वेशभूषा और मानसिकता
"आवरण और आचरण का मनोवैज्ञानिक सत्य"
परिदृश्य: आधुनिक विचार और आरोप
एक विशेष अवसर पर महिला सभा का आयोजन चल रहा था। मंच पर एक २५ वर्षीय आधुनिक युवती माइक थामे ओजस्वी भाषण दे रही थी। उसका पूरा जोर इस बात पर था कि:
"कम और छोटे कपड़े पहनना हमारी स्वतंत्रता है। अगर किसी पुरुष की नीयत खराब होती है, तो दोष हमारे कपड़ों का नहीं, बल्कि पुरुषों की गंदी सोच का है।"
सभा में उपस्थित महिलाएं तालियां बजाकर इसका समर्थन कर रही थीं। तभी भीड़ से एक ३२-३५ वर्षीय शालीन युवक खड़ा हुआ और बोलने की अनुमति मांगी।
एक प्रश्न और चौंकाने वाला कृत्य
माइक हाथ में आते ही युवक ने विनम्रता से पूछा - "मेरी वेशभूषा और शक्ल से मैं आपको कैसा लगता हूँ? शरीफ या बदमाश?"
भीड़ से आवाजें आईं - "तुम बहुत शरीफ और सभ्य लग रहे हो।"
तभी अचानक युवक ने एक अजीबोगरीब हरकत कर डाली। उसने मंच पर ही अपने कपड़े उतार दिए और केवल अंडरवियर (अंतर्वस्त्र) में खड़ा हो गया।
यह देखते ही पूरा सभा स्थल आक्रोश से गूंज उठा। जो महिलाएं उसे 'शरीफ' कह रही थीं, अब चिल्लाने लगीं - "मारो इसे! बेशर्म, गुंडा, नीच इंसान! इसे माँ-बहन का लिहाज नहीं है।"
युवक का तर्क: "अब भाई क्यों नहीं दिखा?"
आक्रोशित भीड़ को शांत करते हुए युवक माइक पर गरजा:
"अभी-अभी तो आप 'कपड़ों की स्वतंत्रता' की दुहाई दे रही थीं? मैंने तो सिर्फ वही स्वतंत्रता दिखाई है। मेरी नीयत में खोट नहीं है, मैंने आपको माँ-बहन ही माना है। लेकिन मेरे अर्द्ध-नग्न होते ही आपको मुझमें 'भाई या बेटा' नजर आना बंद क्यों हो गया? अब आपको सिर्फ एक 'मर्द' क्यों दिख रहा है?"
युवक ने कड़वा सत्य रखते हुए कहा - "सच यही है कि वेशभूषा से फर्क पड़ता है। मानवीय स्वभाव है कि किसी को बिना आवरण के देखने पर मन में विकार उत्पन्न होता ही है।"
शास्त्र और मनोविज्ञान
रूप, रस, शब्द, गंध और स्पर्श - ये पांच कारक अत्यंत प्रभावशाली हैं। इनके प्रभाव से तो विश्वामित्र जैसे तपस्वी का मन भी डोल गया था, तो आम मनुष्य की क्या बिसात?
रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा।।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा।।
(दुर्गा सप्तशती, देव्या कवच: श्लोक ३८)
अर्थात्: रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श - इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी और त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) से नारायणी देवी हमारी रक्षा करें।
चिंतन: समाज का दोहरा मापदंड
आज के समाज की विडंबना देखिये:
- घर की बेटियां बदन ढके या न ढके, इसकी 'स्वतंत्रता' है।
- किन्तु बहुएं मुंह छिपाकर घूंघट में रहें, यह 'मर्यादा' है।
निष्कर्ष: समाज में न तो थोपे गए 'घूंघट' की आवश्यकता है और न ही 'अर्ध-नग्न' प्रदर्शन की। आवश्यकता है एक संतुलित और शालीन वेशभूषा की, जो सम्मानजनक हो। क्योंकि आवरण हटने पर विकार आना स्वाभाविक मानवीय प्रवृति है।

