दान देने से भी बड़ा पुण्य क्या है? | Svadatta Dvigunam Punyam Shloka Meaning

Sooraj Krishna Shastri
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दान देने से भी बड़ा पुण्य क्या है? | Svadatta Dvigunam Punyam Shloka Meaning

दान से बड़ा दान: संरक्षण (Protection)

स्वादत्ता द्विगुणं पुण्यं
परदत्तानुपालनम् ।
परदत्तापहारेण
स्वदत्तं निष्फलं भवेत् ॥
Svadattā dviguṇaṁ puṇyaṁ
paradattānupālanam |
Paradattāpahāreṇa
svadattaṁ niṣphalaṁ bhavet ||
हिन्दी अनुवाद:
"स्वयं दान देने की अपेक्षा दूसरों के द्वारा दिए हुए दान (धरोहर) की रक्षा करने में दुगुना पुण्य है। यदि कोई समर्थ होते हुए भी दूसरों के दिए हुए दान का अपहरण (नष्ट/चोरी) करता है, तो उसका स्वयं का दिया हुआ दान भी निष्फल (व्यर्थ) हो जाता है।"

📖 शब्दार्थ (Word Analysis)

शब्द (Sanskrit) अर्थ (Hindi) English Meaning
स्वदत्ता स्वयं के दान से Than self-donation
द्विगुणं पुण्यं दोगुना पुण्य Twice the merit
परदत्त-अनुपालनम् दूसरों के दान की रक्षा करना Protecting others' charity
परदत्त-अपहारेण दूसरों का दान छीनने/मिटाने से By stealing others' charity
स्वदत्तं अपना दिया हुआ दान One's own donation
निष्फलं भवेत् बेकार/निष्फल हो जाता है Becomes fruitless

(↔ तालिका को खिसका कर देखें)

🧠 व्याकरणात्मक विश्लेषण

1. अनुपालनम् vs अपहारेण:
श्लोक में दो विरोधी शब्द हैं। अनुपालनम् (Maintaining/Protecting) और अपहारेण (Stealing/Destroying)। यह बताता है कि पुण्य केवल 'Creation' (सृजन) में नहीं, बल्कि 'Preservation' (संरक्षण) में भी है।
2. पुण्य का गणित:
यहाँ एक स्पष्ट गणित दिया गया है:
स्वयं का दान = 1x पुण्य
दूसरे के दान की रक्षा = 2x पुण्य
दूसरे के दान को मिटाना = -1x (अपना पुण्य भी शून्य)

🏙️ आधुनिक सन्दर्भ

आज के युग में यह श्लोक 'Heritage Conservation' और 'Civic Sense' के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • सार्वजनिक संपत्ति (Public Property): सरकार या किसी ट्रस्ट ने पार्क, बस स्टॉप या लाइब्रेरी बनाई (परदत्त)। अगर हम उसे गंदा करते हैं या तोड़ते हैं (अपहारेण), तो हम भले ही मंदिर में कितना भी दान दें, वह व्यर्थ है।
  • Trusteeship: मंदिर या संस्था के ट्रस्टियों के लिए यह चेतावनी है। यदि वे पूर्वजों द्वारा दान की गई जमीन या पैसों का गबन करते हैं, तो उनका सारा पूजा-पाठ निष्फल है।

🐢 संवादात्मक नीति कथा

🏛️ सेठ और पुराना कुआँ

एक गाँव में एक बहुत अमीर सेठ जी रहते थे। वे रोज गरीबों को खाना खिलाते थे और मंदिर में दान देते थे। उन्हें अपने पुण्य पर बहुत गर्व था।

उसी गाँव में एक पुराना कुआँ था जो 100 साल पहले किसी और ने बनवाया था। अब वह टूट रहा था। सेठ जी ने सोचा, "मैं इस पुराने कुएँ को ठीक क्यों कराऊं? मैं तो नया कुआँ खुदवाऊंगा ताकि मेरा नाम हो।" उन्होंने पुराने कुएँ को मिट्टी से भरवा दिया और उसके ऊपर अपना नया प्याऊ बनवा दिया।

स्वप्न में सत्य: रात को भगवान ने स्वप्न में सेठ से कहा, "सेठ! तुम्हारा सारा पुण्य समाप्त हो गया।"
सेठ ने घबराकर पूछा, "क्यों प्रभु? मैंने तो नया प्याऊ बनवाया है।"

भगवान ने उत्तर दिया, "तुमने अपने नाम के लिए दूसरे के दिए हुए जल स्रोत (परदत्त) को नष्ट (अपहारेण) कर दिया। यदि तुम उसी पुराने कुएँ की मरम्मत करवाते, तो तुम्हें दोगुना पुण्य मिलता। अब तुम्हारा दान केवल अहंकार है।"

निष्कर्ष: धरोहर को मिटाकर अपनी इमारत खड़ी करना विकास नहीं, विनाश है।

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

नया बनाना आसान है, पुराने को सहेजना कठिन है।
पुण्य कमाना है तो पूर्वजों और समाज द्वारा किए गए कार्यों का आदर और रक्षण करें।
सच्चा धर्म 'सृजन' के साथ-साथ 'संरक्षण' भी है।

© BhagwatDarshan.com | ॥ इति शुभम् ॥

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