आचार्य भद्रबाहु: अंतिम श्रुतकेवली, चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु और दक्षिण भारत में जैन धर्म के प्रवर्तक | Acharya Bhadrabahu

Sooraj Krishna Shastri
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आचार्य भद्रबाहु: अंतिम 'श्रुतकेवली' और जैन धर्म के महान युगपुरुष

आचार्य भद्रबाहु: अंतिम 'श्रुतकेवली', चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु और दक्षिण भारत में जैन धर्म के प्रवर्तक

जैन धर्म के गौरवशाली इतिहास में आचार्य भद्रबाहु (Acharya Bhadrabahu) का नाम एक ऐसे ध्रुव तारे की तरह चमकता है, जिसने घोर अंधकार में धर्म का मार्गदर्शन किया। वे अंतिम 'श्रुतकेवली' (जिन्हें सभी 12 अंगों का पूर्ण ज्ञान था) माने जाते हैं। उनका जीवन त्याग और तपस्या की पराकाष्ठा है। उन्होंने ही मगध के चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य को जैन धर्म में दीक्षित किया और उन्हें राजपाठ त्यागकर एक दिगंबर मुनि बना दिया। दक्षिण भारत में जैन धर्म का प्रसार और 'श्रवणबेलगोला' का तीर्थ रूप में विकास उन्हीं की देन है।

📌 आचार्य भद्रबाहु: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम आचार्य भद्रबाहु (Acharya Bhadrabahu)
उपाधि अंतिम श्रुतकेवली (Last Sruta Kevali)
काल ईसा पूर्व चौथी शताब्दी (लगभग 325-297 ई.पू.)
जन्म स्थान देवकोट, पुण्ड्रवर्धन (उत्तरी बंगाल)
प्रमुख शिष्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, विशाखाचार्य
निर्वाण स्थल चंद्रगिरि पर्वत, श्रवणबेलगोला (कर्नाटक)
प्रमुख रचनाएँ कल्पसूत्र (Kalpa Sutra), भद्रबाहु संहिता, उवसग्गहरं स्तोत्र

2. जन्म और बाल्यकाल: पुण्ड्रवर्धन से दीक्षा तक

आचार्य भद्रबाहु का जन्म प्राचीन भारत के पुण्ड्रवर्धन (वर्तमान उत्तरी बंगाल) के देवकोट नगर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सोमशर्मा और माता का नाम सोमश्री था।

बचपन से ही वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। एक बार जैन आचार्य यशोभद्र उनके नगर में पधारे। उन्होंने बालक भद्रबाहु की विलक्षण प्रतिभा को पहचाना और उनके माता-पिता से उन्हें संघ के लिए मांग लिया। भद्रबाहु ने मुनि दीक्षा ली और जैन आगमों का गहन अध्ययन प्रारंभ किया। अपनी कठोर तपस्या और ज्ञान के बल पर वे जल्द ही संघ के आचार्य पद पर आसीन हुए।

3. अंतिम श्रुतकेवली: 12 अंगों का ज्ञान

जैन परंपरा में 'केवली' वह होता है जिसे पूर्ण ज्ञान (केवल ज्ञान) प्राप्त हो। और 'श्रुतकेवली' (Sruta Kevali) वह होता है जिसे तीर्थंकरों द्वारा उपदेशित सभी 12 अंगों (शास्त्रों) का पूर्ण शाब्दिक ज्ञान कंठस्थ हो।

ज्ञान का सूर्य अस्त होना

भगवान महावीर के निर्वाण के बाद जम्बूस्वामी अंतिम केवली हुए। उनके बाद श्रुतकेवलियों की परंपरा चली। आचार्य भद्रबाहु इस परंपरा की अंतिम कड़ी थे। उनके बाद किसी भी आचार्य को 14 पूर्वों और 12 अंगों का संपूर्ण ज्ञान एक साथ नहीं रहा। इसलिए जैन इतिहास में उनका स्थान एक 'युग-परिवर्तक' का है। उनके निधन के साथ ही पूर्ण श्रुतज्ञान का सूर्य अस्त हो गया।

4. भद्रबाहु और चंद्रगुप्त मौर्य: गुरु-शिष्य परंपरा

आचार्य भद्रबाहु और मगध सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का संबंध भारतीय इतिहास के सबसे प्रेरक अध्यायों में से एक है। चंद्रगुप्त मौर्य, जिन्होंने चाणक्य की सहायता से नंद वंश का नाश किया था, अपने जीवन के उत्तरार्ध में भद्रबाहु के प्रभाव में आए।

जैन ग्रंथों के अनुसार, चंद्रगुप्त को 16 स्वप्न आए थे। उन्होंने भद्रबाहु से इनका अर्थ पूछा। भद्रबाहु ने भविष्यवाणियां कीं, जिनमें से एक थी—मगध में 12 वर्षों तक पड़ने वाला भयंकर अकाल। इस भविष्यवाणी और संसार की नश्वरता को जानकर चंद्रगुप्त ने अपने पुत्र बिन्दुसार को राज्य सौंप दिया और भद्रबाहु के शिष्य बनकर 'प्रभाचंद्र' नाम से मुनि दीक्षा ले ली।

5. 12 वर्षीय अकाल और दक्षिण प्रवास

भद्रबाहु ने अपनी दिव्यदृष्टि से जान लिया था कि उत्तर भारत में 12 वर्षों का भीषण अकाल पड़ने वाला है, जिससे साधु चर्या का पालन करना असंभव हो जाएगा।

  • महाप्रस्थान: धर्म की रक्षा के लिए भद्रबाहु ने अपने 12,000 शिष्यों के साथ दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया।
  • संघ का विभाजन: उनके शिष्य स्थूलभद्र ने मगध में ही रुकने का निर्णय लिया। यहीं से जैन धर्म में वैचारिक मतभेद के बीज पड़े। दक्षिण गए मुनि (भद्रबाहु के साथ) नग्न रहे और कठोर नियमों का पालन किया (जो बाद में दिगंबर कहलाए), जबकि मगध में रुके मुनियों ने श्वेत वस्त्र धारण करना शुरू कर दिया (जो श्वेतांबर कहलाए)।
  • दक्षिण भारत में धर्म प्रसार: भद्रबाहु का यह प्रवास ऐतिहासिक सिद्ध हुआ। इसी के कारण कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में जैन धर्म का व्यापक प्रसार हुआ।

6. श्रवणबेलगोला और संलेखना: अंतिम यात्रा

दक्षिण की यात्रा करते हुए वे कर्नाटक के श्रवणबेलगोला (Shravanabelagola) पहुंचे। वहां 'चंद्रगिरि' पर्वत पर भद्रबाहु को आभास हुआ कि उनका अंतिम समय निकट है।

चंद्रगुप्त की गुरुभक्ति

भद्रबाहु ने संघ को विशाखाचार्य के नेतृत्व में आगे भेज दिया और स्वयं वहीं रुक गए। उनके साथ केवल एक शिष्य रुका—वह थे पूर्व सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त ने अपने गुरु की अंतिम समय तक सेवा की। भद्रबाहु ने 'संलेखना' (अन्न-जल त्याग कर स्वेच्छा से मृत्यु का वरण) व्रत धारण किया और समाधिमरण प्राप्त किया। गुरु के निर्वाण के बाद, चंद्रगुप्त ने भी उसी गुफा में 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की और अंततः संलेखना विधि से ही प्राण त्यागे। आज भी वहां 'भद्रबाहु गुफा' और चंद्रगुप्त के चरण चिह्न मौजूद हैं।

7. साहित्यिक योगदान: कल्पसूत्र और उवसग्गहरं स्तोत्र

आचार्य भद्रबाहु केवल तपस्वी ही नहीं, बल्कि एक महान लेखक भी थे। उनकी रचनाएँ आज भी जैन समाज में प्रतिदिन पढ़ी जाती हैं।

  • कल्पसूत्र (Kalpa Sutra): यह श्वेतांबर परंपरा का सबसे पवित्र ग्रंथ है। इसमें 24 तीर्थंकरों (विशेषकर महावीर, पार्श्वनाथ, नेमिनाथ और ऋषभदेव) का जीवन चरित्र वर्णित है। पर्युषण पर्व के दौरान इसका वाचन अनिवार्य माना जाता है।
  • उवसग्गहरं स्तोत्र (Uvasaggaharam Stotra): यह भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति में लिखा गया एक शक्तिशाली मंत्र-स्तोत्र है। मान्यता है कि इसके पाठ से घोर संकट और रोग दूर हो जाते हैं। इसकी रचना भद्रबाहु ने तब की थी जब एक महामारी फैली थी।
  • भद्रबाहु संहिता: यह एक ज्योतिष ग्रंथ है, जिसमें निमित्त शास्त्र और भविष्यवाणियों का वर्णन है।
  • नियुक्तियाँ (Niryuktis): उन्होंने जैन आगमों पर 10 महत्वपूर्ण नियुक्तियाँ (टीकाएँ) लिखीं, जिन्होंने आगमों के अर्थ को स्पष्ट किया।

8. निष्कर्ष: भद्रबाहु की अमर विरासत

आचार्य भद्रबाहु का व्यक्तित्व एक सेतु की तरह है जो उत्तर और दक्षिण भारत को, तथा प्राचीन आगमों और मध्यकालीन जैन धर्म को जोड़ता है। यदि भद्रबाहु ने अकाल की भविष्यवाणी न की होती और दक्षिण प्रवास का साहसिक निर्णय न लिया होता, तो शायद जैन धर्म मगध के अकाल में ही लुप्त हो जाता।

चंद्रगुप्त मौर्य जैसे चक्रवर्ती सम्राट का उनके चरणों में नतमस्तक होना यह सिद्ध करता है कि भारत में 'त्याग' का स्थान 'सत्ता' से सदैव ऊँचा रहा है। श्रवणबेलगोला की पहाड़ियाँ आज भी उस महान गुरु और उनके राजर्षि शिष्य की मूक गवाह हैं। भद्रबाहु ने हमें सिखाया कि जब धर्म पर संकट आए, तो स्थान का मोह त्यागकर धर्म की रक्षा करना ही सच्चा मार्ग है।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • कल्पसूत्र - आचार्य भद्रबाहु (मूल एवं हिंदी अनुवाद)।
  • जैन धर्म का इतिहास - कैलाश चंद्र शास्त्री।
  • Chandragupta Maurya and His Times - Radha Kumud Mookerji.
  • भद्रबाहु संहिता - (ज्योतिष ग्रंथ)।
  • श्रवणबेलगोला का इतिहास - भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण।

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