Pitru Paksha me Ekadashi: Vrat karein ya Shraddh? Shastra Samvat Niyam aur Samadhan

Sooraj Krishna Shastri
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पितृपक्ष में एकादशी: व्रत करें या श्राद्ध? शंका समाधान

पितृपक्ष के दौरान अक्सर यह प्रश्न उठता है कि यदि श्राद्ध की तिथि को एकादशी पड़ जाए, तो क्या करें? शास्त्र की आज्ञा है कि एकादशी के दिन श्राद्ध में अन्न का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

प्रश्न: क्या एकादशी के दिन श्राद्ध होता है?

उत्तर: नहीं। पुष्कर खंड में भगवान शंकर ने माता पार्वती से स्पष्ट कहा है कि जो एकादशी के दिन अन्न का श्राद्ध करते हैं, तो श्राद्ध खाने वाला, खिलाने वाला और जिसके निमित्त श्राद्ध हो रहा है (पितर), वे तीनों नरक गामी होते हैं।

समाधान:

  • सबसे उत्तम यह है कि एकादशी के निमित्त श्राद्ध द्वादशी को करें।
  • यदि द्वादशी को न कर सकें और एकादशी को ही करना चाहें, तो पितरों का पूजन कर ब्राह्मण को केवल फलाहार करावें। स्वयं भी एकादशी का उपवास रखें।

विरोधाभास और शास्त्रीय निर्णय

पुराणों में लिखा है कि श्राद्ध के दिन उपवास न करें:

श्राद्धे जन्म दिने चैव संक्रान्त्यां राहुसूतके।
उपवासं न कुर्वीत यदीच्छेच्छ्रेयमात्मनः ।।
अर्थ: श्राद्ध, जन्मदिन, संक्रांति और राहु-सूतक में यदि अपना कल्याण चाहते हो तो उपवास न करें।

फिर भी यदि उस दिन एकादशी हो तो उपवास अवश्य करें क्योंकि एकादशी 'नित्य कर्म' है और श्राद्ध 'नैमित्तिक'। समाधान यह है:

उपवासो यदा नित्यः,श्राद्धं नैमित्तिकं भवेत् ।
उपवासं सदा कुर्यादाघ्राय पितृसेवितम् ।।
अर्थ: उपवास सदा करें। श्राद्ध के दिन पितरों को भेंट किया अन्न या रसोई सूंघ लें (आघ्राय)।

उपवास का वास्तविक लक्षण

उपवास का अर्थ केवल भूखे रहना नहीं है:

उपावृत्तस्य पापेभ्योः यस्तु वासो गुणैस्सह ।
उपवासस्य विज्ञेयो सर्वभोगविवर्जितः ।।
भावार्थ: पापों से दूर रहकर भगवान् श्रीमन्नारायण के कल्याण गुणों का चिंतन करना और संसार के समस्त भोगों से विरति ही उपवास है।

एकादशी व्रत की महिमा और नियम (नारदीय पुराण)

राजा रुक्मांगद के राज्य में घोषणा होती थी:

तस्यैवं क्रीडमानस्य मोहिन्या सह पार्थिव.।
रुक्मांगदस्य श्रोत्राभ्यां पटहध्वनिरागतः ।।
मत्तेभकुम्भसंस्थस्तु धर्मांगदमते स्थितः ।
प्रातर्हरिदिनं लोकास्तिष्टध्वं चैकभोजना।।
अक्षारलवणास्सर्वै हविष्यान्ननिषेवणः ।
अवनीतल्पशयनाः प्रियासंगविवर्जिताः ।
स्मरध्वं देवमीशानं पुराणं पुरुषोत्तमम् ।
सकृद् भोजनसंयुक्ताश्च उपवासे भविष्यथ ।।

एकादशी व्रत न करना दंडनीय अपराध माना गया है:

अष्टवर्षाधिको मर्त्यो ह्यशीतिर्न हि पूर्यते ।
यो भुक्ते मामके राष्ट्रे विष्णोरहनि पापकृत् ।।
स मे बध्यश्च दण्ड्यश्च निर्वास्यो विषयाद्बहिः ।

देवल ऋषि के अनुसार नियम

दशम्यामेकभुक्तस्तु मांसमैथुनवर्जितः ।
एकादश्यामुपवसेत् पक्षयोरुभयोरपि ।।
ब्रह्मचर्यं तथा शौचं सत्यमामिषवर्जनम् ।
ब्रतेष्वेतानि चत्वारि वरिष्ठानीति निश्चयः ।।
स्त्रीणां तु प्रेक्षणात् स्पर्शात् ताभिसंकथनादपि ।
निष्यन्दते ब्रह्मचर्यं न दारेष्वृतुसंगमात् ।।
अर्थ: दशमी को एक समय भोजन, मांस-मैथुन का त्याग और एकादशी को उपवास करें। ब्रह्मचर्य, पवित्रता, सत्य और मांस-त्याग—ये चार व्रत में श्रेष्ठ हैं।

वर्जित कर्म (क्या न करें)

बार-बार जल, दूध, चाय या पान-मसाला का सेवन न करें:

असकृज्जलपानाच्च सकृत्ताम्बुलचर्बणात् ।
उपवासो विनश्येत दिवास्वापाच्च मैथुनात् ।।

व्यास जी के अनुसार (दंत धावन निषेध):

पुष्पालंकारवस्त्राणि गन्धधूपानुलेपनम् ।
उपवासे न दुष्येत दन्तधावनमञ्जनम् ।।
उपवासे तथा श्राद्धे न खादेद्दन्तधावनम् ।
दन्तानां काष्ठसंयोगः हन्ति सप्तकुलान्यपि ।।
चेतावनी: उपवास और श्राद्ध में दातून (लकड़ी) नहीं चबानी चाहिए। दांतों का काष्ठ से संयोग सात कुलों का नाश करता है।

खान-पान और अन्य निषेध (कूर्म व ब्रह्मांड पुराण)

एकादशी को दूसरे का अन्न, कांसा, मांस, मसूर, चना, कोदों, शाक, मधु और पराया अन्न त्याग दें। ककड़ी, टमाटर, आलू आदि शाकों का भी संयम रखें और असत्य न बोलें।

कांस्यं मांसं मसूरं च चणकं कोद्रमाषकान् ।
शाकं मधु परान्नं च त्यजेदुपवसनं स्त्रियम् ।।
असत्यभाषणं द्यूतं दिवास्वापं च मैथुनम् ।
एकादश्यां न कुर्वीत उपवासपरो नरः ।।

ब्रह्मांड पुराण के अनुसार तिल के सेवन का भी निषेध है:

कांस्यं मांसं सुरां क्षौद्रं तैलं वितथ भाषणम् ।
व्यवायं च प्रवासं च दिवास्वापमथाञ्जनम् ।।
तिलपिष्टं मसूरं च द्वादशैतानि वैष्णवः ।।
द्वादश्याः वर्जयेन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।

बृहस्पति और अंगिरा ऋषि का मत:

दिवानिद्रां परान्नं च पुनर्भोजनमैथुने।
क्षौद्रं कांस्यामिषं तैलं द्वादश्यामष्ट वर्जयेत् ।।

सायमाद्यन्तयोरह्नोस्सायं प्रातश्च मध्यमे ।
उपवासफलप्रेप्सुर्जह्याद्भक्तचतुष्टयम् ।।
य इच्छेद् विष्णु सायुज्यं श्रियं सन्ततिमेव च ।
एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ।।

संकल्प विधि

देवल ऋषि के अनुसार, तांबे के पात्र में जल भरकर उत्तराभिमुख होकर संकल्प लें:

गृहीत्वौदुम्बरं पात्रं वारिपूर्णमुदंमुखः ।
उपवासं तु गृह्णीयात् यद्वा संकल्पयेद्बुधः ।।

संकल्प मंत्र:

एकादश्यां निराहारो भूत्वाsहमपरेsहनि।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष गतिर्मम भवाच्युत।।
अर्थ: मै एकादशी को निराहार ब्रत करुंगा, मै द्वादशी को ही एक समय अन्न लूंगा। हे पुण्डरीकाक्ष श्रीमन्नारायण! हे अच्युत! मुझे सद्गति प्रदान करना।

विष्णु स्मृति का संकल्प मंत्र:

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाsहमपरेsहनि ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ।।
अर्थ: हे कमलनयन अच्युत! आप ही मेरी गति है। एकादशी को निराहार रहकर द्वादशी को ही पारणा करुंगा।

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