क्रोध: विनाश का द्वार और विवेक का शत्रु
(ऐतिहासिक अनर्थों और नीति श्लोकों के परिप्रेक्ष्य में एक विस्तृत विश्लेषण)
नीचे दिए गए संस्कृत श्लोकों और ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से हम क्रोध की भयावहता और इसके परिणामों का विश्लेषण करेंगे।
1. क्रोध: मनस्ताप और धर्म के नाश का कारण
शास्त्रों में क्रोध की परिभाषा देते हुए कहा गया है कि यह केवल दूसरों को ही नहीं जलाता, बल्कि सबसे पहले उस आधार को जलाता है जहाँ यह उत्पन्न होता है।
धर्मक्षयकरः क्रोधः तस्मात्क्रोधं परित्यज।। भावार्थ: इस श्लोक के अनुसार व्यक्ति का क्रोध ही उसके दुख और मनस्ताप का सबसे बड़ा कारण होता है। संसार के बंधन का कारण भी क्रोध ही है। क्रोध से ही सभी पुण्य व धर्म का क्षय होता है, इसीलिए बुद्धिमान व्यक्ति को क्रोध का विचारपूर्वक त्याग करना चाहिए।
विश्लेषण: यह श्लोक स्पष्ट करता है कि मानसिक संताप (Mental Agony) का मूल क्रोध है। क्रोध मनुष्य को संसार के बंधनों में जकड़ लेता है और उसके द्वारा संचित 'धर्म' (पुण्य और नैतिकता) का क्षय कर देता है।
महाभारत के युद्ध के अंत में गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का क्रोध इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। पिता की मृत्यु और दुर्योधन की पराजय से उपजे क्रोध ने अश्वत्थामा के विवेक को हर लिया। उसने रात्रि के अंधेरे में सोते हुए पांडव पुत्रों (उपपांडवों) का वध कर दिया।
यह क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध था। क्रोध ने अश्वत्थामा के 'धर्म' का क्षय किया और उसे 'संसार बंधन' में ऐसा जकड़ा कि उसे अमरता का श्राप मिला—युगों-युगों तक भटकने और मनस्ताप झेलने के लिए। उसका क्रोध न केवल पांडव वंश के लिए घातक था, बल्कि स्वयं उसके लिए अनंत पीड़ा का कारण बना।
2. मृत्यु के समान क्रोध और संतोष का नंदन वन
जीवन में हम क्या चुनते हैं—क्रोध या संतोष, यही हमारे भविष्य का निर्धारण करता है।
विद्या कामदुघा धेनु: सन्तोषो नन्दनं वनम् ।। भावार्थ: क्रोध यमलोक के राजा अर्थात यमराज की तरह होता है और क्रोध में भयंकर वैतरणी नदी के समान तृष्णा होती है। जबकि विद्या माता कामधेनु के समान फल देने वाली होती है और संतोष आनंद वन के समान होता है। अब यह हम मनुष्यों पर निर्भर है कि हम किसे चुनते हैं—क्रोध को अथवा विद्या व संतोष को।
विश्लेषण: यहाँ क्रोध की तुलना 'वैवस्वत राजा' (यमराज) से की गई है, जो मृत्यु के देवता हैं। क्रोध साक्षात् मृत्यु है। क्रोध से उत्पन्न तृष्णा (इच्छा/लालच) वैतरणी नदी की तरह दुखदायी है। इसके विपरीत, विद्या कामधेनु है और संतोष नंदन वन (स्वर्ग का बगीचा) है।
भारतीय इतिहास में कन्नौज के राजा जयचंद का क्रोध एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। पृथ्वीराज चौहान के प्रति ईर्ष्या और क्रोध (वैतरणी नदी समान तृष्णा) ने जयचंद की मति भ्रष्ट कर दी। उसने अपनी व्यक्तिगत शत्रुता निकालने के लिए विदेशी आक्रांता मोहम्मद गौरी को आमंत्रित किया या उसकी सहायता की।
जयचंद का क्रोध उसके लिए और पूरे भारतवर्ष के लिए 'यमराज' साबित हुआ। उसका क्रोध न केवल पृथ्वीराज चौहान के अंत का कारण बना, बल्कि कालांतर में स्वयं जयचंद भी मारा गया और भारत सदियों की गुलामी में जकड़ गया। यदि उसने 'संतोष' रूपी नंदन वन को चुना होता, तो इतिहास का स्वरूप कुछ और होता।
3. विवेक का नाश: क्या कहें और क्या न कहें?
क्रोध की सबसे भयानक अवस्था वह है जब मनुष्य अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है।
नाकार्यमस्ति क्रुद्धस्य नवाच्यं विद्यते क्वचित्।। भावार्थ: क्रोध को अत्यंत भयावह प्रवृति बताया गया है। इसके अनुसार क्रोध में व्यक्ति को कहने और न कहने योग्य बातों का विवेक नहीं रहता है। क्रोध के आगोश में मनुष्य कुछ भी कह सकता है और कुछ भी कर सकता है। उसके लिए कुछ भी अकार्य और अवाच्य नहीं रह जाता है।
विश्लेषण: क्रोधित व्यक्ति को 'वाच्य' (बोलने योग्य) और 'अवाच्य' (न बोलने योग्य) का ज्ञान नहीं रहता। उसके लिए कोई भी कार्य 'अकार्य' (न करने योग्य) नहीं होता। वह मर्यादा की सभी सीमाएं लांघ जाता है।
- कौरवों की सभा: दुर्योधन और दुःशासन का क्रोध और ईर्ष्या इस स्तर पर पहुँच गई थी कि उन्हें यह भान नहीं रहा कि कुलवधू द्रौपदी के साथ भरी सभा में कैसा व्यवहार करना चाहिए। यह 'अकार्य' (न करने योग्य कार्य) था। उनके क्रोध और अहंकार ने मर्यादा को तार-तार किया, जिसका परिणाम महाभारत के विनाशकारी युद्ध के रूप में सामने आया।
- शिशुपाल: श्री कृष्ण की बुआ का लड़का शिशुपाल भी क्रोध और द्वेष का उदाहरण है। राजसूय यज्ञ में उसने क्रोध के आवेश में श्री कृष्ण के लिए अपशब्दों की झड़ी लगा दी। उसे यह भान नहीं रहा कि 'वाच्यावाच्यं' (क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं)। अंततः, वाणी के इसी असंयम ने उसके वध को आमंत्रित किया।
विशेष विश्लेषण: मगध सम्राट धनानंद का क्रोध और नंद वंश का विनाश
भारतीय इतिहास में नंद वंश का पतन और मौर्य साम्राज्य का उदय इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि "क्रोध में व्यक्ति को वाच्यावाच्य (क्या कहना चाहिए और क्या नहीं) का भान नहीं रहता" और यही उसके विनाश का कारण बनता है।
1. घटना का पृष्ठभूमि
मगध के सम्राट धनानंद के पास विशाल सेना और अकूत संपत्ति थी, जिससे उसे अहंकार हो गया था। जब भारत पर सिकंदर (Alexander) के आक्रमण का खतरा मंडरा रहा था, तब तक्षशिला के आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त) अखंड भारत की सुरक्षा के लिए मदद मांगने मगध की राजसभा में पहुँचे।
2. क्रोध और अपमान का क्षण
चाणक्य ने राजा को राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति चेताया। लेकिन धनानंद, जो अपनी शक्ति के मद में चूर था, चाणक्य की स्पष्टवादिता और उनके साधारण स्वरूप को देखकर क्रोधित हो उठा। यहाँ यह श्लोक चरितार्थ होता है:
"वाच्यावाच्यं प्रकुपितो न विजानाति कर्हिचित्।"
विश्लेषण: क्रोध के आवेश में धनानंद यह भूल गया कि वह एक विद्वान ब्राह्मण और शिक्षक से बात कर रहा है। उसने न कहने योग्य बातें (अवाच्य) कहीं। उसने चाणक्य की शिखा (चोटी) पकड़कर उन्हें भरी सभा में अपमानित किया और धक्के मारकर बाहर निकाल दिया। धनानंद का यह कृत्य 'अकार्य' (न करने योग्य) था।
3. क्रोध बना यमराज (वैवस्वत राजा)
धनानंद का वह क्रोध उसी क्षण उसके लिए 'यमराज' बन गया, जैसा कि श्लोक में कहा गया है: "क्रोधो वैवस्वतो राजा..."
यदि धनानंद ने अपने क्रोध पर नियंत्रण रखा होता और 'संतोष' या 'विवेक' से काम लिया होता, तो चाणक्य जैसा बुद्धिमान मंत्री उसे मिलता और उसका साम्राज्य और अधिक शक्तिशाली होता। लेकिन, उसके क्रोध ने चाणक्य के भीतर एक प्रतिज्ञा को जन्म दिया— "जब तक मैं तेरे इस वंश का समूल नाश नहीं कर दूँगा, तब तक अपनी शिखा नहीं बांधूंगा।"
4. परिणाम: धर्म और साम्राज्य का क्षय
धनानंद का क्रोध अंततः उसके वंश के विनाश का कारण बना। चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को तैयार किया और शक्तिशाली नंद वंश को उखाड़ फेंका।
"धर्मक्षयकरः क्रोधः तस्मात्क्रोधं परित्यज।।"
धनानंद के क्रोध ने न केवल उसके 'राजधर्म' का क्षय किया, बल्कि उसके प्राण और प्रतिष्ठा को भी नष्ट कर दिया।
विश्व इतिहास में भी क्रोध के घातक परिणाम मिलते हैं। सिकंदर महान, जिसने आधी दुनिया जीत ली थी, अपने क्रोध को नहीं जीत सका।
एक मदिरा पार्टी के दौरान, सिकंदर के सबसे करीबी मित्र और सेनापति क्लीटस (Cleitus) ने उसकी आलोचना कर दी। सिकंदर को इतना क्रोध आया कि उसने पास रखा भाला उठाया और अपने ही मित्र के सीने में उतार दिया, जिसने कभी युद्ध में सिकंदर की जान बचाई थी।
श्लोक का संदर्भ: "क्रोधमूलो मनस्तापः..." (क्रोध ही मनस्ताप का मूल है)
जैसे ही क्रोध उतरा, सिकंदर को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह अपने मित्र के शव के पास बैठकर तीन दिनों तक रोता रहा और आत्महत्या करने की कोशिश की। उसका वह 'मनस्ताप' (Mental Agony) इतिहास में दर्ज है। क्रोध के उस एक पल ने उसे जीवन भर का गहरा घाव दे दिया।
निष्कर्ष: समाधान का मार्ग
उपर्युक्त तीनों श्लोक और ऐतिहासिक घटनाएँ हमें यह चेतावनी देती हैं कि क्रोध वह चिंगारी है जो महल और झोपड़ी में भेद नहीं करती; वह सबको जला देती है。
हमें क्या चुनना चाहिए?
दूसरे श्लोक में इसका सुंदर समाधान दिया गया है— "विद्या कामदुघा धेनु: सन्तोषो नन्दनं वनम्।"
हमें क्रोध रूपी यमराज और तृष्णा रूपी वैतरणी से बचने के लिए 'विवेक रूपी विद्या' और 'आत्म-संतोष' को अपनाना चाहिए। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने क्रोध को जीता (जैसे भगवान राम, जिन्होंने समुद्र पर क्रोध करने से पहले तीन दिन प्रार्थना की और बाद में केवल आवश्यकता पड़ने पर धनुष उठाया), उन्होंने ही धर्म की स्थापना की。
अतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह क्रोध के प्रथम वेग को ही विवेक द्वारा रोक ले, अन्यथा अनर्थ निश्चित है।

