आचार्य रामदेव: 'भारत का इतिहास' के प्रणेता और वैदिक सभ्यता के राष्ट्रवादी व्याख्याता
एक विस्तृत ऐतिहासिक और शोधपरक विश्लेषण: जिन्होंने मैकाले और विन्सेंट स्मिथ के औपनिवेशिक इतिहास को चुनौती देकर भारत का 'अपना' इतिहास लिखा (The Nationalist Historian of Vedic India)
- 1. प्रस्तावना: इतिहास पुनर्लेखन की आवश्यकता
- 2. जीवन परिचय: होशियारपुर से गुरुकुल तक
- 3. 'भारत का इतिहास': एक कालजयी ग्रंथ
- 4. वैदिक सभ्यता पर शोध: स्वर्ण युग की परिकल्पना
- 5. आर्यन आक्रमण सिद्धांत का तार्किक खंडन
- 6. वैदिक समाज: वर्ण व्यवस्था बनाम जाति प्रथा
- 7. वैदिक राजनीति: सभा और समिति का लोकतंत्र
- 8. निष्कर्ष: गुरुकुल परंपरा के अमर आचार्य
20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय इतिहास लेखन पर अंग्रेज विद्वानों (जैसे विन्सेंट स्मिथ, एलिफिंस्टन) का कब्जा था। वे पढ़ाते थे कि "वेद गड़ेरियों के गीत हैं" और "सभ्यता भारत में बाहर से (आर्यों के रूप में) आई"। इस औपनिवेशिक झूठ को तोड़ने के लिए आर्य समाज के एक महान विद्वान ने कलम उठाई—वे थे आचार्य रामदेव (Acharya Ramdev)।
आचार्य रामदेव, स्वामी श्रद्धानंद के सहयोगी और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के आचार्य थे। उनका ग्रंथ "भारत का इतिहास" (History of India) वैदिक काल पर लिखा गया हिंदी का सबसे प्रामाणिक और विस्तृत शोध माना जाता है। उन्होंने सिद्ध किया कि वैदिक सभ्यता दुनिया की सबसे उन्नत और वैज्ञानिक सभ्यता थी।
| पूरा नाम | आचार्य रामदेव (Acharya Ramdev) |
| काल | 31 जुलाई 1881 – 9 दिसंबर 1939 |
| जन्म स्थान | होशियारपुर, पंजाब |
| संस्था | गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय (हरिद्वार) |
| प्रमुख पद | मुख्य अधिष्ठाता (Principal/Acharya) |
| महानतम कृति | भारत का इतिहास (3 खंड) - विशेषतः वैदिक काल |
| गुरु/प्रेरणा | महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद |
| विचारधारा | राष्ट्रवादी इतिहास लेखन (Nationalist Historiography) |
2. जीवन परिचय: होशियारपुर से गुरुकुल तक
आचार्य रामदेव का जन्म 1881 में पंजाब के होशियारपुर जिले में हुआ था। बचपन से ही वे मेधावी थे। उन्होंने लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और महर्षि दयानंद के विचारों से प्रभावित होकर अपना जीवन राष्ट्र और वैदिक धर्म के लिए समर्पित कर दिया।
गुरुकुल कांगड़ी: जब स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम) ने प्राचीन ऋषि परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए हरिद्वार के पास कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की, तो आचार्य रामदेव उनके दाहिने हाथ बने। वे वहां इतिहास और अर्थशास्त्र के प्राध्यापक बने और बाद में आचार्य (Principal) का पद संभाला। उन्होंने गुरुकुल में हिंदी माध्यम से उच्च शिक्षा देने का सफल प्रयोग किया।
3. 'भारत का इतिहास': एक कालजयी ग्रंथ
आचार्य रामदेव का सबसे बड़ा योगदान उनका ग्रंथ "भारत का इतिहास" है। यह सामान्य इतिहास की किताब नहीं थी। यह अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए भ्रमों का तार्किक उत्तर था।
- मूल स्रोत: उन्होंने किसी पश्चिमी इतिहासकार की नकल नहीं की, बल्कि सीधे वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों और रामायण-महाभारत से तथ्य जुटाए।
- जनता का इतिहास: उन्होंने केवल राजाओं और युद्धों का वर्णन नहीं किया, बल्कि वैदिक काल के आम आदमी, सामाजिक व्यवस्था, कृषि, व्यापार और शिक्षा का वर्णन किया।
- भाषा: उन्होंने इसे हिंदी में लिखा ताकि भारत का सामान्य नागरिक अपने गौरवशाली अतीत को जान सके।
4. वैदिक सभ्यता पर शोध: स्वर्ण युग की परिकल्पना
आचार्य रामदेव ने अपने शोध में वैदिक सभ्यता को **'सत्य युग'** या स्वर्ण काल के रूप में स्थापित किया। उनके प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित थे:
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: उन्होंने वेदों में विज्ञान के सूत्रों को खोजा। उन्होंने सिद्ध किया कि वैदिक ऋषि केवल कवि नहीं थे, बल्कि वे खगोलशास्त्र, गणित और चिकित्सा के ज्ञाता थे।
- स्त्री सम्मान: उन्होंने ऋग्वेद के मंत्रों का उद्धरण देकर बताया कि वैदिक काल में स्त्रियां विदुषी होती थीं (जैसे घोषा, अपाला)। पर्दा प्रथा और बाल विवाह का वहां कोई अस्तित्व नहीं था।
- अहिंसा और यज्ञ: उन्होंने स्पष्ट किया कि वैदिक यज्ञों में पशुबलि का विधान नहीं था, यह बाद की मिलावट है। यज्ञ पर्यावरण शुद्धि का साधन थे।
5. आर्यन आक्रमण सिद्धांत का तार्किक खंडन
मैक्स मूलर और अन्य पश्चिमी विद्वानों ने **'आर्यन आक्रमण सिद्धांत'** (Aryan Invasion Theory) गढ़ा था, जिसके अनुसार आर्य बाहर (मध्य एशिया) से आए और उन्होंने यहाँ के मूल निवासियों (द्रविड़ों/दस्युओं) को हराया।
आचार्य रामदेव ने अपनी पुस्तक में इसका पुरजोर खंडन किया:
उन्होंने 'स्वदेशी आर्य सिद्धांत' (Indigenous Aryan Theory) को स्थापित किया, जिसे आज आधुनिक पुरातत्व (राखीगढ़ी शोध) भी सही साबित कर रहा है।
6. वैदिक समाज: वर्ण व्यवस्था बनाम जाति प्रथा
आचार्य रामदेव ने वैदिक समाज की संरचना का बहुत सुंदर विश्लेषण किया।
वर्ण व्यवस्था: उन्होंने बताया कि वैदिक काल में 'वर्ण' (Class) कर्म पर आधारित था, जन्म पर नहीं। एक ब्राह्मण का बेटा यदि अनपढ़ है तो वह शूद्र माना जाता था, और एक शूद्र का बेटा यदि ज्ञानी है तो वह ऋषि बन सकता था (जैसे ऐतरेय महिदास)।
उन्होंने लिखा कि जाति प्रथा (Caste System) और छुआछूत वैदिक सभ्यता के पतन के बाद के काल (पौराणिक काल) की देन हैं, वेदों की नहीं। यह आर्य समाज के सामाजिक सुधार आंदोलन का ऐतिहासिक आधार बना।
7. वैदिक राजनीति: सभा और समिति का लोकतंत्र
अंग्रेज कहते थे कि भारत में लोकतंत्र कभी नहीं रहा, यहाँ हमेशा तानाशाही रही है। आचार्य रामदेव ने वेदों और अथर्ववेद से प्रमाण देकर इसका खंडन किया।
- सभा और समिति: उन्होंने सिद्ध किया कि वैदिक काल में राजा निरंकुश नहीं होता था। उसे **'सभा'** (Council of Elders) और **'समिति'** (General Assembly of People) के नियंत्रण में काम करना पड़ता था।
- राजा का चुनाव: उन्होंने वेदों के उन मंत्रों को उद्धृत किया जहाँ 'विश' (प्रजा) द्वारा राजा के चुनाव (Election) और निष्कासन की बात की गई है।
इस शोध ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीयों में आत्मविश्वास भरा कि लोकतंत्र हमारे खून में है, यह पश्चिम की देन नहीं है।
8. निष्कर्ष: गुरुकुल परंपरा के अमर आचार्य
आचार्य रामदेव केवल एक इतिहासकार नहीं थे, वे एक निर्माता थे। उन्होंने इतिहास को केवल तथ्यों का संग्रह नहीं रहने दिया, बल्कि उसे **'राष्ट्र-निर्माण'** का साधन बनाया।
उनका ग्रंथ "भारत का इतिहास" आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो भारत को पश्चिमी चश्मे से नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि से देखना चाहते हैं। उन्होंने हमें सिखाया कि:
"जिस राष्ट्र का इतिहास गौरवशाली होता है, उसका भविष्य भी उज्ज्वल होता है। हमें अपने अतीत पर शर्म नहीं, गर्व होना चाहिए।"
आज जब हम **'राष्ट्रीय शिक्षा नीति'** और **'भारतीय ज्ञान परंपरा'** (Indian Knowledge System) की बात करते हैं, तो आचार्य रामदेव का कार्य हमारे लिए आधारशिला (Foundation Stone) का काम करता है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- भारत का इतिहास (प्रथम खंड: वैदिक काल) - आचार्य रामदेव।
- गुरुकुल कांगड़ी का इतिहास - सत्यकेतु विद्यालंकार।
- आर्य समाज का इतिहास - लाला लाजपत राय।
- Vedic Age - Bharatiya Vidya Bhavan (Comparison).
