॥ श्रीकृष्ण: निष्काम कर्मयोगी और उनका दिव्य दांपत्य ॥
1. श्रीकृष्ण: नाम और स्वरूप का विवेचन
भगवान श्रीकृष्ण द्वापर युग के युगपुरुष, स्थितप्रज्ञ, और दैवी संपदाओं से परिपूर्ण पूर्णावतार हैं। वे निष्काम कर्मयोग के आदर्श हैं।
नाम का अर्थ: 'कृष्ण' एक संस्कृत शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है- "काला", "गहरा नीला" या "अंधकार"। यह शब्द 'आकर्षण' का भी प्रतीक है।
अर्थात जो सबको अपनी ओर आकर्षित कर ले, वही कृष्ण है।
चंद्रमा के ढलते पक्ष को 'कृष्ण पक्ष' कहा जाता है, जो अंधकार का द्योतक है, लेकिन प्रभु के संदर्भ में यह उनकी "अति-आकर्षक" छवि और अनंत गहराई को दर्शाता है।
2. अष्टपटरानियाँ और अष्टधा प्रकृति का रहस्य
भागवत पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की आठ पटरानियाँ थीं। यह विवाह केवल लौकिक संबंध नहीं, बल्कि जीव और ईश्वर के मिलन की कथा है। आध्यात्मिक दृष्टि से ये आठ रानियाँ भगवान की 'अष्टधा प्रकृति' का प्रतीक हैं।
गीता में भगवान कहते हैं:
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—ये आठ प्रकार की प्रकृति हैं। जब परमात्मा (श्रीकृष्ण) धरा पर अवतरित होते हैं, तो ये आठों प्रकृतियाँ उनकी सेवा में पटरानियों के रूप में उपस्थित होती हैं।
आठ पटरानियों का आध्यात्मिक स्वरूप:
• जीव प्रकृति (स्वभाव) के अधीन होता है, इसलिए वह बंधन में है。
• ईश्वर (श्रीकृष्ण) प्रकृति के स्वामी हैं, इसलिए प्रकृति उनकी सेवा करती है。
• जो जीव अपने स्वभाव (प्रकृति) का दास बनने के बजाय उसे वश में कर लेता है, वही सच्चा कृष्ण भक्त है और वही मुक्त होता है。
3. रुक्मिणी-कृष्ण विवाह: जीवात्मा का परमात्मा को समर्पण
रुक्मिणी जी विदर्भ नरेश भीष्मक की पुत्री थीं। यहाँ पात्रों का प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत गहरा है:
- राजा भीष्मक: संसार रूपी समुद्र।
- रुक्मिणी: समुद्र से उत्पन्न लक्ष्मी (जीवात्मा)।
- रुक्मी (भाई): विष या अहंकार, जो जीवात्मा और परमात्मा के मिलन में बाधक बनता है।
श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी जी को स्वीकार करने के लिए तत्कालीन विवाह की तीनों विधियों का समावेश किया:
- गांधर्व विवाह: प्रेम संदेश (रुक्मिणी जी का पत्र) के माध्यम से।
- राक्षस विवाह: स्वयंवर से हरण करके (शौर्य प्रदर्शन)।
- ब्रह्म/शास्त्रीय विवाह: द्वारका में विधि-विधान के साथ।
यह दर्शाता है कि भक्त किसी भी विधि से, किसी भी परिस्थिति में भगवान को पुकारे, ईश्वर उसे स्वीकार करते हैं।
4. सोलह हजार एक सौ रानियों का रहस्य (वेद ऋचाएँ)
शास्त्रों में भगवान की 16,108 रानियों का वर्णन है। यह संख्या कोई साधारण गणना नहीं, बल्कि गहरा वेदान्त है।
आध्यात्मिक गणित:
- आधिभौतिक: संसार की समस्त वस्तुएं।
- आध्यात्मिक: मन की वृत्तियाँ।
- आधिदैविक: देवताओं की शक्तियाँ।
मन और चंद्रमा की 16 कलाएं होती हैं। प्रत्येक कला के हजार-हजार अंश होते हैं, जो 16,000 की संख्या का निर्माण करते हैं। इन सभी वृत्तियों और कलाओं के एकमात्र स्वामी (पति) श्रीकृष्ण ही हैं।
वेदों का रहस्य:
वेदों में कुल एक लाख मंत्र हैं, जो तीन कांडों में विभाजित हैं:
- कर्मकांड (80,000 मंत्र): ब्रह्मचारियों और सकाम कर्म के लिए।
- उपासना कांड (16,000 मंत्र): गृहस्थों के लिए।
- ज्ञानकांड (4,000 मंत्र): संन्यासियों के लिए।
भौमासुर वध और कन्याओं की मुक्ति:
भौमासुर (नरकासुर): 'भौम' का अर्थ है पृथ्वी या शरीर। जो केवल शरीर और भोग-विलास में ही आनंद मानता है, वह जीवात्मा 'भौमासुर' है।
कारागृह: विलासी और कामी पुरुषों ने वेद की ऋचाओं (मंत्रों) का अर्थ अनर्थ करके उन्हें अपने भोग (कारागृह) में कैद कर रखा था। मंत्रों का दुरुपयोग हो रहा था।
जब ज्ञानस्वरूप श्रीकृष्ण ने अज्ञान रूपी भौमासुर का वध किया, तो वे 16,000 वेद मंत्र (जो कन्या रूप में थे) मुक्त हुए। चूँकि समाज (संसार) ने उन्हें अस्वीकार कर दिया था, इसलिए परमात्मा ने उन्हें शरण दी और स्वीकार किया। इसका अर्थ है कि गृहस्थ आश्रम के 16,000 मंत्र भगवान श्रीकृष्ण को ही समर्पित हैं।
5. जीवन दर्शन और सत्संग की महत्ता
इस कथा का सार मानव जीवन के उत्थान में निहित है।
जिस प्रकार पत्थर नर्मदा नदी में युगों तक रहने पर भी पानी को नहीं सोखता और अंदर से सूखा (पत्थर) ही रहता है, उसी प्रकार कई मनुष्य सत्संग और कथा के बीच रहकर भी नहीं बदल पाते। कारण—भक्ति और प्रेम का अभाव।
सत्संग और भजन: सत्संग (साधु, शास्त्र और भगवान की चर्चा) और भजन (व्यक्तिगत साधना) एक-दूसरे के पूरक हैं।
- बिना भजन के सत्संग केवल बौद्धिक विलास है।
- बिना सत्संग के भजन में दिशा भ्रम हो सकता है।
स्वभाव और साधना:
प्रकृति (स्वभाव) और प्राण साथ-साथ जाते हैं, लेकिन इसे सुधारा जा सकता है।
उपाय: जप, ध्यान, सेवा, स्मरण और सद्ग्रन्थों का अध्ययन।
सच्ची शुद्धि: पहले अपने मन को सुधारें, फिर जगत को। जब आपकी आत्मा आपके चरित्र से संतुष्ट हो जाए, तभी समझना चाहिए कि स्वभाव सुधर गया है。
6. निष्कर्ष: गीता का समन्वय
श्रीकृष्ण का जीवन और उनके विवाह प्रसंग गीता के उपदेशों का व्यावहारिक रूप हैं।
- कर्म: चित्त की शुद्धि के लिए (निष्काम कर्म)।
- उपासना/भक्ति: चित्त की एकाग्रता के लिए।
- ज्ञान: परमात्मा के वास्तविक स्वरूप के अनुभव के लिए।
वेद भोग से त्याग की ओर, प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी 16,108 रानियों के माध्यम से यही संदेश दिया कि संसार की हर वस्तु, हर वृत्ति और हर वेद मंत्र अंततः उसी परब्रह्म में विलीन होने के लिए है।
अतः श्रीकृष्ण केवल एक ऐतिहासिक पुरुष या राजा नहीं, बल्कि समस्त चराचर जगत के एकमात्र स्वामी और जगद्गुरु हैं।

