों कल्प (युग) बीत जाने पर भी, बिना फल भोगे कर्मों का नाश नहीं होता।"
चाहे आप कानून से बच जाएँ, चाहे आप गवाहों को खरीद लें, परन्तु ईश्वर रूपी न्यायाधीश की दृष्टि से आप कभी नहीं बच सकते। कर्म का विधान गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के नियम की तरह कार्य करता है, जो बिना किसी भेदभाव के अपना परिणाम देता है। कुलिया डाकू ने जो बोया था, उसे वही काटना पड़ा।
निष्कर्ष: अदृश्य सीसीटीवी (The Third Eye)
हम अक्सर बंद कमरों में, अंधेरे में या एकांत में यह सोचकर तमाम तरह के गलत कार्यों में लिप्त हो जाते हैं कि "हमें कोई देख नहीं रहा है।" लेकिन वास्तविकता तो यह है कि उस परमसत्ता की 'तीसरी आँख' (अदृश्य सीसीटीवी कैमरा) हमें निरंतर देख रही है और हमारे एक-एक विचार, एक-एक कर्म का हिसाब रख रही है।
सावधान रहिए! यह निर्भ्रांत सत्य है कि इंसान की अदालत में न्याय अंधा हो सकता है, परंतु ईश्वर की अदालत में न्याय कभी अंधा नहीं होता। हमें अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है। इसलिए, जीवन में ऐसे कर्म करें कि जब उस अंतिम अदालत में हमारी पेशी हो, तो हमें शर्मिंदा होकर सिर न झुकाना पड़े।

