|| श्री गोपाल ध्यानम् ||
चेतसि चिन्तय चिन्मय-भासम्
गोमय-मण्डित-भाल-कपोलं
चेतसि चिन्तय चिन्मय-भासम् ।
नूतन-जलधर-रुचिर-विकासं
पीतवसनधर सुन्दर नटवर ।।
मधुर-पिकस्वर-सुललित-हांस
चेतसि चिन्तय चिन्मय-भासम् ।
भाव-दर्शन
अरे रे मन! इस चिन्मय ज्योति का स्मरण कर। 'चेतसि चिन्तय'— यह अतिमानस का बना नहीं है, पञ्चभूत का बना नहीं है, यह साक्षात 'चिन्मय ज्योति' है। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ से पञ्चभूत का अपवाद कर दो।
'नूतन जलधर रुचिर विकासम्'— वर्षाकालीन रसवर्षी मेघ के समान सुन्दर चिन्मय ज्योति श्रीकृष्ण का चिन्तन करो। जैसे मेघ पर बिजली चमके, ऐसे ही वे 'पीतवसन' धारण किए हुए हैं।
आओ कृष्ण का ध्यान करो, कैसे? कि भाल पर, ललाट पर, कपोल पर गोबर के टीके लगे हुए हैं और गोपी का माखन का लौंदा लेने के लिए इस जगन्नाथ का सूत्रधार स्वयं नृत्य कर रहा है। क्या उस ग्वालिनी में सामर्थ्य है ब्रह्म को नचाने की? नहीं! प्रेम में श्रीकृष्ण को नचाने का सामर्थ्य है।
रासलीला और श्रीराधा
जब रास प्रारम्भ करना हुआ तो प्रभु उसी प्रेममयी प्रेममूर्ति श्रीराधारानी के पास गए और जाकर पाँव ही पकड़ लिया।
श्रीराधा जी: "नारायण, नारायण! प्रीतम, यह क्या कर रहे हो?"
श्रीकृष्ण: "करते यह हैं कि मैंने तुमसे पूछे बिना गोपियों से कह दिया कि आज से कल्पपर्यन्त की रातें मैंने आपको दान कर दीं। पहले तो अपराध क्षमा करो, और सुनो— यदि तुम न चलोगी रास में तो हमारा मन गोपियों में नाचने में कैसे लगेगा?"
प्रभु ने कहा— "तुम्हारे बिना तो रासलीला होगी नहीं। मैं कैसे मुस्कराऊँगा यदि तुम सामने न होओगी? हमारे हृदय में प्रेम कैसे आएगा? मैं बाँसुरी में क्या गाऊँगा?"
।। जय जय श्री राधे ।।
