आचार्य बलदेव उपाध्याय: भारतीय दर्शन के 'हिंदी विश्वकोश' और काशी के मूर्धन्य विद्वान | Baldev Upadhyaya

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य बलदेव उपाध्याय: भारतीय दर्शन और संस्कृत साहित्य के आधुनिक 'व्यास'

आचार्य बलदेव उपाध्याय: भारतीय दर्शन के 'हिंदी विश्वकोश' और काशी के मूर्धन्य विद्वान

एक विस्तृत अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह विद्वान जिसने भारतीय दर्शन और संस्कृत साहित्य को अंग्रेजी की दासता से मुक्त कर 'हिंदी' में प्रतिष्ठित किया (The Encyclopedia of Indian Philosophy in Hindi)

बीसवीं सदी में जब भारतीय दर्शन (Indian Philosophy) पर लिखने वाले अधिकतर विद्वान (जैसे डॉ. राधाकृष्णन, एस.एन. दासगुप्ता) अंग्रेजी भाषा का प्रयोग कर रहे थे, तब काशी (वाराणसी) में एक ऐसे विद्वान का उदय हुआ जिन्होंने संकल्प लिया कि वे भारत की विद्या को भारत की भाषा (हिंदी) में ही प्रस्तुत करेंगे। वे थे—आचार्य बलदेव उपाध्याय (Acharya Baldev Upadhyaya)।

उन्हें "आधुनिक युग का वाचस्पति मिश्र" कहा जा सकता है। उन्होंने वेदों, उपनिषदों, बौद्ध धर्म, वैष्णव संप्रदायों और शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत पर इतना विशाल और प्रामाणिक साहित्य रचा कि आज कोई भी हिंदी भाषी छात्र उनके ग्रंथों के बिना भारतीय दर्शन को नहीं समझ सकता।

📌 आचार्य बलदेव उपाध्याय: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम आचार्य बलदेव उपाध्याय
जीवन काल 10 अक्टूबर 1899 – 10 अगस्त 1999 (लगभग 100 वर्ष)
जन्म स्थान सोनबरसा, बलिया (उत्तर प्रदेश)
कर्मभूमि काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU), वाराणसी
पद विभागाध्यक्ष (संस्कृत), अनुसंधान संस्थान (वाराणसी)
महानतम कृति भारतीय दर्शन, संस्कृत साहित्य का इतिहास, श्री शंकराचार्य
सम्मान पद्म भूषण (1983), साहित्य अकादमी पुरस्कार, मंगलाप्रसाद पारितोषिक
विशेष योगदान दर्शन और इतिहास का हिंदी में लेखन

2. जीवन परिचय: बलिया से बी.एच.यू. तक

बलदेव उपाध्याय का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में एक संस्कारवान ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पारंपरिक संस्कृत पाठशालाओं में हुई, जहाँ उन्होंने व्याकरण और काव्य का गहन अध्ययन किया।

काशी आगमन: उच्च शिक्षा के लिए वे वाराणसी आए और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से जुड़े। वहां वे महामना मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आए, जिन्होंने उन्हें शोध और लेखन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने BHU में दशकों तक संस्कृत और दर्शन का अध्यापन किया। उनका जीवन काशी की उस परंपरा का प्रतीक था जहाँ "सरस्वती" (ज्ञान) ही जीवन का एकमात्र ध्येय होती है।

3. 'भारतीय दर्शन': हिंदी जगत की अमूल्य निधि

उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक "भारतीय दर्शन" है। यह पुस्तक हिंदी पाठकों के लिए 'गीता' के समान है।

ग्रंथ की विशेषताएं
  • समग्रता: इसमें उन्होंने आस्तिक (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत) और नास्तिक (चार्वाक, जैन, बौद्ध) सभी दर्शनों का विस्तृत विवेचन किया है।
  • सरलता: संस्कृत के कठिन दार्शनिक शब्दों (जैसे 'अपूर्व', 'समवाय', 'विवर्त') को उन्होंने अत्यंत सरल हिंदी में समझाया है।
  • निष्पक्षता: उन्होंने किसी एक मत का समर्थन न करके इतिहासकार की तरह सभी मतों को उनके शुद्ध रूप में प्रस्तुत किया।

यह पुस्तक आज भी आईएएस (IAS) और विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए आधारभूत पाठ्यपुस्तक (Standard Textbook) है।

4. संस्कृत साहित्य का इतिहास: वैदिक और लौकिक

पाश्चात्य विद्वानों (कीथ, मैकडोनेल) ने संस्कृत साहित्य का इतिहास लिखा था, लेकिन उसमें कई पूर्वाग्रह थे। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने भारतीय दृष्टि से दो महान ग्रंथ लिखे:

  1. संस्कृत साहित्य का इतिहास: इसमें कालिदास, बाणभट्ट, भवभूति आदि कवियों का काल-निर्धारण और उनकी कृतियों का रसास्वादन है।
  2. वैदिक साहित्य और संस्कृति: इसमें उन्होंने वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों और उपनिषदों की विस्तृत समीक्षा की है।

उन्होंने सिद्ध किया कि संस्कृत साहित्य केवल 'कर्मकांड' या 'शृंगार' नहीं है, बल्कि उसमें विज्ञान, राजनीति और समाजशास्त्र भी निहित है।

5. शंकराचार्य और अद्वैत पर शोध

आचार्य जी का विशेष प्रेम आदि शंकराचार्य और अद्वैत वेदांत के प्रति था। उन्होंने "श्री शंकराचार्य" नामक एक शोधपूर्ण जीवनी लिखी।

इस ग्रंथ में उन्होंने शंकराचार्य के काल (Date) के विवाद को सुलझाने का प्रयास किया और उनके दार्शनिक व ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने शंकराचार्य को केवल एक दार्शनिक नहीं, बल्कि एक 'राष्ट्र-निर्माता' और 'संगठनकर्ता' (Organizer) के रूप में प्रस्तुत किया जिन्होंने चार मठों की स्थापना करके भारत को एक सूत्र में बांधा।

6. पुराण विमर्श और आगम साहित्य

प्रायः विद्वान वेदों को तो महत्व देते थे, लेकिन पुराणों और आगमों (तंत्र) को 'गौण' मानते थे। बलदेव उपाध्याय ने इस भ्रांति को तोड़ा।

  • पुराण विमर्श: इस ग्रंथ में उन्होंने 18 महापुराणों का विश्लेषण किया और बताया कि पुराण भारतीय संस्कृति के विश्वकोश (Encyclopedia) हैं।
  • भारतीय धर्म और संप्रदाय: इसमें उन्होंने वैष्णव (पाञ्चरात्र), शैव (पाशुपत, वीरशैव) और शाक्त आगमों का दार्शनिक विवेचन किया। उन्होंने दिखाया कि भक्ति और तंत्र का दर्शन वेदों के दर्शन से कम गहरा नहीं है।

7. हिंदी भाषा में दार्शनिक लेखन का महत्व

आचार्य बलदेव उपाध्याय का सबसे बड़ा योगदान हिंदी भाषा के प्रति है। उन्होंने दर्शन जैसी क्लिष्ट विषयवस्तु के लिए हिंदी में एक नई शब्दावली (Terminology) गढ़ी।

"अपनी भाषा में ज्ञान प्राप्त करना और उसे अभिव्यक्त करना ही सच्ची स्वाधीनता है। जब तक हम दर्शन को अंग्रेजी के चश्मे से देखेंगे, हम उसकी आत्मा तक नहीं पहुँच पाएंगे।" — आचार्य बलदेव उपाध्याय के विचारों का सार

उन्होंने 'प्रांजल हिंदी' (Lucid Hindi) का प्रयोग किया जो न तो अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ थी और न ही उर्दू मिश्रित। उनकी शैली को 'व्यास-शैली' (विस्तार से समझाने वाली) कहा जाता है।

8. राधाकृष्णन और बलदेव उपाध्याय: एक तुलना

बिंदु डॉ. राधाकृष्णन आचार्य बलदेव उपाध्याय
भाषा अंग्रेजी (English). हिंदी (Hindi).
लक्ष्य पाठक पाश्चात्य जगत और अंग्रेजी शिक्षित भारतीय। हिंदी भाषी छात्र और आम भारतीय।
दृष्टिकोण तुलनात्मक (Comparative) - कांट/हीगल से तुलना। परंपरागत और ऐतिहासिक (Traditional & Historical).
क्षेत्र वैश्विक दर्शन। शुद्ध भारतीय परंपरा।

9. निष्कर्ष: ज्ञान परंपरा के संवाहक

आचार्य बलदेव उपाध्याय ने लगभग 100 वर्षों का दीर्घ और सक्रिय जीवन जिया। उन्होंने 40 से अधिक मौलिक ग्रंथों की रचना की। उन्हें सरकार ने 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया, जो उनकी तपस्या का सम्मान था।

वे आधुनिक भारत के वे ऋषि थे जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हिंदी भाषा केवल कहानियों और कविताओं की भाषा बनकर न रह जाए, बल्कि वह 'गंभीर चिंतन' (Serious Thought) की भाषा बने। आज यदि हिंदी में दर्शनशास्त्र जीवित है, तो उसकी नींव की ईंट आचार्य बलदेव उपाध्याय हैं।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • भारतीय दर्शन - आचार्य बलदेव उपाध्याय (चौखम्बा ओरियंटालिया)।
  • संस्कृत साहित्य का इतिहास - बलदेव उपाध्याय।
  • पुराण विमर्श - बलदेव उपाध्याय।
  • बौद्ध दर्शन मीमांसा - बलदेव उपाध्याय।
  • आचार्य बलदेव उपाध्याय: व्यक्तित्व एवं कृतित्व - अभिनन्दन ग्रंथ।

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