द्रौपदी की साड़ी का रहस्य और कर्मफल का गणित! 😲 Why We Suffer for Sins?

Sooraj Krishna Shastri
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पाप और पुण्य: कर्मों का गणित

"जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे - शास्त्र सम्मत विश्लेषण"

शास्त्रों में पाप की परिभाषा
शास्त्रों में कहा गया है- 'पापकर्मेति दशधा' अर्थात् पाप कर्म दस प्रकार के होते हैं, जो मनुष्य को शारीरिक, वाचिक और मानसिक रूप से पतन की ओर ले जाते हैं:
  • शरीर के पाप: हिंसा (हत्या), स्तेय (चोरी), और व्यभिचार।
  • वाणी के पाप: झूठ बोलना, कठोर वचन कहना, और चुगली करना।
  • मन के पाप: दूसरों का बुरा सोचना, ईर्ष्या करना, और कुदृष्टि रखना।
मार्कण्डेय पुराण (14/25) के अनुसार - "पैर में कांटा लगने पर तो केवल एक जगह पीड़ा होती है, किन्तु पाप-कर्मों के फल से शरीर और मन में निरंतर शूल (कांटे) चुभते रहते हैं।"
पुण्य और धर्म का सार
अठारह पुराणों का निचोड़ महर्षि व्यास ने केवल दो पंक्तियों में कह दिया है:
"परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्"
अर्थात: परोपकार ही पुण्य है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना ही पाप है।
यही बात गोस्वामी तुलसीदास जी ने सरलता से समझाई है:
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।"
पाप हो जाए तो क्या करें?
मनुष्य गलतियों का पुतला है, लेकिन पाराशर स्मृति और महाभारत पाप मुक्ति का मार्ग भी दिखाते हैं:
  • छिपाएं नहीं: पाप कर्म को छिपाने से वह बढ़ता है। उसे किसी धर्मज्ञ या गुरु के समक्ष प्रकट कर देना चाहिए।
  • पश्चाताप: शिवपुराण के अनुसार, पश्चाताप ही पापों की परम औषधि है। "मैं फिर ऐसा नहीं करूँगा" - ऐसा दृढ़ निश्चय ही सच्चा प्रायश्चित्त है।
सावधान: पापों का प्रायश्चित्त न करने वाला मनुष्य नरक का भागी होता है और अगले जन्मों में कोढ़ी या रोगी के रूप में कष्ट भोगता है।
कथा: स्वर्ग का द्वार
न्याय की तराजू एक बार स्वर्ग के द्वार पर भारी भीड़ थी। धर्मराज को निर्णय लेना था कि किसे प्रवेश दें। उन्होंने सभी को दो कागज दिए - एक में 'पाप' और दूसरे में 'पुण्य' लिखने को कहा।

अधिकतर लोगों ने अपने पुण्य बढ़ा-चढ़ा कर लिखे और पाप छिपा लिए। लेकिन कुछ आत्माएं ऐसी थीं जिन्होंने अपने पापों को विस्तार से लिखा और प्रायश्चित्त माँगा।

निर्णय: धर्मराज ने पाप स्वीकारने वालों की ईमानदारी और पश्चाताप को देखा और उन्हें स्वर्ग में प्रवेश दे दिया, जबकि पाप छिपाने वाले बाहर ही रह गए।
कथा: पुण्य का ब्याज (द्रौपदी)
साधु की लंगोटी और चीर हरण एक बार द्रौपदी ने यमुना स्नान के दौरान एक साधु को देखा जिसकी लंगोटी पानी में बह गई थी और वह लज्जावश झाड़ियों में छिपा था। द्रौपदी ने तत्काल अपनी साड़ी फाड़कर साधु को वस्त्र दिया।

फल: समय का चक्र घूमा। दुर्योधन की सभा में जब द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था, तब वही छोटा सा पुण्य काम आया। भगवान कृष्ण ने उस आधे टुकड़े वस्त्र को ब्याज सहित लौटाया और साड़ी को इतना बढ़ा दिया कि दुशासन थक गया, पर साड़ी खत्म नहीं हुई।

निष्कर्ष: किया गया छोटा सा पुण्य भी कभी व्यर्थ नहीं जाता, वह विपत्ति काल में रक्षा कवच बनकर खड़ा हो जाता है।

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