Bhaddari Ki Kahawat: Good Rain (Complete) - सुकाल और वृष्टि

Sooraj Krishna Shastri
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Bhaddari Ki Kahawat: Good Rain (Complete) - सुकाल और वृष्टि

Bhaddari: Good Rain

सुकाल और अच्छी बारिश (सम्पूर्ण संग्रह: 87-143)

#87
बादर पर जब बादर धावै ।
कह भड्डर जल तुरतै आवै ॥ ८७ ॥

अर्थ: भड्डरी का कहना है कि जब बादलों के ऊपर बादल दौड़ें तो बहुत जल्द ही वर्षा होती है।

#88
असाढ़ सुदी पूनो दिवस, गाज बीज बरसन्त ।
नासै लच्छन काल का, खुसी मनावो कन्त ॥ ८८ ॥

अर्थ: आषाढ़ पूर्णिमा को बादल गरजे, पानी बरसे और बिजली चमके तो अकाल के लक्षण नष्ट हो जाते हैं। खुशियाँ मनाओ।

#89
सावन पहली चौथ में, जो मेघा बरसाय ।
तो फिर बोले भड्डरी, उपज सवाई आय ॥ ८९ ॥

अर्थ: सावन कृष्ण चतुर्थी को पानी बरसे तो सवाया (1.25 गुना) अन्न पैदा होता है।

#90
जेठ मास जो तपै निरासा ।
तब होवे बरखा की आसा ॥ ९० ॥

अर्थ: अगर जेठ के महीने में कड़ाके की गर्मी पड़े (लोग निराश हो जाएं), तभी अच्छी वर्षा होने की उम्मीद करनी चाहिये।

#91
चैत पूर्णिमा होइ जो, सोम गुरौ बुधवार ।
घर घर बजे बधावड़ा, होवे मंगलवार ॥ ९१ ॥

अर्थ: चैत्र पूर्णिमा को सोमवार, गुरु या बुधवार पड़े तो घर-घर में बधाई बजती है और मंगल होता है।

#92
तीतर बरनी बादरी, विधवा काजर रेख ।
वह बरसै यह घर करै, कहैं भड्डरी लेख ॥ ९२ ॥

अर्थ: तीतर के रंग के बादल बरसते हैं और काजल लगाने वाली विधवा पुनर्विवाह करती है। यह निश्चित है।

#93
सुक्रवार की बादरी, रही शनीचर छाय ।
तो यों बोलै भड्डरी, बरसे बिन नहिं जाय ॥ ९३ ॥

अर्थ: शुक्रवार की बदली अगर शनिवार तक छायी रहे, तो वह बिना बरसे नहीं जाती।

#94
सावन पहली पञ्चमी, गरभे निकले भान ।
बरखा होवे अति घनी, बहुतै उपजे धान ॥ ९४ ॥

अर्थ: सावन बदी पञ्चमी को सूर्य बादलों की ओट से निकले, तो घनघोर वर्षा और धान की बंपर पैदावार होती है।

#95
जेठ उतरते बोले दादर । तो जानो बरसेगा बादर ॥ ९५ ॥

अर्थ: जेठ समाप्त होते ही मेंढक (दादर) बोलने लगें, तो समझो वर्षा होने वाली है।

#96
फागुन बदी सुदूज दिन, रहे न बादर बीज ।
बरसै सावन भादवाँ, सन्त मनाओ तीज ॥ ९६ ॥

अर्थ: फागुन बदी दूज को आकाश साफ रहे (बादल न हों), तो सावन-भादों में अच्छी बारिश होती है।

#97
माघ शुक्ल की सप्तमी, बिज्जु मेह हिम होय ।
चार महीना बरिसै, सोच देव सब खोय ॥ ९७ ॥

अर्थ: माघ सुदी सप्तमी को बादल, बिजली और ठंडक हो तो चार महीने तक अच्छी वर्षा होती है।

#98
माघ अन्धेरी सप्तमी, मेह बिज्जु चमकन्त ।
चौमासे भर बादला, सोक करो नहिं कन्त ॥ ९८ ॥

अर्थ: माघ बदी सप्तमी को बादल-बिजली हो तो चौमासे भर अच्छी वर्षा होगी, शोक मत करो।

#99
मार्ग बदी आठै बन दरसै । तो जानो सावन भरि बरसै ॥ ९९ ॥

अर्थ: अगहन बदी अष्टमी को बादल दिखाई पड़े तो सावन भर पानी बरसता है।

#100
सावन उमसे भादों जाड़ । बरखा देखै मार कछाड़ ॥ १०० ॥

अर्थ: सावन में उमस (गर्मी) और भादों में जाड़ा (सर्दी) पड़े तो उत्तम वर्षा होती है।

#101
माघ उजेली सप्तमी, बादल मेघ करन्त ।
तो असाढ़ में भड्डरी, घोर मेघ बरसन्त ॥ १०१ ॥

अर्थ: माघ सुदी सप्तमी को बादल हों तो आषाढ़ में खूब वर्षा होती है।

#102
पूस अँधेरी तेरसै, जो बादर चहुँओर ।
सावन पूनो मावसे, जलधर अतिहीं जोर ॥ १०२ ॥

अर्थ: पूस बदी तेरस को चारों ओर बादल हों तो सावन की पूनो और अमावस को जोरों की वर्षा होती है।

#103
पूस उजेली सप्तमी, अष्टमी नौमी गाज ।
रहे मेघ तो जान लो, बनिहैं बिगड़ो काज ॥ १०३ ॥

अर्थ: पौष शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी को बादल गरजें, तो बिगड़ा हुआ काम बन जाता है (वर्षा अच्छी होगी)।

#104
आद्रा तो बरसै नहीं, मृगसिर चले न बाय ।
तो जानो फिर धरनि पर, एको बूँद न आय ॥ १०४ ॥

अर्थ: (चेतावनी) यदि आर्द्रा में न बरसे और मृगशिरा में हवा न बहे, तो पृथ्वी पर एक बूँद भी नहीं गिरती।

#105
माघ पाँच जो हों रविवार । जोसी समया करो विचार ॥ १०५ ॥

अर्थ: माघ में पाँच रविवार पड़ें तो ज्योतिषियों को विशेष विचार करना चाहिए (यह विशेष योग है)।

#106
असाढ़ सुक्कु पूनो दिना, बादर भीनो चन्द ।
तो भड्डर जोसी कहैं, बिहरें नर स्वच्छन्द ॥ १०६ ॥

अर्थ: आषाढ़ पूर्णिमा को चन्द्रमा बादलों में ढँका हो तो मनुष्य सुखपूर्वक विचरण करेंगे (सुकाल होगा)।

#107
धुर असाढ़ी बिज्जुकी, चमक निरन्तर जोय ।
सोमा, सुकरा सुरगुरा, बरखा भारी होय ॥ १०७ ॥

अर्थ: आषाढ़ शुक्ल में सोम, शुक्र, गुरु को लगातार बिजली चमके तो भारी वर्षा होती है।

#108
असाढ़ सुक्कु नवमी दिवस, बादर झीनो चन्द ।
सच मानो यह भड्डरी, होवे बहुत आनन्द ॥ १०८ ॥

अर्थ: आषाढ़ सुदी नवमी को चन्द्रमा बादलों में हो तो बहुत आनन्द (सुकाल) होता है।

#109
सावन सुक्ला सप्तमी, छिपे के निकले भान ।
तब लगि मेघ बरीसिहैं, जब लगि देव उठान ॥ १०९ ॥

अर्थ: सावन सुदी सप्तमी को सूर्य बादलों में छिपकर निकले, तो देवउठान एकादशी तक वर्षा होती रहेगी।

#110
कल से पानी गरम है, चिरिया न्हायें धूर ।
लै अण्डा चींटी चढ़ै, जल देवे भरपूर ॥ ११० ॥

अर्थ: घड़े का पानी गरम लगे, चिड़ियाँ धूल में नहाएं और चींटियाँ अंडे लेकर चलें, तो भरपूर वर्षा होती है।

#111
सावन पछुवाँ भादों पुरुवा, आसिन बहै इसान ।
कातिक में फिर सींक न डोलै, गावैं सभी किसान ॥ १११ ॥

अर्थ: सावन में पछुवाँ, भादों में पुरुवा, आश्विन में ईशान हवा और कार्तिक में हवा बंद रहे तो किसान खुशी के गीत गाते हैं।

#112
जिन वारों रवि संक्रमै, तासों चौथे वार ।
असुभ परन्ती सुभ करै, भड्डर कहैं विचार ॥ ११२ ॥

अर्थ: संक्रान्ति के चौथे दिन खराब वार पड़ने पर भी शुभ फल मिलता है।

#113
उत्तरा उत्तर दे गई, हस्त लियो मुँह मोर ।
भली बिचारी चित्रा, परजा लेय बटोर ॥ ११३ ॥

अर्थ: उत्तरा और हस्त नक्षत्र धोखा दे दें (न बरसें), तब भी अगर चित्रा बरस जाए तो प्रजा बच जाती है (फसल अच्छी हो जाती है)।

#114
पूर्ण तपै जो रोहिणी, तपै पूर्ण जो मूर ।
परिवा तपै जो जेठ में, होवे सातो तूर ॥ ११४ ॥

अर्थ: रोहिणी, मूल और जेठ की परिवा पूरी तरह तपे (गर्मी पड़े), तो सातों प्रकार के अन्न पैदा होते हैं।

#115
मोर पंख बादर उठै, काजर देखो विधवा माहिं ।
वह बरसे वह घर करै, यामें संशय नाहिं ॥ ११५ ॥

अर्थ: मोरपंखी बादल बरसते हैं और काजल लगाने वाली विधवा घर बसाती है। इसमें संदेह नहीं।

#116
अद्रा भद्रा कृत्तिका, आर्द्रा रेखा जु मघाहिं ।
चन्दा उगै दूज को, सब नर सुखी लखाहिं ॥ ११६ ॥

अर्थ: दूज का चाँद आर्द्रा, कृत्तिका या मघा आदि में उदय हो तो सब मनुष्य सुखी होते हैं।

#117
कर्क के मङ्गल होय भवानी । निहचै जानो बरसै पानी ॥ ११७ ॥

अर्थ: कर्क राशि पर मंगल हो तो निश्चय ही पानी बरसता है।

#118
जो पुरुवा पुरुवाई पावे । सूखी नदिया नाव चलावै ॥ ११८ ॥

अर्थ: पूर्वा नक्षत्र में पुरुवा हवा बहे तो इतनी बारिश होती है कि सूखी नदी में नाव चलने लगती है।

#119
तीतर बरनी बादरी, आसमान पर छाय ।
तो फिर भाखै भड्डरी, बिन बरसे नहिं जाय ॥ ११९ ॥

अर्थ: तीतर के रंग की बदली बिना बरसे नहीं जाती।

#120
पूरब को धन पच्छिम चलै, हँसि के राँड़ बतकही करै ।
वह बरसै वह करै भतार, कहैं भड्डरी सगुन विचार ॥ १२० ॥

अर्थ: पूरब का बादल पश्चिम जाए तो बरसेगा; हँसकर बात करने वाली विधवा पुनर्विवाह करेगी।

#121
सावन केरे प्रथम दिन, उगत न दीसै भान ।
चार महीना मेघा बरसै, बात साँँच यह जान ॥ १२१ ॥

अर्थ: सावन के पहले दिन सूर्य न दिखे (बादल हों) तो चार महीने तक वर्षा होती है।

#122
जाड़े में सूतो भलो, बैठो बरखा काल ।
गरमी में ऊधो भलो, आवे बहुत सुकाल ॥ १२२ ॥

अर्थ: दूज का चाँद जाड़े में सोया, बरसात में बैठा और गर्मी में खड़ा दिखे तो सुकाल आता है।

#123
भादों की छठ चाँदनी, जो अनुराधा होय ।
ऊबड़-खाबड़ बोय दे, उपज घनेरी होय ॥ १२३ ॥

अर्थ: भादों सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र हो, तो ऊबड़-खाबड़ जमीन में भी अच्छी फसल होती है।

#124
असाढ़ माघ पूनो दिवस, बादल घेरे चन्द ।
तो फिर बोलै भड्डरी, सकल नरा विचरन्त ॥ १२४ ॥

अर्थ: आषाढ़/माघ पूर्णिमा को चाँद बादलों में हो तो सब मनुष्य आनन्द से रहते हैं।

#125
सावन बदी एकादशी, बादल उगै सूर ।
तो भड्डर जोसी कहैं, घर-घर बजै तँबूर ॥ १२५ ॥

अर्थ: सावन बदी एकादशी को सूर्य बादलों में उगे तो घर-घर में खुशी (तंबूरा) बजती है।

#126
जो बादर-बादर माँ अमसे । भड्डर कहैं कि पानी दरसे ॥ १२६ ॥

अर्थ: जब बादल आपस में मिलने लगें तो पानी बरसता है।

#127
दसी असाढ़ी कृष्ण को, मंगल रोहिनी होय ।
सस्ता धान बिकायगो, हाथ न छुइहैं कोय ॥ १२७ ॥

अर्थ: आषाढ़ कृष्ण दशमी को मंगल और रोहिणी हो तो धान इतना सस्ता होगा कि कोई पूछेगा भी नहीं (बंपर पैदावार)।

#128
जो चित्रा में खेलै गाई । खाली साझ जाय नहिं भाई ॥ १२८ ॥

अर्थ: अन्नकूट (गोवर्धन) के दिन चित्रा नक्षत्र हो तो शाम खाली नहीं जाती (अच्छी पैदावार होती है)।

#129
अगहन द्वादस मेघ उघार । असाढ़ बरसे मूसलाधार ॥ १२९ ॥

अर्थ: अगहन बदी द्वादशी को बदली हो तो आषाढ़ में मूसलाधार वर्षा होती है।

#130
असाढ़ मास आठैं अँधियारी । जो उगै चन्दा जलभारी ॥
चन्दा निकळे बादल फोड़ । साढ़े तीन मास बरखा का जोड़ ॥ १३० ॥

अर्थ: आषाढ़ बदी अष्टमी को चाँद बादलों से निकले तो साढ़े तीन महीने वर्षा होती है।

#131
चैत मास जो बिज्जु बिजोवै । भरि बैसाखि टेसू धोवै ॥ १३१ ॥

अर्थ: चैत में बिजली चमके तो बैसाख में इतनी वर्षा होती है कि टेसू के फूल धुल जाते हैं।

#132
चैत मास दसमी खड़ा, जो कहुँ खाली जाय ।
चार महीना अम्परा, भली भाँति बरसाय ॥ १३२ ॥

अर्थ: चैत दशमी को आकाश साफ हो तो चार महीने लगातार वर्षा होती है।

#133
माघ जो साते कज्जली, आठैं बादर जोय ।
तो असाढ़ में घूरवा, भड्डर बरखा होय ॥ १३३ ॥

अर्थ: माघ बदी सप्तमी/अष्टमी को बादल हों तो आषाढ़ में निश्चय ही वर्षा होती है।

#134
सोम सुक्र सुरगुरु दिवस, पौष अमावस होय ।
घर-घर बजे बधावड़ा, सुखी रहे सब कोय ॥ १३४ ॥

अर्थ: पौष अमावस को सोम, शुक्र या गुरु हो तो सब सुखी रहते हैं।

#135
पूस अँधारी सप्तमी, बिनु जल वारिद जोय ।
सावन में पूनो दिना, अवसहिं बरखा होय ॥ १३५ ॥

अर्थ: पूस कृष्ण सप्तमी को बादल दिखें तो सावन पूर्णिमा को वर्षा अवश्य होती है।

#136
पूस अमावस मूल को, सरसै चारों बाय ।
तो फिर जानो भड्डरी, बरखा पृथी अघाय ॥ १३६ ॥

अर्थ: पूस अमावस को मूल नक्षत्र और चारों ओर हवा हो, तो पृथ्वी तृप्त होने लायक वर्षा होती है।

#137
अखै तीज तिथि के दिना, गुरु होवे सजूत ।
तो बोलैं यों भड्डरी, उपजै अन्न अकूत ॥ १३७ ॥

अर्थ: अक्षयतृतीया को बृहस्पतिवार हो तो अकूत अन्न पैदा होता है।

#138
पोस अँधेरी दसम दिन, बादल चमकै बीज ।
तो बरसै भर भादवाँ, साधो देखो तीज ॥ १३८ ॥

अर्थ: पौष बदी दशमी को बिजली चमके तो भादों भर वर्षा होती है।

#139
कातिक एकसी ग्यारहैं, बादल बिजुली जोय ।
तो फिर बोलै भड्डरी, असाढ़े बरखा होय ॥ १३९ ॥

अर्थ: कार्तिक शुक्ल एकादशी को बादल-बिजली हो तो आषाढ़ में वर्षा होती है।

#140
पूस अँधेरी सप्तमी, जो पानी नहिं आय ।
तो अद्रा बरसै सही, जल थल एक मिलाय ॥ १४० ॥

अर्थ: पूस बदी सप्तमी को पानी न बरसे, तो आर्द्रा में जल-थल एक करने वाली वर्षा होगी।

#140
मार्ग महीना माँहि जो, ज्येष्ठा तपै न मूर ।
तो फिर जानो भड्डरी, खोवै सातो तूर ॥ १४० ॥

अर्थ: अगहन में ज्येष्ठा और मूल न तपे, तो सातों प्रकार के अन्न नष्ट हो जाते हैं (चेतावनी)।

#141
माघ अँधेरी नवम दिन, मूल रिच्छ को भेइ ।
तो भादों नवमी दिवसे, बरसै जल बिन खेद ॥ १४१ ॥

अर्थ: माघ कृष्ण नवमी को मूल नक्षत्र हो तो भादों बदी नवमी को वर्षा अवश्य होती है।

#142
कातिक उजली पूनिमा, कृतिका रिष हो जोय ।
तामें बादर बीजुरी... चार मास तो बरखा होसी ॥ १४२ ॥

अर्थ: कार्तिक पूर्णिमा को कृतिका नक्षत्र और बादल-बिजली हो तो चार महीने वर्षा होती है।

#143
मार्ग बदी आठैं दिवस, बादर बिज्जु हो जोय ।
तो सावन बरसो भलो, उपज सवाई होय ॥ १४३ ॥

अर्थ: अगहन बदी अष्टमी को बादल-बिजली हो तो सावन में अच्छी बारिश और सवाई उपज होती है।

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