Padasthitasya Padmasya Shloka का अर्थ जानें। यह श्लोक कमल (Lotus) के उदाहरण से बताता है कि कैसे स्थान बदलने पर मित्र भी शत्रु बन जाते हैं। Read Sanskrit to Hindi translation.
Padasthitasya Padmasya: Success के लिए "सही स्थान" क्यों जरूरी है? (Meaning & Analysis)
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| Padasthitasya Padmasya Sanskrit Shloka written with Lotus flower background - Meaning in Hindi. |
यहाँ इस श्लोक का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है:
1. श्लोक एवं लिप्यंतरण (Shloka & Transliteration)
2. हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
3. शब्दार्थ (Word-for-Word Meaning)
- पदस्थितस्य (Padasthitasya): अपने उचित स्थान (जल/सरोवर) में स्थित (Of the one situated in its proper place/position).
- पद्मस्य (Padmasya): कमल का (Of the lotus flower).
- मित्रे (Mitre): (दो) मित्र (Two friends - द्विवचन).
- वरुणभास्करौ (Varuṇabhāskarau): वरुण (जल) और भास्कर (सूर्य) (Varuna/Water and Bhaskara/Sun - द्विवचन).
- पदच्युतस्य (Padacyutasya): अपने पद (स्थान) से गिरे हुए या हटे हुए का (Of the one fallen/removed from its position).
- तस्य (Tasya): उसका (उसी कमल का) (Of that very same one).
- एव (Eva): ही (Only/Emphatic marker).
- क्लेशदाहकरौ (Kleśadāhakarau): क्लेश (कष्ट/मुरझाना) और दाह (जलन) पैदा करने वाले (Causing distress/withering and burning - द्विवचन).
- उभौ (Ubhau): वे दोनों (Both of them).
4. व्याकरणात्मक विश्लेषण (Grammatical Analysis)
यह श्लोक संस्कृत व्याकरण के 'द्विवचन' (Dual number) के प्रयोग का एक सुंदर उदाहरण है, क्योंकि यहाँ दो कर्ता (सूर्य और जल) एक साथ कार्य कर रहे हैं।
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सन्धि (Sandhi):
- तस्यैव (Tasyaiva): तस्य + एव (वृद्धि सन्धि)।
- क्लेशदाहकरावुभौ (Kleśadāhakarāvubhau): क्लेशदाहकरौ + उभौ (अयादि सन्धि, जहाँ 'औ' का 'आव्' हो जाता है)।
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समास (Compounds):
- वरुणभास्करौ: वरुणः च भास्करः च (इतरेतर द्वंद्व समास) - वरुण और भास्कर दोनों।
- पदस्थितस्य: पदे स्थितः (सप्तमी तत्पुरुष) - पद में स्थित।
- पदच्युतस्य: पदात् च्युतः (पंचमी तत्पुरुष) - पद से गिरा हुआ (से अलग होने के अर्थ में पंचमी)।
- क्लेशदाहकरौ: जो क्लेश (पीड़ा) और दाह (जलन) करता है। (उपपद तत्पुरुष या द्वंद्व गर्भित तत्पुरुष)।
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विशेष टिप्पणी: 'मित्रे', 'वरुणभास्करौ', 'क्लेशदाहकरौ' और 'उभौ' - ये सभी शब्द प्रथमा विभक्ति, द्विवचन (Nominative Dual) में हैं।
5. आधुनिक सन्दर्भ (Modern Context)
यह श्लोक आज के कॉर्पोरेट जगत, राजनीति और सामाजिक जीवन में अत्यधिक प्रासंगिक है। इसे "Ecosystem" (पारिस्थितिकी तंत्र) या "Support System" (सहयोग प्रणाली) के रूप में समझा जा सकता है।
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कॉर्पोरेट जगत में (Job and Position):जब एक सक्षम व्यक्ति एक अच्छी कंपनी में ऊँचे पद (पदस्थित) पर होता है, तो कंपनी के संसाधन (वरुण/जल) और बाजार की चुनौतियाँ/प्रतियोगिता (भास्कर/सूर्य) उसे आगे बढ़ने में मदद करती हैं। संसाधन उसे पोषण देते हैं और प्रतियोगिता उसे निखरने का मौका देती है।लेकिन, यदि वही व्यक्ति नौकरी खो दे या गलत कंपनी में चला जाए (पदच्युत), तो संसाधनों की कमी (वरुण का अभाव) उसे तनाव (क्लेश) देती है, और वही बाजार की प्रतियोगिता (सूर्य) अब उसे जलाने (दाह) लगती है, यानी उसे मानसिक रूप से तोड़ देती है।
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राजनीति या सत्ता में:जब कोई नेता सत्ता (कुर्सी) पर होता है, तो प्रशासन और मीडिया उसके मित्रवत व्यवहार करते हैं। लेकिन कुर्सी जाते ही वही प्रशासन उसे परेशान करता है और मीडिया उसकी आलोचना करके उसे 'जलाने' लगता है।
सार: आपकी क्षमता महत्वपूर्ण है, लेकिन आप "कहाँ" हैं, यह तय करता है कि दुनिया आपके साथ कैसा व्यवहार करेगी।
6. संवादात्मक नीति कथा (Conversational Parable)
विषय: सेनापति का घोड़ा और अस्तबल
एक राजा के पास एक अत्यंत तीव्रगामी और शक्तिशाली युद्ध का घोड़ा था। जब तक वह घोड़ा शाही अस्तबल (उसका 'पद') में था, उसे सर्वोत्तम पोषण मिलता था।
- वरुण (जल/पोषण): उसे ठंडा पानी, चना और घी मिलता था, जिससे वह पुष्ट रहता था।
- भास्कर (सूर्य/तेज): उसे प्रतिदिन मैदान में दौड़ाया जाता था। कड़ी धूप में अभ्यास उसके पसीने को निकालता था और उसे और मजबूत व तेजतर्रार बनाता था। सूर्य का तेज उसकी शक्ति बढ़ाता था।
एक युद्ध में वह घोड़ा घायल हो गया और राजा ने उसे अनुपयोगी मानकर अस्तबल से बाहर निकाल दिया (पदच्युत)। अब वह एक गरीब किसान के पास था।
- अब वही 'वरुण' (पोषण का अभाव) उसके लिए क्लेश बन गया। उसे भरपेट खाना और पानी नहीं मिलता था, जिससे वह कमजोर होकर मुरझाने लगा।
- अब वही 'भास्कर' (सूर्य की धूप) उसके लिए दाहक बन गई। पहले जिस धूप में वह शान से दौड़ता था, अब कमजोर शरीर के साथ उसी धूप में हल खींचते हुए उसकी खाल जलने लगी और घाव दुखने लगे।
घोड़ा वही था, लेकिन 'स्थान' बदलते ही उसके मित्र (धूप और पोषण) उसके शत्रु बन गए।
7. निष्कर्ष (Conclusion)
यह श्लोक हमें विनम्रता और अपने 'अधिष्ठान' (Foundation/Environment) का सम्मान करना सिखाता है। हमें यह समझना चाहिए कि हमारी सफलता में केवल हमारी व्यक्तिगत प्रतिभा ही नहीं, बल्कि हमारे अनुकूल वातावरण और संसाधनों का भी बड़ा हाथ होता है।
जब हम अच्छी स्थिति में हों, तो हमें घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि वे परिस्थितियाँ अस्थायी हो सकती हैं। और यदि हम किसी को बुरी स्थिति (पदच्युत) में देखें, तो हमें समझना चाहिए कि शायद वातावरण की प्रतिकूलता के कारण वे संघर्ष कर रहे हैं, न कि केवल अपनी अयोग्यता के कारण।
"स्थान भ्रष्टाः न शोभन्ते" - अपने स्थान से गिरे हुए लोग शोभा नहीं देते (या सफल नहीं होते), चाहे वह दांत हो, बाल हो, नाखून हो, या मनुष्य हो।
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