जीवन की सफलता के 4 सूत्र | Etavajjanmasaphalyam Shloka Meaning

Sooraj Krishna Shastri
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जीवन की सफलता के 4 सूत्र | Etavajjanmasaphalyam Shloka Meaning

जीवन की सफलता का महामंत्र

एतावज्जन्मसाफल्यं
देहिनामिह देहिषु ।
प्राणैरर्थैर्धिया वाचा
श्रेय एवाचरेत्सदा ॥
Etāvajjanmasāphalyaṃ
dehināmiha dehiṣu |
Prāṇairarthair dhiyā vācā
śreya evācaretsadā ||
हिन्दी अनुवाद:
"इस संसार में देहधारियों (मनुष्यों) के जन्म की सफलता बस इतनी ही है कि वे अपने प्राणों (जीवन शक्ति), धन, बुद्धि और वाणी के द्वारा सदैव अन्य प्राणियों का कल्याण (श्रेय) ही करें।"

📖 शब्दार्थ (Word Analysis)

शब्द (Sanskrit) अर्थ (Hindi) English Meaning
एतावत् बस इतना ही Only this much
जन्मसाफल्यं जन्म/जीवन की सफलता Success of life
देहिनाम् + इह देहधारियों का + यहाँ Of humans + in this world
देहिषु प्राणियों के प्रति Towards living beings
प्राणैः प्राणों से (शारीरिक शक्ति) By life force/energy
अर्थैः धन/संपत्ति से By wealth/resources
धिया बुद्धि से By intellect/wisdom
वाचा वाणी से By speech/words
श्रेयः आचरेत् कल्याण करना चाहिए Should practice welfare

(↔ तालिका को खिसका कर देखें)

🧠 4 महा-साधन (The 4 Tools)

इस श्लोक में तृतीया विभक्ति (Instrumental Case) का प्रयोग किया गया है, जो 'माध्यम' (Tools) को दर्शाता है। हमारे पास सेवा करने के 4 साधन हैं:

  • प्राणैः (Prana): शारीरिक श्रम करके किसी की मदद करना।
  • 💰 अर्थैः (Artha): धन या वस्तुओं से जरूरतमंद की सहायता करना।
  • 💡 धिया (Dhiya): अपनी बुद्धि या ज्ञान से किसी को सही रास्ता दिखाना।
  • 🗣️ वाचा (Vacha): मीठे बोल बोलकर दुखी व्यक्ति को सांत्वना देना।

🏙️ आधुनिक सन्दर्भ

आज के 'Self-Centered' (स्वयं-केंद्रित) समाज में यह श्लोक बहुत प्रासंगिक है:

  • Mental Health Support (वाचा): आज लोगों के पास पैसा है, पर सुनने वाला कोई नहीं। अगर आप किसी डिप्रेशन से जूझते व्यक्ति से केवल प्यार से बात कर लें, तो यह 'वाणी' का सबसे बड़ा सदुपयोग है।
  • Mentorship (धिया): यदि आप अपने जूनियर को बिना किसी स्वार्थ के काम सिखाते हैं, तो आप अपनी 'बुद्धि' का दान कर रहे हैं।

🐢 संवादात्मक नीति कथा

👑 रन्तिदेव का महादान

प्राचीन काल में राजा रन्तिदेव हुए। एक बार भीषण अकाल पड़ा। राजा ने अपना सब कुछ प्रजा में बांट दिया। वे सपरिवार 48 दिनों तक बिना भोजन-पानी के रहे।

49वें दिन उन्हें थोड़ा हलुआ और पानी मिला। जैसे ही वे खाने बैठे, एक भूखा ब्राह्मण आया। राजा ने उसे भोजन दिया। फिर एक शूद्र आया, राजा ने उसे बचा हुआ भोजन दिया। अंत में एक प्यासा कुत्ता आया।

त्याग की पराकाष्ठा: राजा रन्तिदेव स्वयं मरणासन्न थे, फिर भी उन्होंने बचा हुआ जल उस कुत्ते को पिला दिया और कहा— "न मुझे मोक्ष चाहिए, न स्वर्ग। मैं बस यही चाहता हूँ कि मैं सबके दुखों को अपने भीतर धारण कर लूँ ताकि वे सुखी हो सकें।"

निष्कर्ष: रन्तिदेव ने अपने प्राण, अर्थ और वाणी तीनों का उपयोग 'देहिषु' (प्राणियों) के लिए किया। यही जन्म की सार्थकता है।

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

संग्रह (Accumulation) करना सफलता नहीं है,
सहयोग (Contribution) करना ही सच्ची सफलता है।
चाहे धन से न सही, पर वाणी और व्यवहार से हम रोज किसी का भला कर सकते हैं।

© BhagwatDarshan.com | ॥ इति शुभम् ॥

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