|| शैत्य: काल: अतिरमणीय: ||
(मनमोहक शीत ऋतु)
भूमिका
प्रकृति का हर रूप सुंदर है, लेकिन शीत ऋतु (सर्दी) की अपनी अलग ही छटा होती है। ओस की बूंदें, पीली सरसों से लहलहाते खेत और गुनगुनी धूप मन को मोह लेती है। आचार्य सूरज कृष्ण शास्त्री जी द्वारा रचित यह संस्कृत गीत शीत काल के इसी रमणीय सौंदर्य का सजीव चित्रण करता है।
शैत्य: काल: अतिरमणीय:।।
शैत्य: काल: अतिरमणीय:।।
शीतो आप: शीतो वातम्
पत्रतुषार: मणिवत् रम्यम्।
अनलातपौ जनै: वरणीय:
शैत्य: काल: अति रमणीय: ।।
पीतं पीतं सर्षपपुष्पम्
पीतमयी वसुधा अति दिव्यम् ।
कुहकमयं खं किं कथनीय:
शैत्य: काल: अतिरमणीय: ।।
।। शुभं भवतु ।।
