पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर: वेदों के 'सुबोध' भाष्यकार और 'सूर्य नमस्कार' के प्रणेता
एक विस्तृत जीवन-दर्शन: वह चित्रकार जिसने 101 वर्षों का यशस्वी जीवन जिया और वेदों को 'पुस्तकालयों' से निकालकर 'किसानों और गृहस्थों' तक पहुँचाया (The Modern Sage of Vedic Renaissance)
- 1. प्रस्तावना: कला से वेदों तक की यात्रा
- 2. जीवन परिचय: सावंतवाड़ी से पारडी तक
- 3. चित्रकार सातवलेकर: तूलिका का जादू
- 4. स्वाध्याय मंडल (पारडी): वेदों का पावरहाउस
- 5. 'सुबोध वेद भाष्य': वेदों का लोकतंत्रीकरण
- 6. वैदिक राष्ट्रवाद: इंद्र और पुरुषार्थ की नई व्याख्या
- 7. सूर्य नमस्कार और स्वास्थ्य: 'जीवेम शरदः शतम्'
- 8. स्वतंत्रता संग्राम और राजनीतिक विचार
- 9. निष्कर्ष: शतायु कर्मयोगी
आधुनिक भारत में वेदों के पुनरुद्धार की चर्चा महर्षि दयानंद और श्री अरविंद के बिना अधूरी है, लेकिन इन दोनों के विचारों को जमीनी स्तर पर उतारने और सरल हिंदी में वेदों को घर-घर पहुँचाने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को जाता है, तो वे हैं—पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर (Pt. Shripad Damodar Satwalekar)।
सातवलेकर जी (1867–1968) एक बहुआयामी प्रतिभा थे। वे एक विश्वप्रसिद्ध चित्रकार थे, एक स्वतंत्रता सेनानी थे, और एक ऐसे वैदिक विद्वान थे जिन्होंने 101 वर्ष की आयु तक निरोगी जीवन जीकर वेदों के उस मंत्र को सिद्ध किया कि "मनुष्य 100 वर्षों तक कर्म करता हुआ जीने की इच्छा करे।"
| पूरा नाम | श्रीपाद दामोदर सातवलेकर |
| जीवन काल | 19 सितंबर 1867 – 31 जुलाई 1968 (101 वर्ष) |
| जन्म स्थान | कोलगांव, सावंतवाड़ी (महाराष्ट्र) |
| संस्थापक | स्वाध्याय मंडल (Swadhyay Mandal), पारडी (गुजरात) |
| प्रमुख कृति | सुबोध वेद भाष्य (चारों वेद), वैदिक व्याख्यानमाला, महाभारत (हिंदी अनुवाद) |
| विशिष्ट योगदान | सूर्य नमस्कार का प्रचार, वैदिक राष्ट्रवाद |
| सम्मान | पद्म भूषण (1968) |
| पेशा (आरंभिक) | चित्रकार (जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स) |
2. जीवन परिचय: सावंतवाड़ी से पारडी तक
श्रीपाद सातवलेकर का जन्म महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में सावंतवाड़ी रियासत के एक छोटे से गाँव में हुआ था। उनके पिता एक पारंपरिक वेदपाठी ब्राह्मण और चित्रकार थे। बालक श्रीपाद को विरासत में दो चीजें मिलीं—संस्कृत और कला।
संघर्ष: बचपन में गरीबी इतनी थी कि कई बार एक वक्त का भोजन भी नसीब नहीं होता था। उन्होंने मुंबई के प्रसिद्ध सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट (J.J. School of Art) में प्रवेश लिया और अपनी चित्रकला के बल पर छात्रवृत्ति प्राप्त की।
हैदराबाद और औंध: अपनी कला के कारण वे हैदराबाद और बाद में औंध रियासत में रहे। लेकिन उनका मन केवल चित्रों में नहीं लगा। लोकमान्य तिलक और एनी बेसेंट के संपर्क में आने के बाद, उन्होंने अनुभव किया कि भारत की असली शक्ति उसके वेदों में छिपी है, जो लुप्त हो रही है। 1918 में, 50 वर्ष की आयु में, उन्होंने सब कुछ छोड़कर वेदों के प्रचार का संकल्प लिया।
3. चित्रकार सातवलेकर: तूलिका का जादू
वेद-भाष्यकार बनने से पहले सातवलेकर जी भारत के शीर्ष चित्रकारों में गिने जाते थे। यह उनके व्यक्तित्व का एक रोचक पहलू है।
- राजा रवि वर्मा के समकक्ष: उनकी चित्रकला शैली यथार्थवादी (Realistic) थी। उन्होंने कई राजा-महाराजाओं के पोर्ट्रेट बनाए।
- मेयो स्कूल, लाहौर: वे कुछ समय के लिए मेयो स्कूल ऑफ आर्ट (लाहौर) के उप-प्रधानाचार्य भी रहे।
- फोटोग्राफी स्टूडियो: उन्होंने हैदराबाद में एक सफल फोटोग्राफी स्टूडियो भी चलाया।
लेकिन एक दिन, जब वे एक चित्र बना रहे थे, उनके मन में विचार आया: "मैं इन नश्वर शरीरों के चित्र बनाकर क्या पाऊँगा? मुझे उस 'सनातन सत्य' (वेद) का चित्र बनाना चाहिए जो कभी नहीं मरता।" और उन्होंने तूलिका (Brush) छोड़कर लेखनी (Pen) उठा ली।
4. स्वाध्याय मंडल (पारडी): वेदों का पावरहाउस
सातवलेकर जी का सबसे महान स्मारक 'स्वाध्याय मंडल' (Swadhyay Mandal) है। पहले यह संस्था सतारा (महाराष्ट्र) में थी, लेकिन बाद में वे गुजरात के वलसाड जिले के पारडी (Pardi) नामक स्थान पर बस गए।
पारडी में उन्होंने एक विशाल 'वैदिक प्रिंटिंग प्रेस' स्थापित की। वहां उन्होंने स्वयं कामगारों के साथ मिलकर वेदों के टाइप सेट किए। यह संस्था वेदों के प्रकाशन का एक बड़ा केंद्र बन गई।
उद्देश्य: "वेदों को संस्कृत के पंडितों की अलमारी से निकालकर सामान्य गृहस्थ के घर तक पहुँचाना।"
5. 'सुबोध वेद भाष्य': वेदों का लोकतंत्रीकरण
सातवलेकर जी की कीर्ति का आधार उनका 'सुबोध वेद भाष्य' (Subodh Veda Bhashya) है। उन्होंने चारों वेदों का हिंदी और मराठी में अनुवाद किया।
मध्यकालीन भाष्यकार सायण ने वेदों का अर्थ 'कर्मकांड' (यज्ञ) की दृष्टि से किया था। पश्चिमी विद्वान (मैक्स मूलर) उसे 'प्राकृतिक शक्तियों की पूजा' मानते थे।
सातवलेकर जी ने 'आधिदैविक' और 'आधिभौतिक' दोनों दृष्टियों का समन्वय किया। उन्होंने कहा कि वेद मानव जीवन को उन्नत बनाने का विज्ञान है। उनकी भाषा इतनी सरल (सुबोध) थी कि कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी वेदों का अर्थ समझ सकता था।
उन्होंने 'वैदिक व्याख्यानमाला' के माध्यम से वेद मंत्रों में छिपे राजनीति, समाजशास्त्र और विज्ञान के सूत्रों को उजागर किया।
6. वैदिक राष्ट्रवाद: इंद्र और पुरुषार्थ की नई व्याख्या
सातवलेकर जी ने वेदों में छिपे 'राष्ट्रवाद' (Nationalism) को खोजा।
- इंद्र का स्वरूप: उन्होंने सिद्ध किया कि वेदों का 'इंद्र' कोई भोग-विलास में डूबा देवता नहीं, बल्कि वह 'राष्ट्र का नेता' और शक्ति का प्रतीक है जो शत्रुओं (वृत्र) का नाश करता है।
- राष्ट्र की प्रार्थना: यजुर्वेद का मंत्र "आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्..." (हमारे राष्ट्र में ब्राह्मण ज्ञानी हों, क्षत्रिय महारथी हों...) का उन्होंने इतना सुंदर विवेचन किया कि यह स्वतंत्रता सेनानियों का प्रेरणा गीत बन गया।
- संगठन सूक्त: ऋग्वेद के अंतिम सूक्त (संगच्छध्वं संवदध्वं...) को उन्होंने राष्ट्रीय एकता का मूल मंत्र बताया।
7. सूर्य नमस्कार और स्वास्थ्य: 'जीवेम शरदः शतम्'
पंडित सातवलेकर केवल "किताबी पंडित" नहीं थे; वे शारीरिक रूप से अत्यंत बलिष्ठ थे। वे औंध के राजा भवानराव पंत प्रतिनिधि के साथ मिलकर 'सूर्य नमस्कार' (Sun Salutation) के प्रचारक बने।
सातवलेकर जी का मानना था कि "कमजोर शरीर में वेद ज्ञान नहीं टिक सकता" (नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः)।
उन्होंने "सूर्य नमस्कार" नामक पुस्तक लिखी जो आज भी इस विषय पर सबसे प्रामाणिक पुस्तक मानी जाती है। वे स्वयं प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करते थे और 100 वर्ष की आयु तक उनकी दृष्टि और स्मृति पूरी तरह ठीक थी। उन्होंने वेदों के स्वास्थ्य सूत्रों को जीवन में उतारकर दिखाया।
8. स्वतंत्रता संग्राम और राजनीतिक विचार
सातवलेकर जी लोकमान्य तिलक के अनुयायी थे। उनके लेखों में राष्ट्रवाद की ऐसी आग थी कि ब्रिटिश सरकार ने उनकी कई पुस्तकों (जैसे 'वैदिक राष्ट्रगीत') को जब्त कर लिया था।
आर.एस.एस. (RSS) से संबंध: संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर, सातवलेकर जी का बहुत सम्मान करते थे। सातवलेकर जी का मानना था कि भारत का पुनरुत्थान केवल राजनीति से नहीं, बल्कि वैदिक संस्कृति के पुनर्जागरण से होगा। वेदों के 'संगठन' और 'शक्ति' के संदेश को उन्होंने युवाओं तक पहुँचाया।
9. निष्कर्ष: शतायु कर्मयोगी
1968 में 101 वर्ष की आयु में जब पंडित सातवलेकर का देहांत हुआ, तब तक वे अपना कार्य कर रहे थे। उन्हें भारत सरकार ने 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया था।
उनका जीवन संदेश देता है कि वेद केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला हैं।
आज यदि हम वेदों को हिंदी में आसानी से पढ़ सकते हैं, तो इसका श्रेय 'स्वाध्याय मंडल' के इस तपस्वी को जाता है। उन्होंने वेदों को गुफाओं से निकालकर खेतों, कारखानों और व्यायामशालाओं तक पहुँचा दिया। वे आधुनिक युग के 'वेद-व्यास' थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- सुबोध वेद भाष्य (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) - पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर।
- वैदिक व्याख्यानमाला - सातवलेकर।
- सूर्य नमस्कार - सातवलेकर (स्वाध्याय मंडल प्रकाशन)।
- महाभारत (हिंदी अनुवाद) - सातवलेकर।
- संस्कृति के चार अध्याय - रामधारी सिंह दिनकर (सातवलेकर जी का उल्लेख)।
