डॉ. पी.वी. काणे: 'धर्मशास्त्र का इतिहास' के रचयिता और भारत रत्न विभूति
एक विस्तृत अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: वह विद्वान जिसने भारत के हजारों वर्षों के कानूनी और सामाजिक इतिहास को 6,500 पृष्ठों में संजोया (The Chronicler of Dharma)
- 1. प्रस्तावना: एक व्यक्ति, एक संस्था
- 2. जीवन परिचय: रत्नागिरी से बॉम्बे हाई कोर्ट तक
- 3. 'धर्मशास्त्र का इतिहास': 37 वर्षों का महायज्ञ
- 4. महाग्रंथ की विषयवस्तु: वेद से निबंध तक
- 5. समाज सुधार और शास्त्र: रूढ़िवादिता का खंडन
- 6. साहित्य शास्त्र और अन्य कृतियाँ
- 7. शोध पद्धति: वकील की तरह विश्लेषण
- 8. भारत रत्न और सम्मान
- 9. निष्कर्ष: आधुनिक भारत के व्यास
भारतीय विद्या (Indology) के इतिहास में महामहोपाध्याय डॉ. पांडुरंग वामन काणे (Dr. P.V. Kane) का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे केवल एक संस्कृत पंडित नहीं थे, बल्कि एक कुशल वकील (Lawyer) और समाज सुधारक भी थे।
उन्होंने अपने जीवन के अनमोल 40 वर्ष एक ही ग्रंथ को लिखने में लगा दिए—"History of Dharmaśāstra" (धर्मशास्त्र का इतिहास)। यह ग्रंथ 5 विशाल खंडों और लगभग 6,500 पृष्ठों में फैला है। यह दुनिया के किसी भी एक लेखक द्वारा लिखे गए सबसे महान अकादमिक कार्यों में से एक माना जाता है। उनकी विद्वत्ता का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1963 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से अलंकृत किया।
| पूरा नाम | पांडुरंग वामन काणे (Pandurang Vaman Kane) |
| काल | 7 मई 1880 – 18 अप्रैल 1972 (91 वर्ष) |
| जन्म स्थान | परशराम, चिपलूण (रत्नागिरी, महाराष्ट्र) |
| पेशा | वकील (बॉम्बे हाई कोर्ट), संस्कृत विद्वान, कुलपति (मुंबई वि.वि.) |
| महानतम कृति | History of Dharmaśāstra (5 Volumes) |
| अन्य कृतियाँ | कादम्बरी (संपादन), साहित्यदर्पण (संपादन), हर्षचरित |
| सम्मान | भारत रत्न (1963), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956) |
| उपाधि | महामहोपाध्याय (1942) |
2. जीवन परिचय: रत्नागिरी से बॉम्बे हाई कोर्ट तक
डॉ. काणे का जन्म महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में एक मध्यमवर्गीय चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दापोली में हुई। बचपन से ही उनमें संस्कृत श्लोकों को कंठस्थ करने की अद्भुत क्षमता थी।
करियर: उन्होंने विल्सन कॉलेज, मुंबई से बी.ए. और एम.ए. किया। शुरुआत में उन्होंने एक स्कूल शिक्षक और कॉलेज व्याख्याता के रूप में काम किया। बाद में, उन्होंने कानून (Law) की पढ़ाई की और बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत शुरू की। कानून की उनकी समझ ने उन्हें प्राचीन धर्मशास्त्रों (Smritis) की जटिल गुत्थियों को सुलझाने में बहुत मदद की।
3. 'धर्मशास्त्र का इतिहास': 37 वर्षों का महायज्ञ
डॉ. काणे की अमर कीर्ति का आधार उनका ग्रंथ "History of Dharmaśāstra" है। यह कार्य 1930 में शुरू हुआ और 1962 में पांचवें खंड के प्रकाशन के साथ पूरा हुआ।
यह ग्रंथ प्राचीन और मध्यकालीन भारत के धार्मिक और नागरिक कानूनों (Civil Law) का विश्वकोश है।
- खंड 1: धर्मशास्त्र के स्रोतों (वेद, स्मृति, पुराण, निबंध) का परिचय और काल-निर्धारण।
- खंड 2: वर्ण, आश्रम, संस्कार (विवाह, उपनयन आदि)।
- खंड 3: राजधर्म (Politics), व्यवहार (Law) और सदाचार।
- खंड 4: पातक (Sins), प्रायश्चित और श्राद्ध।
- खंड 5: व्रत, उत्सव और शांति कर्म।
काणे ने इसके लिए हजारों पांडुलिपियों (Manuscripts) को पढ़ा जो एशियाटिक सोसाइटी और अन्य पुस्तकालयों में धूल खा रही थीं।
4. महाग्रंथ की विषयवस्तु: वेद से निबंध तक
इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल अनुवाद नहीं है, बल्कि एक आलोचनात्मक इतिहास (Critical History) है।
- काल निर्धारण (Chronology): काणे ने मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति और बाद के निबंध ग्रंथों (जैसे मिताक्षरा, दायभाग) का वैज्ञानिक काल-निर्धारण किया।
- विकासवाद: उन्होंने दिखाया कि हिंदू कानून कभी स्थिर (Static) नहीं रहा। वैदिक काल से लेकर 18वीं सदी तक इसमें लगातार बदलाव होते रहे। जैसे, नियोग प्रथा पहले मान्य थी, बाद में निषिद्ध हो गई।
5. समाज सुधार और शास्त्र: रूढ़िवादिता का खंडन
डॉ. काणे केवल एक 'पुरातत्ववेत्ता' नहीं थे, वे एक आधुनिक विचारक थे। उन्होंने शास्त्रों के अपने ज्ञान का उपयोग समाज सुधार के लिए किया।
प्रमुख तर्क:
1. छुआछूत (Untouchability): उन्होंने धर्मशास्त्रों के हवाले से सिद्ध किया कि प्राचीन काल में छुआछूत का वह रूप नहीं था जो आज है। उन्होंने इसे समाज के लिए कलंक बताया।
2. विधवा विवाह: उन्होंने पराशर स्मृति और नारद स्मृति के श्लोकों (नष्टे मृते प्रव्राजिते...) का उदाहरण देकर बताया कि प्राचीन काल में विधवा विवाह की अनुमति थी।
3. सती प्रथा: उन्होंने ऋग्वेद और गृह्यसूत्रों के आधार पर सिद्ध किया कि सती प्रथा वैदिक काल में नहीं थी, यह बाद की कुरीति है।
उनके तर्कों ने हिंदू कोड बिल (Hindu Code Bill) के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
6. साहित्य शास्त्र और अन्य कृतियाँ
धर्मशास्त्र के अलावा, उन्होंने संस्कृत साहित्य (Poetics/Alankara Shastra) पर भी अधिकारपूर्ण कार्य किया।
- साहित्यदर्पण: विश्वनाथ कविराज के इस ग्रंथ का उन्होंने विस्तृत भूमिका और टिप्पणियों के साथ संपादन किया।
- हर्षचरित और कादम्बरी: बाणभट्ट की इन कठिन गद्य रचनाओं पर उनकी टीकाएं छात्रों के लिए आज भी अनिवार्य हैं। उन्होंने बाणभट्ट के समय के समाज और भूगोल का विस्तृत नक्शा खींचा।
7. शोध पद्धति: वकील की तरह विश्लेषण
डॉ. काणे की लेखन शैली में एक वकील की तार्किकता झलकती है। वे किसी भी बात को बिना प्रमाण (Citation) के नहीं लिखते थे।
निष्पक्षता: वे भारतीय संस्कृति के प्रेमी थे, लेकिन अंधभक्त नहीं। जहाँ स्मृतियों में अन्यायपूर्ण बातें (जैसे शूद्रों के प्रति कठोर दंड) थीं, उन्होंने उनकी आलोचना की और उन्हें 'उस समय की आवश्यकता' बताकर खारिज किया, न कि ईश्वरीय आदेश मानकर स्वीकार किया। उनका दृष्टिकोण ऐतिहासिक (Historical) और विकासवादी (Evolutionary) था।
8. भारत रत्न और सम्मान
1963 में, भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। यह सम्मान पाने वाले वे पहले और अब तक के एकमात्र विशुद्ध संस्कृत विद्वान हैं।
- वे एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई के उपाध्यक्ष रहे और उसे एक विश्वस्तरीय शोध संस्थान बनाने में मदद की।
- 1953 से 1959 तक वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे।
- उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956) भी मिला।
9. निष्कर्ष: आधुनिक भारत के व्यास
डॉ. पी.वी. काणे ने भारत को उसकी अपनी कानूनी और सामाजिक विरासत वापस दिलाई। उन्होंने दिखाया कि भारत का अतीत केवल 'पुजारियों' का इतिहास नहीं है, बल्कि एक व्यवस्थित 'कानून और व्यवस्था' (Law and Order) का इतिहास है।
आज यदि हम जानते हैं कि 'स्त्रीधन' क्या है, या 'दत्तक' (Adoption) के नियम कैसे बदले, तो इसका श्रेय काणे जी को जाता है। उनका "धर्मशास्त्र का इतिहास" आज भी भारत के सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों में हिंदू कानून के मामलों में एक प्रमाण (Authority) के रूप में उद्धृत किया जाता है। वे आधुनिक युग के व्यास थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- History of Dharmaśāstra (Vol I-V) - P.V. Kane (Bhandarkar Oriental Research Institute).
- Hindu Customs and Modern Law - P.V. Kane.
- History of Sanskrit Poetics - P.V. Kane.
- Dr. P.V. Kane: A Tribute - Asiatic Society of Mumbai.
