श्री जगन्नाथ रथ यात्रा का महात्म्य: कथा, अनुष्ठान और दार्शनिक रहस्य (Jagannath Rath Yatra)

Sooraj Krishna Shastri
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श्री जगन्नाथ रथ यात्रा का महात्म्य: पौराणिक रहस्य, दार्शनिक अर्थ और सम्पूर्ण अनुष्ठान
सनातन धर्म में कई पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं, परन्तु उड़ीसा (ओडिशा) के पुरी में आयोजित होने वाली 'श्री जगन्नाथ रथ यात्रा' (Jagannath Rath Yatra) विश्व का सबसे विशाल, प्राचीन और अद्भुत उत्सव है। यह एकमात्र ऐसा उत्सव है जिसमें स्वयं भगवान अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर, सड़क पर आकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जब अखिल ब्रह्मांड के नायक भगवान श्री जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा के साथ रथों पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (गुंडीचा मंदिर) जाते हैं, तो वह दृश्य साक्षात् वैकुण्ठ के समान प्रतीत होता है। आइए, स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और पद्म पुराण के संदर्भों के साथ इस महायात्रा के वैज्ञानिक, दार्शनिक और पौराणिक रहस्यों को विस्तार से जानें।
१. रथ यात्रा का शास्त्रों में वर्णन और श्लोक महिमा
जगन्नाथ पुरी को शास्त्रों में 'श्रीक्षेत्र', 'पुरुषोत्तम क्षेत्र' और 'शंख क्षेत्र' कहा गया है। रथ यात्रा केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं है; यह जीव और परमात्मा के मिलन का उत्सव है। स्कंद पुराण के उत्कल खण्ड में रथ यात्रा की महिमा का वर्णन करते हुए अत्यंत स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है:
रथे तु वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते।
भावार्थ एवं दार्शनिक रहस्य:
"जो व्यक्ति रथ पर विराजमान वामन (भगवान जगन्नाथ) के दर्शन कर लेता है, उसका इस संसार में पुनर्जन्म नहीं होता, अर्थात् उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।"
भगवान विष्णु ने जब वामन अवतार लिया था, तब उन्होंने तीन पग में तीनों लोक नाप लिए थे। रथ पर बैठे हुए जगन्नाथ जी उसी वामन रूप का स्मरण कराते हैं, जो अपने भक्तों के उद्धार के लिए मंदिर की चारदीवारी छोड़कर स्वयं चलकर आते हैं। एक अन्य श्लोक में कहा गया है: 'दोलायमानं गोविन्दं मञ्चस्थं मधुसूदनम्। रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥'
२. श्री जगन्नाथ जी के प्राकट्य की पौराणिक कथा
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अन्य सभी हिंदू देवी-देवताओं से अत्यंत भिन्न है। उनके हाथ अधूरे हैं, पैर नहीं हैं, और आँखें बड़ी-बड़ी (चकाडोला) हैं। इस रहस्य को समझने के लिए हमें मालवा देश के राजा इन्द्रद्युम्न की कथा समझनी होगी।
नीलमाधव की खोज और विद्यापति का सफर:
कथा के अनुसार, राजा इन्द्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्हें स्वप्न में 'नीलमाधव' (विष्णु) के दर्शन हुए। राजा ने अपने मंत्री के भाई विद्यापति को नीलमाधव की खोज में भेजा। विद्यापति एक सबर (आदिवासी) कबीले में पहुंचे, जिसका मुखिया विश्वावसु था। विश्वावसु छुपकर एक गुफा में नीलमाधव की पूजा करता था। विद्यापति ने विश्वावसु की पुत्री ललिता से विवाह कर लिया और एक दिन छुपकर (आंखों पर पट्टी बांधकर, परंतु रास्ते में सरसों के बीज गिराते हुए) गुफा तक पहुँच गए। लेकिन जब राजा इन्द्रद्युम्न वहाँ पहुँचे, तो भगवान नीलमाधव अंतर्धान हो चुके थे।
दारु (लकड़ी) का आगमन और मूर्तिकार (विश्वकर्मा):
भगवान ने आकाशवाणी की कि वे समुद्र में तैरते हुए एक लकड़ी के लट्ठे (दारु) के रूप में पुरी के समुद्र तट पर आएंगे। राजा ने उस दारु को निकाला, परंतु कोई भी बढ़ई (Carpenter) उसे काट नहीं पा रहा था। तब स्वयं देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा एक बूढ़े बढ़ई (अनंत महाराणा) का रूप धारण करके आए। उन्होंने शर्त रखी कि वे 21 दिन तक बंद कमरे में मूर्तियां बनाएंगे, और कोई दरवाजा नहीं खोलेगा।
रानी गुंडीचा की अधीरता और अधूरी मूर्तियां:
14 दिन बीत गए। अंदर से आरी-हथौड़े की आवाज़ आनी बंद हो गई। राजा की पत्नी, महारानी गुंडीचा घबरा गईं कि कहीं बूढ़ा बढ़ई मर तो नहीं गया। उनके दबाव में राजा ने दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही विश्वकर्मा अंतर्धान हो गए और मूर्तियां अधूरी रह गईं (हाथ और पैर पूरे नहीं बने थे)। राजा इन्द्रद्युम्न बहुत दुखी हुए, तब भगवान ने स्वप्न में कहा— "मैं कलयुग में इसी अधूरे रूप में अपने भक्तों की पूजा स्वीकार करूँगा।"
३. वेदों के आलोक में 'अपूर्ण स्वरूप' का पूर्ण दर्शन
यह जो स्वरूप हमें 'अधूरा' दिखाई देता है, वह वेदों के श्वेताश्वतर उपनिषद (3.19) के इस महान मंत्र का साक्षात् प्रमाण है:
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रृणोत्यकर्णः।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥
भावार्थ:
"वह परमात्मा बिना हाथ-पैर के भी सब कुछ ग्रहण करता है और सब जगह पहुँच जाता है। बिना आँखों के सब कुछ देखता है, और बिना कानों के सब सुनता है। वह सबको जानता है, परंतु उसे कोई पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। उसी को महान पुरुष (पुरुषोत्तम) कहा गया है।"
भगवान जगन्नाथ की बिना पलक वाली बड़ी गोल आँखें (चकाडोला) दर्शाती हैं कि वे दिन-रात बिना सोए संपूर्ण ब्रह्मांड की निगरानी कर रहे हैं। उनके अधूरे हाथ भक्तों को अपने सीने से लगाने (आलिंगन करने) के लिए हमेशा फैले रहते हैं।
४. तीन रथों का विज्ञान और संरचना (The Three Chariots)
पुरी की रथ यात्रा में तीन विशालकाय रथों का निर्माण होता है। ये रथ हर वर्ष नई लकड़ियों से बनाए जाते हैं (जिसके लिए फाल्गुन मास से ही लकड़ियां एकत्र की जाती हैं)। इन रथों के निर्माण में एक भी लोहे की कील का उपयोग नहीं किया जाता।
विवरण भगवान जगन्नाथ का रथ भगवान बलभद्र का रथ देवी सुभद्रा का रथ
रथ का नामनंदीघोष (गरुड़ध्वज)तालध्वजदर्पदलन (पद्म रथ)
रथ की ऊंचाईलगभग 45 फीटलगभग 44 फीटलगभग 43 फीट
पहियों की संख्या16 पहिए14 पहिए12 पहिए
वस्त्र का रंगलाल और पीला (पीतांबर)लाल और हरालाल और काला
सारथी का नामदारुकमातलीअर्जुन
रथ के रक्षक देवतानरसिंह भगवानवासुदेवजयदुर्गा
रस्सी का नामशंखचूड़ (नाग)वासुकी (नाग)स्वर्णचूड़ (नाग)
५. रथ यात्रा से पूर्व के विशेष अनुष्ठान (Pre-Rath Yatra Rituals)
भगवान जगन्नाथ को एक साक्षात् मनुष्य की तरह पूजा जाता है। रथ यात्रा से पहले कुछ अत्यंत विचित्र और भावनात्मक अनुष्ठान होते हैं:
१. स्नान पूर्णिमा (Snana Purnima):
ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को मंदिर से बाहर स्नान वेदी पर लाया जाता है। यहाँ उन्हें 108 घड़ों के पवित्र जल (जिसमें औषधियां मिली होती हैं) से महास्नान कराया जाता है। इसके बाद भगवान 'गजानन वेश' (हाथी के रूप) में दर्शन देते हैं।
२. अनसर काल (Anasara / Quarantine Period):
शास्त्रों के अनुसार, 108 घड़ों के जल से स्नान करने के कारण भगवान बीमार (ज्वर/बुखार) पड़ जाते हैं। इसके बाद 15 दिनों तक मंदिर के पट (दरवाजे) आम भक्तों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इस अवधि को 'अनसर' कहा जाता है। भगवान को केवल काढ़ा, आयुर्वेदिक औषधियां (दस मूल का काढ़ा) और फलाहार दिया जाता है। वैद्य उनकी सेवा करते हैं और उन्हें 'फुलुरी तेल' लगाया जाता है। यह परंपरा ईश्वर के साथ भक्तों के अत्यंत घनिष्ठ पारिवारिक संबंध को दर्शाती है।
३. नवयौवन दर्शन और नेत्रोत्सव:
15 दिन आराम करने के बाद, आषाढ़ कृष्ण अमावस्या के दिन भगवान पूरी तरह स्वस्थ होकर 'नव यौवन' (Nava Yauvana) रूप में प्रकट होते हैं। मूर्तियों पर पुनः रंग-रोगन किया जाता है और उनके नेत्र (आंखें) बनाए जाते हैं, जिसे 'नेत्रोत्सव' कहा जाता है। अगले दिन रथ यात्रा प्रारंभ होती है।
६. रथ यात्रा का आरंभ: 'पहंडी बीजे' और 'छेरा पँहरा'
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन रथ यात्रा का मुख्य उत्सव प्रारंभ होता है। यह दिन ऊर्जा और भक्ति के सागर में गोते लगाने का दिन है।
पहंडी बीजे (Pahandi Bije): भगवान को गर्भगृह से निकालकर रथ तक लाने की प्रक्रिया को 'पहंडी बीजे' कहते हैं। इसमें भगवान को उठाया नहीं जाता, बल्कि मोटी रेशमी रस्सियों (पट्ट डोरी) से बांधकर झुलाते हुए, आगे-पीछे करते हुए (जैसे कोई मस्त हाथी झूमता हुआ चलता है) रथ तक लाया जाता है। इस दौरान घंटे, घड़ियाल, शंख और मृदंग की ध्वनि से आकाश गूंज उठता है।
छेरा पँहरा (Chhera Pahanra): यह रथ यात्रा का सबसे हृदयस्पर्शी और दार्शनिक अनुष्ठान है। जब तीनों देवता रथ पर विराजमान हो जाते हैं, तब पुरी के गजपति महाराज (राजा) एक साधारण सेवक की भाँति पालकी में आते हैं। वे सोने की झाड़ू (Golden Broom) से तीनों रथों के मंच पर झाड़ू लगाते हैं और चंदन-जल छिड़कते हैं।

दार्शनिक अर्थ: यह अनुष्ठान इस बात का प्रतीक है कि भगवान जगन्नाथ के सामने एक सम्राट और एक सफाई-कर्मचारी दोनों एक समान हैं। भगवान के दरबार में अहंकार का कोई स्थान नहीं है। जब तक मनुष्य अपने मन का अहंकार नहीं बुहारता (साफ करता), तब तक उसके हृदय-रूपी रथ पर परमात्मा विराजमान नहीं होते।
७. गुंडीचा मंदिर की यात्रा (मौसी का घर)
भक्तों द्वारा मोटी रस्सियों से खींचकर तीनों रथों को गुंडीचा मंदिर (Gundicha Temple) तक ले जाया जाता है, जो श्रीमंदिर (मुख्य मंदिर) से लगभग 3 किलोमीटर दूर है। गुंडीचा राजा इन्द्रद्युम्न की पत्नी थीं, जिन्हें भगवान की 'मौसी' माना जाता है। गुंडीचा माता ने ही विश्वकर्मा से मूर्तियां बनवाई थीं, इसलिए भगवान वर्ष में एक बार अपनी जन्मस्थली (कर्मस्थली) और मौसी के घर जाकर उन्हें कृतार्थ करते हैं।
भगवान यहाँ 7 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दौरान गुंडीचा मंदिर में उन्हें 'अडप अबढा' (विशेष महाप्रसाद) का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इस प्रसाद को ग्रहण करने से मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
८. हेरा पंचमी: माता लक्ष्मी का क्रोध (Hera Panchami)
रथ यात्रा के पांचवें दिन एक अत्यंत रोचक और मानवीकृत परंपरा निभाई जाती है— हेरा पंचमी। जब भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र को लेकर गुंडीचा मंदिर चले जाते हैं, तो वे अपनी पत्नी माता लक्ष्मी को साथ नहीं ले जाते।
पांचवें दिन माता लक्ष्मी क्रोधित होकर भगवान जगन्नाथ को ढूंढने (हेरा) गुंडीचा मंदिर पहुंचती हैं। भगवान वहां दरवाजा बंद करवा देते हैं। क्रोध में माता लक्ष्मी जगन्नाथ जी के रथ (नंदीघोष) का एक पहिया या लकड़ी का एक हिस्सा तोड़ देती हैं और चुपचाप श्रीमंदिर लौट आती हैं। यह लीला भगवान और उनके भक्तों के बीच के मधुर, पारिवारिक और दाम्पत्य भाव को दर्शाती है।
९. बाहुड़ा यात्रा और सुना वेश (Bahuda Yatra & Suna Besha)
आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन भगवान जगन्नाथ गुंडीचा मंदिर से अपने मुख्य मंदिर (श्रीमंदिर) की ओर वापस लौटते हैं। इस वापसी की यात्रा को 'बाहुड़ा यात्रा' (Return Journey) कहा जाता है। लौटते समय भगवान का रथ 'मौसी मां' के मंदिर के पास रुकता है, जहाँ उन्हें 'पोड़ पीठा' (एक विशेष प्रकार का केक जो भगवान को अत्यंत प्रिय है) का भोग लगाया जाता है।
सुना वेश (Suna Besha - Golden Attire):
एकादशी के दिन, जब रथ मुख्य मंदिर के सिंहद्वार के सामने पहुँच जाते हैं, तब भगवान को 200 किलोग्राम से अधिक शुद्ध सोने के आभूषणों से सजाया जाता है। इस अलौकिक वेश को 'सुना वेश' कहते हैं। भगवान को सोने के हाथ, पैर, मुकुट (किरीट), और विशाल स्वर्ण चक्र पहनाए जाते हैं। लाखों भक्त रथ पर ही इस दिव्य स्वर्ण रूप के दर्शन करते हैं।
अधर पणा और नीलाद्रि बीजे:
द्वादशी के दिन भगवान के होंठों (अधर) तक पहुँचने वाले विशाल मटकों में मीठा पेय (पणा) अर्पित किया जाता है, जिसे बाद में रथ पर ही फोड़ दिया जाता है ताकि वह रस आस-पास भटकने वाली बुरी आत्माओं और प्रेतों को मिल सके और उन्हें भी मुक्ति प्राप्त हो। अंत में नीलाद्रि बीजे के दिन भगवान वापस गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। प्रवेश करते समय माता लक्ष्मी दरवाजा नहीं खोलतीं। तब भगवान उन्हें मनाने के लिए 'रसगुल्ला' (Rasgulla) खिलाते हैं। रसगुल्ले का इतिहास पुरी जगन्नाथ मंदिर से ही शुरू होता है!
१०. रथ यात्रा का दार्शनिक और वेदान्तिक अर्थ (Philosophical Essence)
रथ यात्रा केवल लकड़ी के एक वाहन को खींचने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह हमारे शरीर, मन और आत्मा की यात्रा का प्रतीक है। कठोपनिषद (Katha Upanishad 1.3.3-4) में ऋषि नचिकेता को समझाते हुए यमराज कहते हैं:
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
आध्यात्मिक व्याख्या:
"हे नचिकेता! इस आत्मा को रथ का स्वामी (रथिनं) जानो, और इस शरीर को ही रथ (Chariot) मानो। बुद्धि को रथ हांकने वाला 'सारथी' समझो, और मन को रथ की 'लगाम' (रस्सियां) जानो। हमारी पांचों इन्द्रियों को इस रथ में जुते हुए 'घोड़े' (हयानाहु) कहा गया है, और इन्द्रियों के जो भोग-विषय हैं, वे इन घोड़ों के विचरने के मार्ग हैं।"
रथ यात्रा का संदेश: रथ यात्रा का वास्तविक अर्थ है कि मनुष्य को अपनी इन्द्रियों (घोड़ों) को मन (लगाम) के द्वारा बुद्धि (सारथी) के नियंत्रण में रखना चाहिए। यदि सारथी (बुद्धि) भगवान के शरणागत है (जैसे अर्जुन ने अपना सारथी श्रीकृष्ण को बनाया था), तो यह शरीर रूपी रथ निश्चित रूप से परमधाम (ईश्वर) तक पहुँचता है। जगन्नाथ रथ यात्रा हमें सिखाती है कि हम शरीर नहीं, अपितु शरीर रूपी रथ में बैठे हुए भगवान के अंश (आत्मा) हैं। रथ खींचने की रस्सियां प्रेम और भक्ति का प्रतीक हैं, जिनसे हम भगवान को अपने हृदय में खींचकर लाते हैं।
११. पुरी जगन्नाथ मंदिर के रहस्यमयी और वैज्ञानिक तथ्य
भगवान जगन्नाथ का मंदिर अपने आप में एक महा-रहस्य है, जिसे आज तक आधुनिक विज्ञान भी पूरी तरह से नहीं सुलझा पाया है:
  • हवा के विपरीत लहराता ध्वज: मंदिर के शिखर (नीलचक्र) पर लगा ध्वज हमेशा हवा की दिशा के ठीक विपरीत दिशा में लहराता है। यह प्रकृति के नियमों को चुनौती देता है।
  • कोई परछाई नहीं (No Shadow): जगन्नाथ मंदिर का मुख्य गुंबद (Main Dome) इस प्रकार वास्तु-विज्ञान से बनाया गया है कि दिन के किसी भी समय इसकी परछाई ज़मीन पर नहीं पड़ती।
  • नीलचक्र का रहस्य: मंदिर के ऊपर लगा सुदर्शन चक्र (नीलचक्र) आप पुरी के किसी भी स्थान से देखें, वह हमेशा आपके सामने ही (Facing you) दिखाई देता है।
  • समुद्र की ध्वनि: जैसे ही आप मंदिर के सिंहद्वार (मुख्य द्वार) से अंदर पहला कदम रखते हैं, समुद्र की लहरों की आवाज़ आनी पूरी तरह बंद हो जाती है। बाहर कदम रखते ही आवाज़ फिर से शुरू हो जाती है।
  • महाप्रसाद का विज्ञान (Mahaprasad): मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई है। प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तनों को एक के ऊपर एक रखा जाता है और नीचे लकड़ी की आग जलाई जाती है। आश्चर्य की बात यह है कि सबसे ऊपर रखे बर्तन का प्रसाद सबसे पहले पकता है, और नीचे वाले का सबसे अंत में।
  • अन्न कभी कम नहीं पड़ता: मंदिर में चाहे 10 हज़ार भक्त आएं या 20 लाख, पकाया गया महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता और न ही कभी एक कण भी व्यर्थ जाता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
श्री जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक उत्सव नहीं है; यह एक महामिलन है। यह पर्व दुनिया को समानता और बंधुत्व का संदेश देता है। वर्ष भर जो भगवान मंदिर के गर्भगृह में ब्राह्मणों और पुजारियों के बीच रहते हैं, वे रथ यात्रा के दिन सड़क पर आ जाते हैं, ताकि समाज का अंतिम व्यक्ति, दलित, शोषित, गरीब, रोगी और अन्य धर्मों के लोग भी उनके दर्शन कर सकें। भगवान जगन्नाथ इस विश्व के वास्तविक स्वामी हैं, जो बिना बुलाए, केवल प्रेम के वशीभूत होकर अपने भक्तों के आँगन में आ जाते हैं।
"जय जगन्नाथ! भगवान पुरुषोत्तम आप सभी के जीवन रूपी रथ का मार्गदर्शन करें।"
श्री जगन्नाथ रथ यात्रा का महात्म्य: कथा, अनुष्ठान और दार्शनिक रहस्य (Jagannath Rath Yatra)

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