पंडित सत्यव्रत सामश्रमी: सामवेद और वैदिक निरुक्त के प्रकांड शोधकर्ता एवं युगप्रवर्तक
उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाल के वह उद्भट वैदिक विद्वान, जिन्होंने 'सामवेद' और यास्क मुनि के 'निरुक्त' का प्रामाणिक वैज्ञानिक सम्पादन कर सम्पूर्ण विश्व में वैदिक वाङ्मय की गौरव-पताका फहराई। उन्होंने महर्षि दयानन्द सरस्वती के समान ही वेदों को समाज-सुधार और विज्ञान का मूल स्रोत सिद्ध किया।
- 1. प्रस्तावना: बंगाल का वैदिक पुनर्जागरण और पंडित सत्यव्रत सामश्रमी
- 2. जीवन परिचय: पटना से कलकत्ता (एशियाटिक सोसाइटी) तक की ज्ञान-यात्रा
- 3. सामवेद का पुनरुद्धार: 'सामश्रमी' उपाधि और ग्रन्थ-सम्पादन
- 4. 'निरुक्त' और वैदिक शब्द-मीमांसा: यौगिक अर्थों की वैज्ञानिक स्थापना
- 5. 'ऐतरेयालोचनम्' एवं ऐतिहासिक दृष्टि: वैदिक इतिहास का सूक्ष्म अन्वेषण
- 6. वेदों में विज्ञान का दर्शन: 'त्रयी परिचय' और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
- 7. वैदिक प्रमाणों से सामाजिक क्रान्ति: बाल-विवाह विरोध और विधवा-विवाह समर्थन
- 8. नारियों का वेदाधिकार: पितृसत्तात्मक कुरीतियों पर शाब्दिक प्रहार
- 9. महर्षि दयानन्द सरस्वती और सत्यव्रत सामश्रमी: दो वैदिक दिग्गजों का वैचारिक संगम
- 10. 'प्रत्न-कम्र-नन्दिनी' और 'उषा' पत्रिकाएँ: वैदिक पत्रकारिता का शंखनाद
- 11. निष्कर्ष: आधुनिक वैदिक शोध के अमर दीपस्तंभ
1. प्रस्तावना: बंगाल का वैदिक पुनर्जागरण और पंडित सत्यव्रत सामश्रमी
उन्नीसवीं शताब्दी का भारत एक ओर पाश्चात्य शिक्षा और ईसाई मिशनरियों के प्रभाव से जूझ रहा था, तो दूसरी ओर रूढ़िवादी और अंधविश्वासी कर्मकांडों ने मूल वैदिक ज्ञान को हाशिये पर धकेल दिया था। बंगाल में राजा राममोहन राय के 'ब्रह्म समाज' के प्रादुर्भाव ने उपनिषदों की ओर तो ध्यान आकृष्ट किया, परन्तु मूल वेदों (संहिताओं) का गहरा और प्रामाणिक अध्ययन अभी भी उपेक्षित था।
इसी संक्रमण काल में पंडित सत्यव्रत सामश्रमी (Satyavrata Samashrami) का उदय हुआ। जहाँ पश्चिमी इंडोलॉजिस्ट (जैसे मैक्स मूलर और राल्फ ग्रिफिथ) वेदों को केवल 'प्राकृतिक शक्तियों की स्तुति' या 'आदिम कबीलों के गीत' सिद्ध करने में लगे हुए थे, वहीं पंडित सत्यव्रत ने शुद्ध 'आर्ष दृष्टि' और निरुक्त (Etymology) के आधार पर यह प्रमाणित किया कि वेद ज्ञान-विज्ञान, उन्नत दर्शन और परिष्कृत समाज-व्यवस्था के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं। उनके द्वारा सम्पादित 'सामवेद संहिता' और यास्काचार्य कृत 'निरुक्त' ने भारतीय और पाश्चात्य दोनों अकादमिक जगतों में तहलका मचा दिया था।
| पूरा नाम | पंडित सत्यव्रत सामश्रमी भट्टाचार्य |
| काल निर्धारण (Chronology) | जन्म: 1846 ई. – मृत्यु: 1911 ई. (भारतीय नवजागरण काल) |
| कर्मभूमि एवं सम्बद्ध संस्था | कलकत्ता (कोलकाता), 'एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल' |
| उपाधि | 'सामश्रमी' (सामवेद के उद्भट ज्ञाता और परिश्रमी शोधकर्ता होने के कारण) |
| मुख्य शोध क्षेत्र | सामवेद, निरुक्त, ऐतरेय ब्राह्मण, वैदिक व्युत्पत्ति विज्ञान, समाज-सुधार |
| प्रमुख सम्पादित/रचित ग्रंथ | सामवेद संहिता (5 खण्ड), निरुक्त (सटीक - 4 खण्ड), ऐतरेयालोचनम्, त्रयी परिचय |
| प्रमुख प्रकाशित पत्रिकाएँ | 'उषा' और 'प्रत्न-कम्र-नन्दिनी' (संस्कृत और वैदिक साहित्य की पत्रिका) |
| वैचारिक दृष्टिकोण | वेदों में विज्ञान की स्वीकृति, स्त्रियों के वेदाधिकार का समर्थन, बाल-विवाह का वैदिक तर्कों से खण्डन |
2. जीवन परिचय: पटना से कलकत्ता (एशियाटिक सोसाइटी) तक की ज्ञान-यात्रा
पंडित सत्यव्रत सामश्रमी का जन्म सन् 1846 के आस-पास हुआ था। यद्यपि उनके पूर्वज बंगाल से सम्बंधित थे, किन्तु उनकी प्रारंभिक शिक्षा और लालन-पालन पटना और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में हुआ। बाल्यावस्था से ही उनकी मेधा अत्यंत प्रखर थी। व्याकरण, न्याय और मीमांसा के साथ-साथ उन्होंने वेदों के सस्वर पाठ की भी गहन शिक्षा प्राप्त की।
उनका वास्तविक अकादमिक जीवन कलकत्ता (Kolkata) आकर परवान चढ़ा। उस समय कलकत्ता ब्रिटिश भारत की राजधानी और विद्या का सबसे बड़ा केंद्र था। कलकत्ता की 'एशियाटिक सोसाइटी' (Asiatic Society of Bengal) ने उनके अगाध पांडित्य को पहचाना। ब्रिटिश शासन के अधीन 'बिब्लियोथिका इंडिका' (Bibliotheca Indica) नामक प्रसिद्ध शृंखला में प्राचीन भारतीय ग्रन्थों का सम्पादन और प्रकाशन कार्य चल रहा था। सामश्रमी जी को इस शृंखला के अंतर्गत वैदिक ग्रन्थों के सम्पादन का अत्यंत महत्त्वपूर्ण और गुरुतर दायित्व सौंपा गया, जिसे उन्होंने अपने अथक 'परिश्रम' से पूर्ण किया। इसी वैदिक श्रम के कारण वे सम्पूर्ण भारत में 'सामश्रमी' के नाम से विख्यात हुए।
3. सामवेद का पुनरुद्धार: 'सामश्रमी' उपाधि और ग्रन्थ-सम्पादन
सामवेद को भारतीय संगीत शास्त्र (Indian Musicology) का आदि-स्रोत माना जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है— "वेदानां सामवेदोऽस्मि" (वेदों में मैं सामवेद हूँ)। किन्तु 19वीं सदी तक आते-आते सामवेद का सस्वर गान और उसका प्रामाणिक ग्रन्थ अत्यंत दुर्लभ हो गया था। अधिकांश विद्वान केवल ऋग्वेद या यजुर्वेद तक ही सीमित थे।
सत्यव्रत सामश्रमी ने सम्पूर्ण भारतवर्ष से सामवेद की हस्तलिखित पांडुलिपियों (Manuscripts) का संग्रह किया। उन्होंने सायणाचार्य के भाष्य के साथ सामवेद संहिता का 5 वृहद् खण्डों में (लगभग 4000 पृष्ठों में) सम्पादन किया, जो 1874 से 1878 के बीच एशियाटिक सोसाइटी से प्रकाशित हुआ।
उन्होंने सामवेद के 'आर्चिक' (मंत्र भाग) और 'गान' (संगीत भाग) दोनों का अत्यंत वैज्ञानिक स्तरीकरण किया। उनके द्वारा सम्पादित 'सामवेद' को देखकर पाश्चात्य विद्वान भी विस्मित रह गए थे, क्योंकि उसमें स्वरों (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) और गान की पारिभाषिक शब्दावली (Grammar of Chants) का निर्दोष प्रकाशन किया गया था। उनका यह ग्रन्थ आज भी विश्व भर के विश्वविद्यालयों में सामवेद के प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रन्थ (Reference Text) के रूप में प्रयोग किया जाता है।
4. 'निरुक्त' और वैदिक शब्द-मीमांसा: यौगिक अर्थों की वैज्ञानिक स्थापना
वेदों के अर्थ को समझने के लिए छः वेदांगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) का ज्ञान आवश्यक है। इनमें 'निरुक्त' (Etymology/Philology) को वेद रूपी पुरुष का 'श्रोत्र' (कान) कहा गया है। महर्षि यास्क द्वारा रचित 'निरुक्त', 'निघंटु' (वैदिक शब्दकोश) की विस्तृत व्याख्या है।
पाश्चात्य विद्वान वेदों के शब्दों का लौकिक (सामान्य संस्कृत) अर्थ निकालकर अनर्थ कर रहे थे। सत्यव्रत सामश्रमी ने अनुभव किया कि यदि वेदों की रक्षा करनी है, तो महर्षि यास्क के 'निरुक्त' को जन-जन तक पहुँचाना होगा।
उन्होंने 1882 से 1891 के बीच 'बिब्लियोथिका इंडिका' के अंतर्गत देवराज यज्वा की टीका सहित यास्क मुनि के 'निरुक्त' का 4 खण्डों में अत्यंत प्रामाणिक सम्पादन किया।
- यौगिक अर्थ (Derivative Meaning): सामश्रमी जी ने सिद्ध किया कि वेदों में 'अश्व' का अर्थ केवल पशु (घोड़ा) नहीं है, बल्कि 'अश्नोति अध्वानम्' (जो मार्ग को शीघ्रता से तय करे) के अनुसार यह 'वेगवान ऊर्जा', 'विद्युत' या 'सूर्य की किरण' भी हो सकता है।
- ऐतिहासिक भ्रांतियों का निराकरण: निरुक्त के आधार पर उन्होंने यह स्थापित किया कि वेदों में कोई ऐतिहासिक राजा-महाराजाओं या नदियों की लौकिक कथाएँ नहीं हैं। वैदिक शब्द 'रूढ़' (Fixed nouns) न होकर 'यौगिक' (Root-based) हैं। इसी सिद्धांत को बाद में आर्य समाज ने अपना मुख्य अस्त्र बनाया।
5. 'ऐतरेयालोचनम्' एवं ऐतिहासिक दृष्टि: वैदिक इतिहास का सूक्ष्म अन्वेषण
पंडित सत्यव्रत सामश्रमी केवल एक अनुवादक या सम्पादक नहीं थे, वे एक उच्च कोटि के समीक्षक (Critic) भी थे। उन्होंने ऋग्वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ 'ऐतरेय ब्राह्मण' का सम्पादन किया और उसकी विस्तृत भूमिका के रूप में 'ऐतरेयालोचनम्' (Aitareyalochanam - 1906) नामक एक स्वतंत्र ग्रन्थ की रचना की।
इस ग्रन्थ में उन्होंने प्राचीन भारत की भौगोलिक स्थिति, वैदिक ऋषियों के काल-निर्धारण (Chronology of Vedic Seers), और ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित सामाजिक व्यवस्थाओं का 'आलोचनात्मक' मूल्यांकन किया।
सामश्रमी जी ने तार्किक प्रमाणों से सिद्ध किया कि ऐतरेय ब्राह्मण के रचयिता 'महिदास ऐतरेय' एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे और उनका काल महाभारत युद्ध के आस-पास का है। उन्होंने पाश्चात्य विद्वान मैक्स मूलर के उस मत का प्रबल खण्डन किया जिसमें मैक्स मूलर ने वैदिक काल को अत्यंत अर्वाचीन (केवल 1200 ईसा पूर्व) घोषित कर दिया था। सामश्रमी जी की ऐतिहासिक दृष्टि विशुद्ध भारतीय परम्परा और ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित थी।
6. वेदों में विज्ञान का दर्शन: 'त्रयी परिचय' और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
उन्नीसवीं सदी में यह प्रश्न बार-बार उठता था कि क्या वेदों में विज्ञान है? ईसाई मिशनरी वेदों को 'गड़रियों के गीत' कहकर उनका उपहास उड़ाते थे। सत्यव्रत सामश्रमी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'त्रयी परिचय' में इस भ्रम का तार्किक उत्तर दिया।
पंडित सत्यव्रत सामश्रमी ने डंके की चोट पर लिखा था— "वेदों में सारे विज्ञान सूक्ष्मरूप से विद्यमान हैं।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि वेद आधुनिक भौतिकी (Modern Physics) या रसायन शास्त्र की कोई 'टेक्स्टबुक' नहीं हैं जिसमें फॉर्मूले लिखे हों, परन्तु वेदों में सृष्टि की उत्पत्ति, सूर्य-पृथ्वी का आकर्षण (Gravity), जल-चक्र (Water cycle), और चिकित्सा-विज्ञान (Ayurveda) के 'मूल सिद्धांत' (Basic Principles) मन्त्रों के रूप में कूट-बद्ध (Encrypted) हैं। उन्होंने बड़ौदा से प्राप्त 'यन्त्रसर्वस्व' (महर्षि भारद्वाज कृत) जैसे ग्रन्थों का हवाला देकर यह सिद्ध किया कि वैदिक काल में भारत तकनीक और विज्ञान के शिखर पर था।
7. वैदिक प्रमाणों से सामाजिक क्रान्ति: बाल-विवाह विरोध और विधवा-विवाह समर्थन
सत्यव्रत सामश्रमी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल कमरों में बैठकर ग्रन्थ लिखने वाले পণ্ডিত (Pundit) नहीं थे, बल्कि वे एक प्रगतिशील समाज-सुधारक (Social Reformer) भी थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि तत्कालीन हिन्दू समाज की सभी कुरीतियों का कारण 'वेदों से दूरी' और 'पौराणिक कर्मकांडों का अंधानुकरण' है।
- बाल-विवाह का खण्डन: उन्होंने ऋग्वेद और अथर्ववेद के विवाह सूक्तों का प्रामाणिक अर्थ प्रस्तुत कर तत्कालीन समाज के पंडितों को चुनौती दी। उन्होंने बताया कि वेदों में कहीं भी कन्या के 'बाल-विवाह' (Child Marriage) का उल्लेख नहीं है। वेद 'युवा पतिं विन्दते' (पूर्ण युवा और शिक्षित कन्या ही युवा पति का वरण करे) की बात करते हैं।
- विधवा-विवाह (Widow Remarriage) का प्रबल समर्थन: जब ईश्वरचन्द्र विद्यासागर बंगाल में विधवा-विवाह का आन्दोलन चला रहे थे, तब सामश्रमी जी ने वेदों और गृह्यसूत्रों (जैसे पारस्कर गृह्यसूत्र) के उद्धरण प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया कि वैदिक काल में 'नियोग' और 'विधवा-पुनर्विवाह' पूर्णतः शास्त्र-सम्मत और धर्मानुकूल था।
8. नारियों का वेदाधिकार: पितृसत्तात्मक कुरीतियों पर शाब्दिक प्रहार
मध्यकालीन स्मृतियों और ब्राह्मण ग्रंथों की आड़ में नारियों को वेदाध्ययन और यज्ञ से वंचित कर दिया गया था। सत्यव्रत सामश्रमी ने अपने लेखों में इस पितृसत्तात्मक एकाधिकार (Patriarchal Monopoly) को छिन्न-भिन्न कर दिया।
उन्होंने शतपथ ब्राह्मण और सामवेद के मंत्रों का सन्दर्भ देकर प्रमाणित किया कि वैदिक काल में लोपामुद्रा, घोषा, और गार्गी जैसी विदुषियाँ न केवल वेदों का पाठ करती थीं, अपितु वे स्वयं 'मन्त्र-दृष्टा' ऋषिकाएं थीं। सामश्रमी जी का तर्क था— "जब स्वयं ईश्वर ने वेदों का ज्ञान पुरुष और स्त्री दोनों के कल्याण के लिए दिया है, तो किसी मनुष्य को यह अधिकार कहाँ से मिल गया कि वह स्त्री को वेद पढ़ने से रोक दे?" उनका यह स्पष्ट और निर्भीक मत तत्कालीन रूढ़िवादियों के लिए एक खुला प्रहार था।
9. महर्षि दयानन्द सरस्वती और सत्यव्रत सामश्रमी: दो वैदिक दिग्गजों का वैचारिक संगम
भारतीय इतिहास का यह एक अत्यंत रोचक और महत्त्वपूर्ण अध्याय है कि उन्नीसवीं सदी के इन दो महानतम वैदिक विद्वानों— महर्षि दयानन्द सरस्वती (आर्य समाज के संस्थापक) और सत्यव्रत सामश्रमी के बीच वैचारिक आदान-प्रदान हुआ था।
जब महर्षि दयानन्द सरस्वती कलकत्ता (1872-73) और काशी (वाराणसी) पधारे, तो सत्यव्रत सामश्रमी ने उनसे भेंट की थी। यद्यपि सामश्रमी जी औपचारिक रूप से 'आर्य समाज' के सदस्य नहीं बने और उन्होंने बंगाल की अपनी परम्परागत विद्वत्ता (एक स्वतंत्र वैदिक शोधकर्ता के रूप में) को बनाए रखा, किन्तु उन दोनों के वैचारिक धरातल में अद्भुत समानता थी:
1. दोनों ही वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे और 'निरुक्त' (यौगिक प्रक्रिया) को वेदार्थ की एकमात्र कुंजी मानते थे।
2. दोनों ने सायण और महीधर के अश्लील वेद-भाष्यों का कड़ा विरोध किया। सामश्रमी जी ने भी यह स्वीकार किया था कि सायण के भाष्य में कई स्थानों पर भारी भूलें हैं।
3. दोनों ही महापुरुषों ने वेदों के आधार पर जन्मना जातिवाद, छुआछूत और नारी-उत्पीड़न का डटकर खण्डन किया। आर्य समाज के अनेक विद्वान (जैसे युधिष्ठिर मीमांसक) सामश्रमी जी के ग्रंथों को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखते हैं।
10. 'प्रत्न-कम्र-नन्दिनी' और 'उषा' पत्रिकाएँ: वैदिक पत्रकारिता का शंखनाद
संस्कृत भाषा और वैदिक ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सत्यव्रत सामश्रमी ने पत्रकारिता (Journalism) का भी सहारा लिया। उन्होंने 'प्रत्न-कम्र-नन्दिनी' (Pratna-Kamra-Nandini) और 'उषा' (Usha) नामक उच्च स्तरीय संस्कृत एवं वैदिक शोध पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन किया।
इन पत्रिकाओं में वे वैदिक व्याकरण, निरुक्त, और श्रौत-सूत्रों के गूढ़ विषयों पर सरल भाषा में लेख लिखते थे। उन्होंने उस समय के संस्कृतज्ञों को यह संदेश दिया कि संस्कृत केवल पूजा-पाठ या स्तुतियों की भाषा नहीं है, बल्कि यह 'शोध' (Research), 'तर्क' (Logic) और 'विज्ञान' की भाषा है। उनकी लेखनी में इतनी निर्भीकता थी कि वे अपने ही समय के पाखंडी विद्वानों की धज्जियां उड़ाने से नहीं हिचकते थे ("सत्ये नास्ते भयं क्वचित्" - सत्य में कोई भय नहीं होता)।
11. निष्कर्ष: आधुनिक वैदिक शोध के अमर दीपस्तंभ
पंडित सत्यव्रत सामश्रमी (1846–1911) का जीवन भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रति असीम समर्पण की एक अद्भुत गाथा है। आज यदि हमारे पास 'सामवेद' का सस्वर प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध है, और यदि हम महर्षि यास्क के 'निरुक्त' के गूढ़ विज्ञान को समझ पा रहे हैं, तो इसका बहुत बड़ा श्रेय सामश्रमी जी के उन रातों के जागरण और अथक परिश्रम को जाता है जो उन्होंने 'एशियाटिक सोसाइटी' के पुस्तकालयों में धूल-धूसरित पांडुलिपियों को पढ़कर किया।
वे सही मायनों में 'साम-श्रमी' (सामवेद के लिए श्रम करने वाले) थे। उनका यह स्पष्ट उद्घोष कि "वेद मनुष्य मात्र के कल्याण का ग्रन्थ है" आज के विभाजित और संघर्षरत विश्व के लिए एक संजीवनी मंत्र है। जब भी आधुनिक काल में वैदिक भाष्यों, निरुक्त के वैज्ञानिक अर्थों और भारत के 'वैदिक पुनर्जागरण' (Vedic Renaissance) का इतिहास लिखा जाएगा, पंडित सत्यव्रत सामश्रमी का नाम महर्षि दयानन्द सरस्वती जैसे महापुरुषों की पंक्ति में पूरे आदर और गौरव के साथ स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- सामवेद संहिता (भाष्य सहित) - सम्पादक: सत्यव्रत सामश्रमी (Bibliotheca Indica, Asiatic Society of Bengal, 1874-78)।
- निरुक्तम् (देवराज यज्वा टीका सहित) - सम्पादक: सत्यव्रत सामश्रमी (1882-1891)।
- ऐतरेयालोचनम् - सत्यव्रत सामश्रमी (कलकत्ता, 1906)।
- त्रयी परिचय - सत्यव्रत सामश्रमी।
- आधुनिक वैदिक भाष्यकार (आर्य समाज के ऐतिहासिक दस्तावेज़ और शोध पत्र)।
- 'प्रत्न-कम्र-नन्दिनी' और 'उषा' पत्रिकाओं के अभिलेखागार (Archives)।
