Bhaddari: Omens & Travel
मिश्रित विषय, शकुन और परिशिष्ट (सम्पूर्ण संग्रह: 144-169)
तेतो अन्न उपजिहैं, सोच करो जनि कोय ॥ १४४ ॥
अर्थ: सावन बदी एकादशी को जितनी देर रोहिणी नक्षत्र रहेगा, उसी हिसाब से अन्न की उपज होगी। चिंता मत करो।
तिहि नक्षत्र को पूरनमासी, तो फिर चन्द्रगहऩ लग जासी ॥ १४५ ॥
अर्थ: किसी महीने की कृष्ण तृतीया को जो नक्षत्र हो, वही यदि पूर्णिमा को भी हो, तो चन्द्रग्रहण अवश्य लगता है।
बीफे दच्छिन करे पयाना, ताको समझो फिर नहिं आना ॥
बुद्ध कहैं मैं बड़ा सयाना, हमरे दिन जो करै पयाना ।
कौडी से नहिं भेट कराऊँ, छेम कुशल से घर ले जाऊँ ॥ १४६ ॥
अर्थ: (दिशाशूल) सोम-शनि को पूरब, मंगल-बुध को उत्तर, और गुरु (बीफे) को दक्षिण दिशा में यात्रा वर्जित है। बुधवार को यात्रा करने से धन नहीं मिलता, पर आदमी सुरक्षित लौट आता है।
भड्डर जोसी सगुन सुनावै । सगरे काज सिद्ध हो जावै ॥ १४७ ॥
अर्थ: यात्रा में लोमड़ी बार-बार दिखे और हिरण बाएँ से दाहिने जाए, तो सारे कार्य सिद्ध होते हैं।
धेनु बच्छ लेहु पियावे धन्ना । सगुन होत है सबसे अच्छा ॥ १४८ ॥
अर्थ: (शुभ शकुन) भरा कलश लिए सुहागिन, दही, मछली, या बछड़े को दूध पिलाती गाय सामने आ जाए तो बहुत शुभ होता है।
काग दाहिने खेत सुहाय, मनोरथ सकल पूर्ण हो जाय ॥ १४९ ॥
अर्थ: चलते समय नेवला दिखे, नीलकंठ बायीं ओर हो या दाहिनी ओर कौवा बैठा हो, तो मनोरथ पूर्ण होता है।
तीन गऊ गज सात प्रमान, राह मिले जनि करो पयान ॥ १५० ॥
अर्थ: (अशुभ) 5 भैंस, 6 कुत्ते, 1 बैल, 1 बकरा, 3 गाय या 7 हाथी रास्ते में मिलें तो यात्रा रोक देनी चाहिए।
का करै भद्रा का दिगसूल, कहै भड्डरी भागे दूर ॥ १५१ ॥
अर्थ: (परिहार) पूर्व में शाम को, पश्चिम में सुबह, उत्तर में दोपहर और दक्षिण में रात को यात्रा करने से दिशाशूल का दोष नहीं लगता।
बुद्ध मिठाई बिहफै राई । सुक्रै खावे दही मँगाई ॥
सन्नी भाभीरंगी भावै । इन्द्रौ जीत पुत्र फिरि आवै ॥ १५२ ॥
अर्थ: (यात्रा आहार) रविवार-पान, सोम-दर्पण, मंगल-गुड़, बुध-मिठाई, गुरु-राई, शुक्र-दही, शनि-वायविडंग खाकर निकलने से विजय प्राप्त होती है।
एक सूद्र दो बैस असार, तीन विप्र औ छत्री चार ॥
सनमुख आवैं जो नौ नार, तो भड्डर फिर जाओ द्वार ॥ १५३ ॥
अर्थ: कुत्ता कान फड़फड़ाए, या सामने से 1 शूद्र, 2 वैश्य, 3 ब्राह्मण, 4 क्षत्रिय या 9 स्त्रियाँ आती दिखें तो घर लौट जाओ (अशुभ है)।
बरसे तो सूखा पड़े, नीको समय लखात ॥ १५४ ॥
अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को आधी रात में गरजे और बरसे तो सूखा पड़ता है, न बरसे तो अच्छा समय आता है।
हारे खारे इतवार, भड्डर का है यही विचार ॥ १५५ ॥
अर्थ: नया कपड़ा बुध, गुरु और शुक्रवार को पहनना चाहिए। मजबूरी में रविवार को भी पहन सकते हैं।
बाढ़े मच्छ लता अरुमाची । दसो सुखी जब बरसै पानी ॥ १५६ ॥
अर्थ: पृथ्वी, मेंढ़क, भैंस, किसान, मोर, पपीहा, घोड़ा, धान, मछली और लताएँ - ये दसों पानी बरसने पर सुखी होते हैं।
अति ही कुसगुन मानिये, हो निज कारज भङ्ग ॥ १५७ ॥
अर्थ: यदि कुत्ता जमीन पर लोटकर अंगड़ाई ले, तो यह अपशकुन है, काम बिगड़ जाता है।
अर्थ: विजयादशमी जिस वार (दिन) को पड़ती है, वही वार उस वर्ष का 'राजा' माना जाता है।
कंठ मिलावे पिय को लाई । काँधे पड़े विजय हो जाई ॥
हाथन ऊपर जो कहुँ परई । संपत्ति सकल गेह में भरई ॥
निहचय पीठ परै सुख लावै । काँख गिरे प्रिय बन्धु दिखावै ।
कटि के परे वस्त्र बहु रंगा । गुदा परै मिल मित्र अभंगा ॥
जुगल जाँघ पर आन जो परई । धन जन सकल मनोरथ सरई ।
जाँय परे नर होइ निरोगी । परम परे तन जीय वियोगी ॥
यहि विधि पल्ली सरट विचारा । भड्डर कहते जोतिस सारा ॥ १५९ ॥
अर्थ: सिर पर गिरने से सुख, ललाट पर ऐश्वर्य, कंठ पर प्रिय-मिलन, कंधे पर विजय, हाथ पर संपत्ति, पीठ पर सुख, काँख में बंधु-मिलन, कमर पर वस्त्र और जाँघों पर धन मिलता है।
मंगल पड़े तो हर पड़े, बुध पड़े दुःख आन ।
बाम विधाता हाय जो, पड़े शनीचर वार ॥ १६० ॥
अर्थ: आषाढ़ शुक्ल नवमी को देखो। मंगल हो तो कष्ट, बुध हो तो दुःख, और शनिवार हो तो विधाता वाम (बड़ी विपत्ति) होता है। शुभ वारों में अच्छी फसल होती है।
सोमे च श्रवणे भृगु रेवती च । भौमे च अश्विनी अमृत सिद्धि योग ॥ १६१ ॥
अर्थ: (अमृत सिद्धि योग) रवि-हस्त, गुरु-पुष्य, बुध-अनुराधा, शनि-रोहिणी, सोम-श्रवण, शुक्र-रेवती और मंगल-अश्विनी का योग बहुत शुभ होता है।
अर्थ: (यात्रा से पहले क्या खाएं, इसका वर्णन दोहा 152 में किया गया है)।
अष्टमी हस्त में जा रहिया । सत्तमी मघारे चित्तउ रे भाई, छहों शून्य पड़ा है जाई ॥ १६३ ॥
अर्थ: ये छह योग शून्य (वर्जित) हैं: परिवा-मूल, पंचमी-भरणी, छठ-आर्द्रा, नौमी-रोहिणी, अष्टमी-हस्त, और सप्तमी-मघा। इनमें कोई शुभ कार्य सफल नहीं होता।
दूइज सप्तमी आठें जीया, तामें भई विष कौंहर धीया ॥ १६४ ॥
अर्थ: रवि-गुरु-मंगल को कृतिका/भरणी/आश्लेषा हो और द्वितीया/सप्तमी/अष्टमी तिथि हो - तो इस योग में जन्मी कन्या विषकन्या होती है (अशुभ फल देती है)।
इनमें काटे कुक्कुरा, भड्डा उपजै शूल ॥ १६५ ॥
अर्थ: भरणी, विशाखा, कृत्तिका, आर्द्रा, मघा और मूल नक्षत्रों में कुत्ता काटे तो बहुत कष्टकारी (शूल) होता है।
बाक बकोबे मेदिनी, जीवे बिरला कोय ॥ १६६ ॥
अर्थ: शुक्र, शनि या मंगलवार को होली पड़ने से भारी अकाल पड़ता है और जनहानि होती है।
साँझ समै परिवा मिलै, सूर्यग्रहण तब होय ॥ १६७ ॥
अर्थ: जिस नक्षत्र में सूर्य हो, उसी में अमावस हो और शाम को परिवा मिल जाए, तो सूर्यग्रहण लगता है।
तितनो सेर बिकायगो, सोच करो जनि कोय ॥ १६८ ॥
अर्थ: सावन बदी एकादशी जितनी घड़ी की होगी, अनाज उतने सेर (भाव) बिकेगा।
छींक दाहिनी धन बिनसावे । बाम छींक सुख सदा दिखावे ॥
ऊँची छींक महा सुभकारी । नीची छींक महा भयकारी ॥ १६९ ॥
अर्थ: सामने की छींक से लड़ाई, पीठ पीछे से सुख, दाहिनी से धननाश और बायीं से सुख मिलता है। ऊँची छींक शुभ और नीची (धीमी) अशुभ होती है।

