Dukh Dur Karne Ke Upay: दुःख के 3 प्रकार और निवारण (Remedies for Sorrow)

Sooraj Krishna Shastri
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दुःख दूर करने के उपाय

जानिये दुःखों के प्रकार, कारण और निवारण

हम सभी सुखी होना चाहते हैं। कोई भी दुखी नहीं होना चाहता। दुःख दूर करने के उपाय जानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि दुःख क्यों आते हैं और ये कितने प्रकार के होते हैं।

दुःख के तीन प्रकार (ताप)

शास्त्रों के अनुसार दुःख मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं:

1. दैहिक दुःख (शारीरिक)

दैहिक दुःख वे होते हैं, जो शरीर को होते हैं। जैसे रोग, चोट, आघात, विष आदि के प्रभाव से होने वाले कष्ट। शारीरिक पापों के फलस्वरूप दैहिक दुःख आते हैं। इनके इलाज के लिए आप डॉक्टर के पास जा सकते हैं।

2. दैविक दुःख (मानसिक)

दैविक दुःख वे कहे जाते हैं, जो मन को होते हैं। जैसे चिंता, आशंका, क्रोध, अपमान, शत्रुता, बिछोह, भय, शोक आदि। ये मन के विकार हैं। इनका इलाज दुनिया के किसी डॉक्टर के पास नहीं है, केवल भगवान और अध्यात्म ही इनका उपचार कर सकते हैं।

3. भौतिक दुःख (प्राकृतिक)

भौतिक दुःख वे होते हैं, जो अचानक अदृश्य प्रकार से आते हैं। जैसे भूकंप, सूखा, बाढ़, महामारी, युद्ध, अत्यधिक गर्मी या सर्दी। ये अचानक घटित होते हैं और इनसे बचना अत्यंत कठिन होता है।

दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥

अर्थ: 'रामराज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते।

गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि रामराज्य में सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं, वेदों की मर्यादा का पालन करते हैं। वहाँ न कोई दरिद्र है, न दुःखी। सभी के शरीर सुंदर और निरोग हैं। जो भी श्रीमद भागवत का आश्रय लेता है, वह इन तीनों तापों से बच जाता है।


दुःख क्यों आते हैं?

दुःख आने के मुख्य चार कारण माने गए हैं:

कालजन्य दुःख: मृत्यु का भय या भविष्य की चिंता। याद रखें, यह संसार आपके बिना भी चल रहा था और बाद में भी चलेगा। इसलिए काल का दुःख व्यर्थ है।
कर्मजन्य दुःख: "कर्मणा जायते जन्तुः..." अर्थात प्राणी अपने कर्मों के अनुसार ही सुख-दुःख भोगता है। हम जैसी नीयत से कर्म करते हैं, वैसा ही फल हमें मिलता है।
गुणजन्य दुःख: जब हम तमोगुण या रजोगुण के प्रभाव में होते हैं, तो क्रोध और अज्ञान के कारण गलतियां करते हैं। सतोगुण में रहने का प्रयास करें, ताकि विवेक जाग्रत रहे।
स्वभावजन्य दुःख: कई बार दुःख बाहर नहीं, हमारे स्वभाव में होता है। जैसे सब कुछ अच्छा होने पर भी पुरानी बुरी बातों को याद कर रोना। हमें हर परिस्थिति में भगवान का धन्यवाद करने का स्वभाव बनाना चाहिए।

दुःख दूर करने के अचूक उपाय

1. संसार में रहें, पर संसार को खुद में न रखें

जैसे पानी में नाव रहती है, लेकिन नाव में पानी नहीं आना चाहिए वरना वह डूब जाएगी। उसी प्रकार, रिश्तों को निभाएं परन्तु किसी से अत्यधिक अपेक्षा न रखें। यह संसार 'दुःखालय' है, यहाँ शाश्वत सुख नहीं मिल सकता।

2. आशा ही दुःख का मूल है

संतों ने कहा है— "आशा एक राम जी सों, दूजी आशा छोड़ दे।" जब हम इंसानों से उम्मीद लगाते हैं और वह पूरी नहीं होती, तो दुःख होता है। उम्मीद केवल ईश्वर से रखें।

3. विपत्ति क्या है?

हनुमान जी कहते हैं— "कह हनुमंत विपति प्रभु सोई | जब तक सुमिरन भजन न होई ||" असली विपत्ति धन या सेहत का जाना नहीं है, बल्कि भगवान का स्मरण छूट जाना ही सबसे बड़ा दुःख है।

4. आंतरिक खजाने को पहचानें

भीखा साहब कहते हैं— "भीखा भूखा कोई नहीं, सबकी गठरी लाल..." ईश्वर ने सबके हृदय में आनंद का खजाना दिया है, पर हम बाहर सुख खोजते हुए कंगाल बने बैठे हैं। अपने अंदर झांकें।

5. कामनाओं का त्याग

भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि 'कामना' (Desire) ही पाप और दुःख का कारण है। जिस प्रकार आशा परम दुःख है, उसी प्रकार निराशा (वैराग्य) परम सुख है। सुख वस्तुओं में नहीं, कामना के त्याग में है।

दुखिया मूवा दुख कौं, सुखिया सुख कौं झुरि।
सदा अनंदी राम के, जिनि सुख दुख मेल्हे दूरि।

भावार्थ: सांसारिक लोग सुख और दुःख के द्वंद्व में मरते रहते हैं, लेकिन भक्त सुख-दुःख से ऊपर उठकर सदैव परमानंद में रहते हैं।

"मेरे भगवान! तेरी हम पर कृपा है। अपनी कृपा बनाये रखना।"

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