|| वर्षासमये मधुरं दृश्यम् ||
(संस्कृत गीत)
भूमिका
वर्षा ऋतु का आगमन प्रकृति में नवजीवन का संचार करता है। जहाँ एक ओर मेघों की गर्जना और गिरता पानी मन को मोह लेता है, वहीं दूसरी ओर सामान्य जन-जीवन थोड़ा अस्त-व्यस्त भी हो जाता है। आचार्य सूरज कृष्ण शास्त्री जी की यह रचना वर्षा काल के इसी मिले-जुले दृश्य का सजीव चित्रण करती है।
वर्षासमये मधुरं दृश्यम् ।
जनजीवनं तु अस्तव्यस्तम् ।।
मेघ: वर्षति कोकिल मौनम्
दर्दुरकण्ठध्वनिः अतिचित्रम् ।
क्षेत्रे-क्षेत्रे जलसञ्चरणम्
(जनजीवनं तु अस्तव्यस्तम्..।।१॥)
कृषक: मुदित: अहमपि मुदितः
विद्यालयेऽवकाशो जात: ।
बालैः साकं जले विहरणम्
(जनजीवनं तु अस्तव्यस्तम्..।।२॥)
।। शुभं भवतु ।।
