क्या संसार में सुख असली है? | Asare Khalu Samsare Shloka Meaning in Hindi
संसार का सबसे बड़ा भ्रम: सुख कहाँ है?
सुखभ्रान्तिः शरीरिणाम् ।
लालापानमिवाङ्गुष्ठे
बालानां स्थन्यविभ्रमः ॥
Lālāpānamivāṅguṣṭhe bālānāṁ sthanyavibhramaḥ ||
"निस्सार (सारहीन) संसार में मनुष्यों को सुख की भ्रांति वैसे ही होती है, जैसे बालकों को अपने ही अंगूठे को चूसते हुए अपनी ही लार पीने में स्तनपान (दूध पीने) का भ्रम होता है।"
📖 शब्दार्थ (Word Analysis)
श्लोक के शब्दों का विस्तृत अर्थ नीचे दिया गया है:
| शब्द (Sanskrit) | अर्थ (Hindi) | English Meaning |
|---|---|---|
| असारे | सारहीन/बेकार | Essenceless/Hollow |
| संसारे | इस संसार में | In this world |
| सुखभ्रान्तिः | सुख का भ्रम/धोखा | Illusion of happiness |
| शरीरिणाम् | देहधारियों/जीवों को | Of the embodied beings |
| लालापानम् | लार (थूक) पीना | Drinking own saliva |
| इव + अङ्गुष्ठे | जैसे अंगूठे में | Like in the thumb |
| बालानां | बच्चों का | Of the babies |
| स्तन्यविभ्रमः | दूध का भ्रम | Delusion of breast milk |
(↔ तालिका को दायें-बायें खिसका कर देखें)
🧠 व्याकरणात्मक विश्लेषण
यहाँ सांसारिक सुख की तुलना बच्चे के अंगूठा चूसने (Thumb sucking) से की गई है। 'इव' (जैसे) शब्द का प्रयोग उपमा को दर्शाता है।
लालापानमिवाङ्गुष्ठे = लालापानम् + इव + अङ्गुष्ठे (लार का पान + जैसे + अंगूठे में)।
'असारे', 'संसारे' और 'अङ्गुष्ठे' में सप्तमी विभक्ति है, जिसका अर्थ है 'में' (In the hollow world / In the thumb).
🏙️ आधुनिक सन्दर्भ
आज के दौर में यह श्लोक 'Consumerism' (उपभोक्तावाद) और सोशल मीडिया की दुनिया पर सटीक बैठता है:
- सोशल मीडिया का नशा: हम सोशल मीडिया पर 'Likes' और 'Comments' में खुशी ढूंढते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे अपनी ही लार पीना—यह सुख वास्तविक नहीं है, बल्कि हमारे ही अहंकार (Ego) का प्रतिबिंब है।
- शॉपिंग और सुख: हम सोचते हैं कि नई गाड़ी या फोन खरीदने से स्थायी खुशी मिलेगी। पर वह खुशी कुछ दिन की होती है (क्षणिक), फिर हम नई चीज़ की तलाश में लग जाते हैं। यह अंगूठा चूसने जैसा ही भ्रम है।
🐢 संवादात्मक नीति कथा
🦴 कुत्ता और सूखी हड्डी
एक बार एक कुत्ता कसाई खाने के पास से गुज़र रहा था। उसे वहां एक पुरानी, सूखी हुई हड्डी मिली। उस हड्डी में न मांस था, न ही कोई स्वाद।
कुत्ता उसे एकांत में ले गया और बड़े चाव से चबाने लगा। सूखी हड्डी कठोर थी, इसलिए चबाते-चबाते कुत्ते के मसूड़े छिल गए और खून निकलने लगा। कुत्ता उस खून को चाटने लगा और सोचने लगा— "वाह! इस हड्डी में कितना रसीला स्वाद है!"
वास्तविकता: वह हड्डी का स्वाद नहीं, बल्कि उसके अपने ही खून का स्वाद था। हड्डी तो बस एक माध्यम थी।
श्लोक से संबंध: ठीक वैसे ही, बच्चा अंगूठा चूसता है तो उसे लगता है दूध आ रहा है, पर वह अपनी ही लार पी रहा होता है। इंसान संसार में सुख खोजता है, पर वह सुख उसकी अपनी ही आत्मा का है जिसे वह बाहरी वस्तुओं पर आरोपित (Project) कर रहा है।

