भारोपीय काल और गणपति: Origin of Ganesha in Puranas & Linguistics

Sooraj Krishna Shastri
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भारोपीय काल और गणपति का रहस्य

भाषा विज्ञान से पुराणों तक: एक ऐतिहासिक विश्लेषण

१. भारोपीय काल (Indo-European Era)

वेद आर्य जाति की प्राचीनतम उपलब्ध कृतियाँ हैं, किन्तु भारत का धार्मिक इतिहास वेदों से भी प्राचीन है। भारतीय धर्म का प्रादुर्भाव आर्यों के भारत आगमन से पूर्व ही हो चुका था। ऐतिहासिक और भाषाई प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि भारतीय, ईरानी और अधिकांश यूरोपीय जातियाँ किसी विस्मृत अतीत में एक ही स्थान पर संयुक्त रूप से रहती थीं। इसी अविभक्त प्राचीन जाति को सूचित करने के लिए 'भारोपीय' (Indo-European) शब्द का प्रयोग किया जाता है।

🔤 तुलनात्मक भाषा विज्ञान (Comparative Philology)

संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, केल्टिक, ट्यूटनिक और स्लावोनिक भाषाओं में घनिष्ठ समानता यह सिद्ध करती है कि इनका मूल स्रोत एक ही था।

  • ग्रिम का नियम (Grimm's Law): यह नियम सिद्ध करता है कि कैसे संस्कृत के घोष महाप्राण (घ्, ध्, भ्) अंग्रेजी आदि जर्मनिक भाषाओं में ग, द, ब (घोष अल्पप्राण) बन जाते हैं।
  • तुलनात्मक देव शास्त्र: भाषा विज्ञान के माध्यम से हम देवताओं के नामों के मूल रूप तक पहुँच सकते हैं और यह जान सकते हैं कि वेदों से पूर्व देवताओं का स्वरूप कैसा था।

२. गणपति: लोक विश्वास से पुराणों तक

गणेश जी का मूल स्वरूप लोक विश्वासों में अनिष्टकारी शक्तियों के अधिपति के रूप में था, जिनका कार्य विघ्न डालना था। इसीलिए किसी भी कार्य के निर्विघ्न समापन के लिए उनकी पूजा आवश्यक मानी गई।

🐘 स्वरूप और उत्पत्ति

गणेश जी का चित्रण—लम्बोदर, एकदन्त, गजवदन (हाथी जैसा मुख) और सूप जैसे कान—उन्हें वैदिक आर्य देवमंडल से पृथक करता है। गणपत्युपनिषद् (खण्ड 3) में उन्हें 'व्रातपति' (अनार्य ययावर जाति का स्वामी) कहा गया है।

"रक्त लम्बोदरं शूपकर्णकं रक्तवाससम्..." (खण्ड २)

उनका शारीरिक वर्णन उन्हें निम्नवर्गीय जातियों द्वारा पूजित लोक देवता के रूप में स्थापित करता है, जो बाद में अपने महत्व के कारण आर्य देवमंडल में सम्मिलित हो गए। मनुस्मृति भी संकेत करती है कि गणेश 'शूद्रों के देवता' थे।

३. शिव और गणेश का तादात्म्य

वैदिक युग में रुद्र भी गणों के अधिपति माने जाते थे। यही कारण है कि वा० सं० 22/39 आदि में रुद्र के लिए भी 'गणपति' शब्द का प्रयोग हुआ है। कालांतर में महाभारत और पुराणों में आकर शिव और गणेश का व्यक्तित्व घुल-मिल गया।

पुराणों के विरोधाभास और प्रमाण:

  • गणेशपूर्वतापनी उपनिषद (1/5): गणेश का शिव से स्पष्ट तादात्म्य (Identity) किया गया है।
  • वराह पुराण (23/14): विनायक को शिव ने उत्पन्न किया और वे साक्षात् दूसरे रुद्र हैं।
  • अग्नि पुराण (348/26): गणेश को 'त्रिपुरान्तक' और मस्तक पर चंद्रकला धारण किए हुए बताया गया है (जो शिव के लक्षण हैं)।
  • ब्रह्मवैवर्त पुराण (3/13/41): उन्हें 'ईश' और योगियों का स्वामी कहा गया है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि वेदों में 'मूषक' (चूहा) रुद्र का पशु बताया गया है, जो पुराणों में आकर गणेश का वाहन बन गया और शिव से उसका संबंध विच्छेद हो गया।

४. जन्म और विघ्न की कथाएँ

पुराणों में गणेश के जन्म और उनके हाथी के सिर को लेकर अनेक मत-मतांतर हैं:

  • वराह पुराण: शिव ने पापियों के स्वर्ग जाने में 'विघ्न' डालने के लिए अपने समान एक बालक उत्पन्न किया, जिसे पार्वती के स्नेहवश शाप मिला।
  • ब्रह्मवैवर्त पुराण: शनि की दृष्टि पड़ने से बालक का सिर कट गया, जिसे विष्णु ने हाथी के सिर से जोड़ा।
  • लिंग पुराण: शिव ने स्वयं विघ्नों के नाश के लिए गणेश का रूप धारण किया।

ये कथाएँ दर्शाती हैं कि पुराणकारों ने समय और परिस्थिति के अनुसार एक ही देवता के चरित्र का अलग-अलग चित्रण किया है।

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