सम्राट हर्षवर्धन: 'नागानंद' के रचयिता, अहिंसा के तार्किक और भारतीय दर्शन के 'राजर्षि'
भारतीय इतिहास में सम्राट हर्षवर्धन (Harshavardhana, 606–647 ई.) को प्रायः अंतिम महान हिंदू सम्राट या कन्नौज के शासक के रूप में याद किया जाता है। किंतु उनका एक रूप ऐसा है जो युद्धभूमि से परे, चिंतन और तर्क की दुनिया का है। वे एक उच्च कोटि के नाटककार और दार्शनिक थे। उनका संस्कृत नाटक 'नागानंद' (Nagananda) केवल साहित्य नहीं, बल्कि बौद्ध करुणा और वैदिक सौंदर्यशास्त्र का एक अद्भुत दार्शनिक दस्तावेज है। इसमें उन्होंने तर्क और भावनाओं का प्रयोग करके यह सिद्ध किया कि 'स्वयं के शरीर का बलिदान' (Self-sacrifice) ही सर्वोच्च धर्म है।
- 1. प्रस्तावना: शासक और शास्त्रकार का मिलन
- 2. हर्षवर्धन: एक दार्शनिक राजा (Philosopher King)
- 3. 'नागानंद': नाटक का दार्शनिक ढांचा
- 4. समन्वयवाद: बुद्ध और गौरी की एक साथ स्तुति
- 5. दयावीर रस: सौंदर्यशास्त्र में नया तर्क
- 6. जीमूतवाहन और गरुड़ संवाद: अहिंसा का तर्कशास्त्र
- 7. बोधिसत्व आदर्श: परोपकार का विज्ञान
- 8. नालंदा और कन्नौज सभा: तार्किक अभिरुचि
- 9. निष्कर्ष: तलवार से त्याग की यात्रा
| पूरा नाम | हर्षवर्धन (पुष्यभूति वंश) |
| उपाधि | शिलादित्य, सकलोत्तरापथनाथ, साहित्यकार-सम्राट |
| काल | 7वीं शताब्दी (606–647 ईस्वी) |
| राजधानी | कन्नौज (कान्यकुब्ज) |
| साहित्यिक कृतियाँ | नागानंद, रत्नावली, प्रियदर्शिका |
| दार्शनिक मत | समन्वयवादी (शैव और महायान बौद्ध धर्म का संगम) |
| मुख्य योगदान | 'दयावीर रस' की स्थापना और अहिंसा का तार्किक प्रतिपादन |
2. हर्षवर्धन: एक दार्शनिक राजा (Philosopher King)
हर्षवर्धन का जीवन संघर्षों से भरा था। उन्होंने अपने भाई और बहन की त्रासदी देखी और अनगिनत युद्ध लड़े। लेकिन इन सबके बीच उनके भीतर एक वैरागी और दार्शनिक पल रहा था। बाणभट्ट के 'हर्षचरित' और ह्वेनसांग के विवरणों से पता चलता है कि हर्ष केवल तलवार के धनी नहीं थे, बल्कि वे शास्त्रार्थों का आयोजन भी करवाते थे।
उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्ध में महायान बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था, जो 'करुणा' और 'तर्क' (शून्यवाद/विज्ञानवाद) पर आधारित था। उनका दरबार बाणभट्ट, मयूरभट्ट और दिवाकर जैसे विद्वानों का केंद्र था।
3. 'नागानंद': नाटक का दार्शनिक ढांचा
'नागानंद' (नागों का आनंद) 5 अंकों का एक संस्कृत नाटक है। यह विद्याधर राजकुमार जीमूतवाहन की कथा है।
- प्रथम 3 अंक: ये शृंगार रस (Romantic) से भरे हैं, जहाँ जीमूतवाहन और मलयवती का प्रेम प्रसंग है।
- अंतिम 2 अंक: यहाँ नाटक अचानक एक गंभीर दार्शनिक मोड़ लेता है। जीमूतवाहन शंखचूड़ नामक नाग को बचाने के लिए गरुड़ के सामने अपना शरीर प्रस्तुत कर देता है।
हर्ष ने इस नाटक के माध्यम से यह प्रश्न उठाया: "क्या व्यक्तिगत सुख (शृंगार) जीवन का अंतिम लक्ष्य है? या परोपकार (त्याग) उससे भी बड़ा आनंद है?"
4. समन्वयवाद: बुद्ध और गौरी की एक साथ स्तुति
हर्षवर्धन के दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'समन्वयवाद' (Syncretism) है। 'नागानंद' की शुरुआत एक अद्भुत नांदी-पाठ (Prayer) से होती है।
नाटक की शुरुआत में भगवान बुद्ध का आह्वान किया गया है जो कामदेव (मार) को जीत चुके हैं। लेकिन नाटक के अंत में, जब नायक जीमूतवाहन अपने प्राण त्याग रहा होता है, तो देवी गौरी (शिव की पत्नी) प्रकट होकर उसे पुनर्जीवित करती हैं।
हर्ष का तर्क था: "तर्क और नैतिकता (Ethics) बौद्ध धर्म की हो सकती है, लेकिन शक्ति और अनुग्रह (Grace) सनातनी देवी-देवताओं का है।" उन्होंने धर्मों के बीच की दीवारों को गिरा दिया।
5. दयावीर रस: सौंदर्यशास्त्र में नया तर्क
भारतीय नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने मुख्य रूप से 8 रसों की बात की थी। बाद में 'शांत' रस जोड़ा गया। लेकिन हर्षवर्धन ने 'नागानंद' में एक बिल्कुल नई श्रेणी स्थापित की—'दयावीर रस' (Heroism in Compassion)।
तर्क: सामान्यतः 'वीर रस' युद्ध और क्रोध से जुड़ा होता है। हर्ष ने तर्क दिया कि असली वीरता किसी को मारने में नहीं, बल्कि किसी को बचाने के लिए मरने में है। जब जीमूतवाहन गरुड़ को अपना मांस खिला रहा होता है और उफ तक नहीं करता, तो यह 'दया' है, लेकिन उसकी सहनशक्ति 'वीरता' की पराकाष्ठा है। इसे ही हर्ष ने 'दयावीर' कहा।
6. जीमूतवाहन और गरुड़ संवाद: अहिंसा का तर्कशास्त्र
नाटक का चरम बिंदु (Climax) वह संवाद है जो गरुड़ (पक्षीराज) और जीमूतवाहन (बोधिसत्व) के बीच होता है। यह हिंसा बनाम अहिंसा का एक तार्किक शास्त्रार्थ है।
गरुड़ का तर्क (प्राकृतिक न्याय)
गरुड़ पूछता है: "मैं मांसाहारी हूँ। नागों को खाना मेरा प्राकृतिक भोजन है। तुम अपना शरीर क्यों दे रहे हो? क्या मृत्यु से डर नहीं लगता?"
(यह चार्वाक या स्वभाववाद का तर्क है—जीव को अपने स्वभाव के अनुसार जीना चाहिए।)
जीमूतवाहन का तर्क (नैतिकता और त्याग)
जीमूतवाहन उत्तर देता है:
"शरीर क्षणभंगुर है: यह शरीर वैसे भी एक दिन नष्ट होगा। यदि यह किसी के काम न आए, तो इसका क्या मूल्य?"
"सुख की परिभाषा: दूसरों की रक्षा करने में जो आनंद है, वह राज्य भोगने में या स्वयं जीवित रहने में नहीं है।"
जीमूतवाहन का तर्क और त्याग देखकर गरुड़ लज्जित हो जाता है। वह कहता है—"मैं तो केवल शरीर खाता था, पर तुमने अपने त्याग से मेरी आत्मा को झकझोर दिया है।" गरुड़ भविष्य में कभी नागों को न खाने का संकल्प लेता है।
हर्षवर्धन यहाँ यह दार्शनिक संदेश देते हैं कि "हिंसा को शक्ति से नहीं, बल्कि चरम त्याग से ही जीता जा सकता है।"
7. बोधिसत्व आदर्श: परोपकार का विज्ञान
'नागानंद' पूरी तरह से महायान बौद्ध धर्म के 'बोधिसत्व' आदर्श पर आधारित है। बोधिसत्व वह है जो अपनी मुक्ति (निर्वाण) को रोककर दूसरों के दुख दूर करने के लिए बार-बार जन्म लेता है।
हर्षवर्धन ने इसमें 'दान पारमिता' (Perfection of Giving) का चित्रण किया है। जीमूतवाहन केवल धन नहीं, बल्कि अपना शरीर (Deha-dana) दे देता है। हर्ष ने तर्क दिया कि सच्चा राजा वही है जो अपनी प्रजा (नागों को प्रजा के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है) के लिए अपने प्राणों की भी परवाह न करे।
8. नालंदा और कन्नौज सभा: तार्किक अभिरुचि
हर्षवर्धन केवल नाटक नहीं लिखते थे, वे तर्कों के संरक्षक भी थे।
- नालंदा का संरक्षण: उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय को 100 से अधिक गाँव दान दिए। उन्होंने शीलभद्र (कुलपति) का बहुत सम्मान किया।
- कन्नौज सभा (643 ई.): ह्वेनसांग के सम्मान में उन्होंने कन्नौज में एक विशाल धर्मसभा बुलाई। इसमें 20 राजा, 3000 बौद्ध भिक्षु और 3000 ब्राह्मण विद्वान शामिल हुए। 18 दिनों तक महायान दर्शन पर शास्त्रार्थ चला। हर्ष ने चुनौती दी कि जो ह्वेनसांग के तर्कों को काटेगा, उसे पुरस्कृत किया जाएगा।
- प्रयाग मोक्ष परिषद: हर 5 साल में वे प्रयाग में अपना सब कुछ दान कर देते थे। यह 'अपरिग्रह' (Non-possession) का व्यावहारिक दर्शन था।
9. निष्कर्ष: तलवार से त्याग की यात्रा
सम्राट हर्षवर्धन का जीवन और उनका नाटक 'नागानंद' एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ वे चक्रवर्ती सम्राट थे जिसने तलवार के बल पर उत्तर भारत को एक किया, दूसरी तरफ वे 'नागानंद' के जीमूतवाहन थे जो दूसरों के लिए अपना शरीर देने को तैयार थे।
दर्शन और तर्कशास्त्र के इतिहास में हर्षवर्धन का योगदान यह है कि उन्होंने 'नैतिकता को शक्ति से ऊपर' (Ethics over Power) रखा। उन्होंने 'दयावीर' रस की रचना करके भारतीय साहित्य को एक नई दार्शनिक दिशा दी। उनका जीवन अशोक की तरह 'युद्ध से धम्म' की यात्रा थी, लेकिन अशोक ने अभिलेख लिखवाए, जबकि हर्ष ने उसे नाटक (Art) के रूप में अमर कर दिया।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- नागानंद - श्रीहर्षदेव (हिंदी व्याख्या सहित)।
- Harsha: A Political and Cultural History - R.K. Mookerji.
- हर्षचरित - बाणभट्ट।
- History of Sanskrit Literature - A.B. Keith.
- Si-Yu-Ki (Buddhist Records of the Western World) - Xuanzang.
