100 Major Music, Art & Architecture Scholars: संगीत, कला और स्थापत्य के 100 प्रमुख विद्वान

Sooraj Krishna Shastri
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संगीत, कला और स्थापत्य: भारतीय सौंदर्यबोध की त्रिवेणी

भारतीय संस्कृति में 'कला' को चौसठ विधाओं (64 Kalas) में विभाजित किया गया है, जहाँ संगीत, चित्रकला और स्थापत्य एक-दूसरे के पूरक हैं। **गांधर्ववेद** (संगीत) जहाँ श्रव्य आनंद प्रदान करता है, वहीं **वास्तुशास्त्र** (स्थापत्य) भौतिक जगत में दिव्यता का सृजन करता है। मंदिरों की नक्काशी से लेकर रागों की सूक्ष्मता तक, भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और ब्रह्म के संबंधों को कला के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।

प्रस्तुत सूची में हमने **100 ऐसे आचार्यों** को संकलित किया है जिन्होंने संगीत रत्नाकर जैसे ग्रंथों, अजंता-एलोरा जैसी कलाकृतियों और भव्य मंदिर स्थापत्य के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। यह संकलन ऋषियों की नाद-साधना और शिल्पियों की वास्तु-सिद्धि का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।

1. प्राचीन काल एवं आदि प्रणेता (वैदिक काल से 600 ई. तक)
क्रमआचार्य/शिल्पीप्रमुख योगदान/ग्रंथ
1नारद मुनि'नारद शिक्षा' (संगीत के आदि आचार्य, गांधर्ववेद)।
2भरत मुनि'नाट्यशास्त्र' (संगीत, नृत्य और अभिनय का विश्वकोश)।
3विश्वकर्मा'विश्वकर्मा प्रकाश' (वास्तु और स्थापत्य के आदि देव)।
4मय दानव'मयमतम्' (द्रविड़ स्थापत्य और विमान विद्या)।
5नग्नजित'चित्रलक्षण' (भारतीय चित्रकला का प्राचीनतम ग्रंथ)।
6दत्तल'दत्तिलम' (संगीत शास्त्र)।
7कोहल मुनिनाट्यशास्त्र के व्याख्याकार और ताल विशेषज्ञ।
8शाण्डिल्यसंगीत और भक्ति दर्शन।
9तुम्बुरुगांधर्व संगीत के प्राचीन आचार्य।
10नन्दिकेश्वर'अभिनय दर्पण' (नृत्य और भाव भंगिमा)।
11मार्कण्डेय ऋषि'विष्णुधर्मोत्तर पुराण' (चित्रकला और प्रतिमा लक्षण)।
12विशाखिलाप्राचीन संगीतज्ञ।
13कश्यप (शिल्प)'काश्यप शिल्प' (मूर्ति कला)।
14स्वातिमृदंग और वाद्य यंत्रों के आविष्कारक।
15वायु (वास्तु)प्राचीन वास्तु सिद्धांत।
16भृगु (वास्तु)वास्तु शास्त्र के १८ आचार्यों में से एक।
17अत्रि (शिल्प)प्रतिमा विज्ञान।
18वशिष्ठ (वास्तु)भवन निर्माण नियम।
19मतंग मुनि'वृहद्देशी' (राग शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग)।
20रावण (संगीत)'रावणहत्था' वाद्य और शिव ताण्डव स्तोत्र।
21गार्ग्य (संगीत)नक्षत्र और संगीत का संबंध।
22अगस्त्य (शिल्प)'सकलधिकार' (मूर्ति निर्माण)।
23उमास्वातिजैन संगीत और ब्रह्मांड कला।
24पाणिनि (छंद)ताल और लय का व्याकरण।
25पिंगल (लय)छंद और मात्रा विज्ञान।
2. मध्यकालीन विकास एवं शास्त्रीय युग (700 ई. - 1500 ई.)
क्रमआचार्यप्रमुख ग्रंथ/कला शैली
26शार्ङ्गदेव'संगीत रत्नाकर' (संगीत शास्त्र का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ)।
27पार्श्वदेव'संगीत समयसार'।
28अभिनवगुप्त'अभिनवभारती' (नाट्यशास्त्र की सर्वश्रेष्ठ टीका)।
29राजा भोज'समराङ्गणसूत्रधार' (वास्तु) और 'सरस्वतीकंठाभरण'।
30सोमेश्वर (तृतीय)'मानसोल्लास' (संगीत, चित्रकला और विलास)।
31मम्मट'काव्यप्रकाश' (सौंदर्यशास्त्र/Aesthetics)।
32मंडन सूत्रधार'राजवल्लभ' और 'देवतामूर्तिप्रकरण' (वास्तु)।
33जयदेव'गीतगोविंद' (अष्टपदी गायन परंपरा)।
34नारायण (वास्तु)'तंत्रसमुच्चय' (केरल मंदिर स्थापत्य)।
35श्रीकुमार'शिल्परत्न' (चित्रकला और मूर्ति लक्षण)।
36भुवनदेव'अपराजितपृच्छा' (वास्तुशास्त्र)।
37लोचन पंडित'राग तरंगिणी' (ठाट वर्गीकरण की नींव)।
38दामोदर पंडित'संगीत दर्पण'।
39पुण्डरीक विट्ठल'सद्रागचन्द्रोदय' (उत्तर-दक्षिण संगीत समन्वय)।
40रामामात्य'स्वरमेलकलानिधि' (कर्नाटक संगीत)।
41विद्यारण्य'संगीतसार'।
42शार्ङ्गधर (कला)चित्रकला की पश्चिमी भारतीय शैली।
43जयसिंह (वास्तु)राजस्थानी स्थापत्य।
44हर्षवर्धननाट्य कला।
45राजशेखरकाव्य और नाट्य मीमांसा।
46महाराणा कुम्भा'संगीतराज' (संगीत और वास्तु के महान संरक्षक)।
47गोविन्द भट्ट'शिल्प रत्न'।
48उद्भटअलंकार और कला सिद्धांत।
49भामहसौंदर्यशास्त्र।
50विश्वनाथ'साहित्य दर्पण' (रसात्मक कला)।
3. क्षेत्रीय शैलियाँ एवं उत्तर-मध्यकाल (1600 ई. - 1900 ई.)
क्रमआचार्य/कलाकारप्रमुख योगदान
51तानसेनध्रुपद गायन और राग दरबारी के प्रवर्तक।
52स्वामी हरिदासभक्ति संगीत और ध्रुपद परंपरा।
53पुरन्दर दासकर्नाटक संगीत के पितामह।
54त्यागराजकर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति (पंचरत्न कृतियाँ)।
55मुथुस्वामी दीक्षितकर्नाटक संगीत (संस्कृत कृतियाँ)।
56श्यामा शास्त्रीकर्नाटक संगीत त्रिमूर्ति।
57वेंकटमखी'चतुर्दण्डिप्रकाशिका' (72 मेलकर्ता पद्धति)।
58अहोबल'संगीत पारिजात' (वीणा के तारों पर स्वर स्थापना)।
59भावभट्ट'अनुप संगीत रत्नाकर'।
60श्रीनिवास'राग तत्व विबोध'।
61राजा मानसिंह तोमर'मानकुतूहल' (ध्रुपद का प्रचार)।
62स्वाति तिरुनलकेरल के संगीतज्ञ राजा।
63अमीर खुसरोसितार, तबला और खयाल (भारतीय-फारसी समन्वय)।
64सदारंग-अदारंगखयाल गायकी को लोकप्रिय बनाया।
65नागेश भट्ट (कला)सौंदर्यशास्त्र व्याख्या।
66ठक्कुर फेरू'वास्तुसार' और रत्न कला।
67बिहारी दासरीति चित्रकला सिद्धांत।
68निहाल चन्दबनी-ठनी (किशनगढ़ शैली) के चित्रकार।
69मन्सूरमुगल कालीन चित्रकला (प्रकृति चित्रण)।
70सवाई जयसिंहजंतर-मंतर और जयपुर नगर स्थापत्य।
71विट्ठल (संगीत)'रागमाला'।
72सोमनाथ'राग विबोध'।
73हृदयनारायण देव'हृदय प्रकाश'।
74गोविन्द दीक्षिततंजौर संगीत परंपरा।
75तुलजेन्द्र'संगीत सारामृत'।
4. आधुनिक युग एवं कला समीक्षक (1900 ई. - वर्तमान)
क्रमविद्वानप्रमुख योगदान
76विष्णु नारायण भातखण्डेशास्त्रीय संगीत का आधुनिक स्वरलिपि और ठाट पद्धति।
77विष्णु दिगम्बर पलुस्करसंगीत का जन-प्रसार (गंधर्व महाविद्यालय)।
78आनन्द कुमारस्वामीभारतीय कला के दर्शन और इतिहास के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याता।
79ई.बी. हैवेलभारतीय कला के आध्यात्मिक पक्ष को उजागर किया।
80स्टेला क्रैम्रिश'The Hindu Temple' (मंदिर स्थापत्य शोध)।
81कपिला वात्स्यायनकलाओं के अंतर्संबंधों पर वृहद् शोध।
82राजा रवि वर्माभारतीय चित्रों का आधुनिक और पौराणिक समन्वय।
83अवनिन्द्रनाथ टैगोरबंगाल स्कूल ऑफ आर्ट के प्रवर्तक।
84नन्दलाल बोससंविधान की कलात्मक सज्जा और कला गुरु।
85पी.के. गोडेकला और संगीत के इतिहास पर शोध।
86ओ.सी. गांगुली'Ragas and Raginis' (संगीत-चित्रकला शोध)।
87एलिस बोनरकोणार्क मंदिर स्थापत्य का ज्यामितीय विश्लेषण।
88एस.के. सरस्वतीभारतीय स्थापत्य का इतिहास।
89वासुदेव शरण अग्रवालभारतीय कला और संस्कृति का प्रतीकवाद।
90अच्युत कानिन्धेआधुनिक भारतीय स्थापत्य (Modern Architecture)।
91बी.वी. दोशीप्रित्ज़कर पुरस्कार विजेता वास्तुकार।
92राय कृष्णदास'भारत की चित्रकला' और कला भवन काशी।
93पी.वी. जनकीरमनमूर्तिकला शोध।
94मुल्कराज आनन्द'Marg' पत्रिका और कला समीक्षा।
95ए. घोषअजंता और प्राचीन भित्ति चित्र शोध।
96ठाकुर जयदेव सिंहसंगीत दर्शन और मध्यकालीन संगीत शोध।
97वी. राघवनसंगीत और नाट्य परंपरा पर संस्कृत शोध।
98शार्ङ्गदेव (आधुनिक)कला मीमांसा।
99प्रेमलता शर्मासंगीत रत्नाकर का आधुनिक संपादन और शोध।
100गोस्वामी सी.जी.कला और आध्यात्म का समन्वय।
निष्कर्ष: कला - ब्रह्म की अभिव्यक्ति

संगीत, कला और स्थापत्य के ये 100 विद्वान उस सत्य के साक्षी हैं कि भारत में कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना है। जहाँ **नाद** से ब्रह्म की प्राप्ति होती है, वहीं **शिल्प** से पदार्थ में प्राण फूँके जाते हैं। इन मनीषियों ने खजुराहो के मंदिरों, तंजौर की कला और शास्त्रीय रागों के माध्यम से भारत को 'विश्व गुरु' की पहचान दी।

**आनन्द कुमारस्वामी** ने सच ही कहा था कि "भारतीय कला का उद्देश्य केवल सुंदर दिखना नहीं, बल्कि उस अनंत सत्य का संकेत देना है।" **भगवत दर्शन** का यह प्रयास उन सभी ज्ञात-अज्ञात कलाकारों और ऋषियों को नमन है जिन्होंने हमारी संस्कृति को जीवंत बनाए रखा।

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