क्या विवाह नक्षत्र और वर-वधू के Janma Nakshatra का साम्य जरूरी है? जानें Tara Bal, Nadi Dosh और Vedic Astrology के अनुसार Vivah Muhurat का वैज्ञानिक आधार।
Vivah Nakshatra & Janma Nakshatra Compatibility: एक शास्त्रीय और ज्योतिषीय विश्लेषण (Vedic Astrology Research)
(एक शास्त्रीय एवं ज्योतिषीय विश्लेषण)
१. प्रस्तावना
वैदिक परम्परा में विवाह केवल एक सामाजिक या मनोवैज्ञानिक अनुबन्ध न होकर, एक दैविक-कर्मफल-संयोजन है। वर और वधू अपने पूर्वजन्मकृत कर्मों के अनुसार जन्मनक्षत्र प्राप्त करते हैं, और उन्हीं कर्मों के परिपाक से उनका वैवाहिक योग निर्मित होता है।
अतः, विवाह-मुहूर्त निर्धारण में केवल शुभ तिथि, वार और लग्न ही पर्याप्त नहीं हैं; अपितु यह अनिवार्य है कि विवाह-नक्षत्र का साम्य वर-वधू के जन्मनक्षत्रों से हो। यह साम्य ही दाम्पत्य की स्थिरता, सौभाग्य, सन्तान-सुख, आयु और मानसिक सामंजस्य का मूल आधार है।
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| Vivah Nakshatra and Janma Nakshatra Compatibility Chart Vedic Astrology |
२. नक्षत्र का दार्शनिक एवं ज्योतिषीय स्वरूप
“नक्षत्राणि वै प्रजापतेः चक्षूंषि।”
अर्थात्, नक्षत्र प्रजापति (सृष्टिकर्ता) की दृष्टि हैं। प्रत्येक नक्षत्र एक चेतन शक्ति-केन्द्र है।
जन्मनक्षत्र से निर्धारित तत्व
जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है, वह जातक के निम्न गुणों का निर्धारण करता है—
- मानसिक संरचना
- भावनात्मक प्रतिक्रिया
- दाम्पत्य-व्यवहार
- सुख-दुःख की सहनशीलता
विवाह-नक्षत्र का तात्पर्य
जिस नक्षत्र में पाणिग्रहण, सप्तपदी अथवा लाजाहोम सम्पन्न होता है, वह ‘विवाह-नक्षत्र’ कहलाता है। यह नक्षत्र दाम्पत्य जीवन की आधार-आवृत्ति (Base Frequency) के समान कार्य करता है।
मुहूर्तचिन्तामणि में कहा गया है—
“येन नक्षत्रे विवाहः स्यात् तस्य प्रभावो यावज्जीवम्।”(अर्थात्: जिस नक्षत्र में विवाह होता है, उसका प्रभाव जीवनपर्यन्त रहता है।)
३. जन्मनक्षत्र और विवाह-नक्षत्र साम्य के शास्त्रीय आधार
शास्त्रों में वर-वधू के जन्मनक्षत्र और विवाह-नक्षत्र के बीच सामंजस्य परखने के लिए ५ प्रमुख मानदण्ड निर्धारित किए गए हैं—
(क) ताराबल (नक्षत्र दूरी सिद्धान्त)
जन्मनक्षत्र से विवाह-नक्षत्र तक गणना करने पर नव ताराओं का विचार किया जाता है। इनमें से अशुभ ताराओं का त्याग आवश्यक है।
शुभ तारा
- सम्पत् (२)
- क्षेम (४)
- साधन (६)
- मित्र (८)
- परममित्र (९)
अशुभ तारा
- विपत् (३)
- प्रत्यक् (५)
- नैधन (७)
जन्म तारा (१) – सामान्यतः मध्यम।
बृहत्संहिता (८४.१०) का निर्देश—
“नैधनं विपदं चैव त्यजेद् विवाहकर्मणि।”(विवाह कर्म में नैधन और विपत् तारा का सर्वथा त्याग करना चाहिए।)
(ख) त्रैण गणना (३, ६, ९, १२ का नियम)
नारदसंहिता के अनुसार, जन्मनक्षत्र से तृतीय, षष्ठ, नवम और द्वादश नक्षत्र विवाह के लिए अशुभ माने गए हैं, क्योंकि ये स्थान क्रमशः—
- संघर्ष
- ऋण
- विछोह
- क्षय
के कारक हैं।
(ग) गण-साम्य
नक्षत्रों के तीन गण हैं—
- देव
- मनुष्य
- राक्षस
यदि विवाह-नक्षत्र का गण वर या वधू के जन्मनक्षत्र का विरोधी (विशेषकर देव-राक्षस विरोध) हो, तो दाम्पत्य में स्वभाव-संघर्ष उत्पन्न होता है।
(घ) योनि-साम्य
यदि विवाह-नक्षत्र की योनि, वर या वधू की जन्म-योनि की ‘शत्रु योनि’ हो, तो—
- काम-असन्तोष
- शारीरिक-मानसिक दूरी
का योग बनता है।
(ङ) नाड़ी-दोष विचार
नक्षत्र तीन नाड़ियों में विभक्त हैं—
- आदि
- मध्य
- अन्त्य
यदि विवाह-नक्षत्र उसी नाड़ी का हो जिसमें वर-वधू दोनों हों, तो नाड़ी-दोष प्रबल होकर स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है।
४. विवाह-नक्षत्र चयन: आदर्श नियम एवं उदाहरण
चयन के नियम
- उभय-शुभता: श्रेष्ठ विवाह-नक्षत्र वह है जो वर और वधू दोनों के लिए ताराबल में शुद्ध हो (जैसे- क्षेम, साधन, मित्र)।
- सप्तम-नवम सम्बन्ध: पाराशरी परम्परा में जन्मनक्षत्र से ‘सप्तम’ (समभाव) और ‘नवम’ (भाग्यवर्धक) नक्षत्र श्रेष्ठ माने गए हैं।
- मित्र-नक्षत्र: विवाह-नक्षत्र यदि जन्मनक्षत्र का मित्र हो, तो दाम्पत्य में सहजता और दीर्घायु सम्बन्ध प्राप्त होते हैं।
व्यावहारिक उदाहरण
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वर का जन्मनक्षत्र: रोहिणी
- शुभ विवाह-नक्षत्र: मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रेवती
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वधू का जन्मनक्षत्र: उत्तराफाल्गुनी
- शुभ विवाह-नक्षत्र: हस्त, स्वाति, अनुराधा
निष्कर्ष: यहाँ ‘अनुराधा’ और ‘हस्त’ दोनों के लिए शुभ हैं, अतः इनका चयन श्रेष्ठ होगा।
५. गृह्यसूत्रीय प्रमाण एवं निष्कर्ष
आश्वलायन गृह्यसूत्र (१.७.१) में निर्देश—
“यद् नक्षत्रं सौम्यं तत् विवाहे प्रशस्यते।”
यहाँ ‘सौम्य’ का अर्थ केवल नक्षत्र का मृदु स्वभाव नहीं, बल्कि वर-वधू के जन्मनक्षत्र के साथ उसकी ‘अनुकूलता’ है।
असाम्य के दुष्परिणाम
शास्त्रों के अनुसार—
- असमय वैधव्य
- दाम्पत्य विच्छेद
- सन्तान-क्षय
- मानसिक रोग
जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
दोष-परिहार
अनिवार्य स्थिति में पूर्ण साम्य न होने पर—
- नक्षत्र-शान्ति
- महामृत्युञ्जय जप
- दान
- विवाह-पूर्व इष्ट-पूजन
का विधान किया गया है।
६. उपसंहार
वर-वधू के जन्मनक्षत्र से विवाह-नक्षत्र का साम्य कोई वैकल्पिक परम्परा नहीं, अपितु वैदिक ज्योतिष का मूल स्तम्भ है।
जन्मनक्षत्र जातक के ‘कर्मबीज’ को दर्शाता है और विवाह-नक्षत्र उस बीज का ‘संस्कार-क्षेत्र’ बनता है। यदि बीज और क्षेत्र में साम्य हो, तो दाम्पत्य जीवन स्थिर, सौभाग्यपूर्ण और समृद्ध होता है।
शास्त्रीय निष्कर्ष
“यथा जन्मनक्षत्रं, तथा विवाह-नक्षत्रम्।तयोः साम्ये दाम्पत्यस्य सिद्धिः।। ”
नोट
यह आलेख ज्योतिषीय और धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर संकलित किया गया है।
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