आचार्य शबरस्वामी: मीमांसा दर्शन के महान भाष्यकार और वैदिक धर्म के रक्षक
(The Great Commentator of Purva Mimamsa)
भारतीय दर्शन के इतिहास में आचार्य शबरस्वामी (Acharya Shabaraswami) का नाम एक ऐसे युग-प्रवर्तक के रूप में लिया जाता है जिन्होंने वेदों की सत्ता को तर्क और प्रमाण के आधार पर पुनः स्थापित किया। महर्षि जैमिनि द्वारा रचित 'मीमांसा सूत्र' अत्यंत संक्षिप्त और गूढ़ थे। यदि शबरस्वामी ने उन पर अपना विस्तृत 'शाबर-भाष्य' न लिखा होता, तो आज मीमांसा दर्शन को समझना असंभव होता। वे न केवल एक टीकाकार थे, बल्कि एक मौलिक चिंतक थे जिन्होंने बौद्ध और जैन दर्शनों के तर्कों का उत्तर देते हुए 'वैदिक यथार्थवाद' (Vedic Realism) की स्थापना की।
| उपाधि | भाष्यकार (Bhashyakara) |
| प्रमुख कृति | शाबर-भाष्य (Shabara Bhashya) |
| दर्शन | पूर्व मीमांसा (Purva Mimamsa) |
| प्रमुख योगदान | धर्म की परिभाषा, वेदों की अपौरुषेयता, शब्द-अर्थ का नित्य संबंध |
| शैली | प्रसन्न-गंभीर (स्पष्ट और गहरी) |
| उत्तराधिकारी | कुमारिल भट्ट, प्रभाकर मिश्र, मुरारी मिश्र |
1. 'शबर' नाम का रहस्य और किंवदंतियाँ
'शबरस्वामी' नाम को लेकर विद्वानों में कई मत और रोचक कथाएँ प्रचलित हैं। संस्कृत में 'शबर' का अर्थ एक वनवासी या शिकारी जनजाति से होता है। एक महान वैदिक आचार्य का यह नाम क्यों पड़ा?
- वनवासी वेश: एक किंवदंती के अनुसार, वे एक क्षत्रिय राजा थे जो विरक्त होकर वन में चले गए और 'शबर' (भील/वनवासी) के वेश में रहकर तपस्या करने लगे। इसलिए उनका नाम शबरस्वामी पड़ा।
- पिता-पुत्र की कथा: एक लोककथा के अनुसार, वे महाकवि बाणभट्ट के पिता या समकालीन माने जाते हैं (हालांकि ऐतिहासिक कालक्रम इसमें मेल नहीं खाता)।
- चार पत्नियाँ: कहा जाता है कि उनकी चार पत्नियाँ थीं जो चार वेदों और भिन्न-भिन्न वर्णों का प्रतीक थीं। वराहमिहिर (प्रसिद्ध खगोलशास्त्री) और भर्तृहरि को उनका पुत्र बताने वाली दंतकथाएँ भी मिलती हैं, जो संभवतः उनकी महानता को दिखाने के लिए बाद में जोड़ी गईं।
ऐतिहासिक दृष्टि से, वे संभवतः उत्तर भारत के किसी क्षेत्र के निवासी थे और उन्होंने 'वृत्तिकार' (एक प्राचीन आचार्य जिनका नाम उपवर्ष माना जाता है) के ग्रंथों का अध्ययन किया था।
2. शाबर-भाष्य: एक परिचय (The Magnum Opus)
जैमिनि के सूत्रों पर लिखा गया यह भाष्य संस्कृत साहित्य का एक अनुपम रत्न है। इसकी भाषा 'पतंजलि के महाभाष्य' जैसी प्रवाहपूर्ण, सरल और गंभीर है।
- तर्कपाद (Tarkapada): भाष्य का प्रथम पाद (1.1) सबसे महत्वपूर्ण है। इसमें शबरस्वामी ने ज्ञानमीमांसा (Epistemology) की चर्चा की है। यहाँ वे धर्म, प्रमाण, और वेद की प्रमाणिकता पर विचार करते हैं।
- विषय वस्तु: इसमें कुल 12 अध्याय हैं, जिनमें यज्ञों के प्रकार, मंत्रों के अर्थ, विधि-निषेध और फल प्राप्ति के सिद्धांतों की व्याख्या है।
- संवाद शैली: शबरस्वामी पहले एक 'पूर्वपक्ष' (विरोधी मत) को रखते हैं—अक्सर बहुत सशक्त तरीके से—और फिर 'उत्तरपक्ष' (सिद्धांत) के माध्यम से उसका खंडन करते हैं।
3. दार्शनिक योगदान: धर्म, शब्द और आत्मा
शबरस्वामी के दर्शन के तीन प्रमुख स्तंभ हैं, जिन्होंने भारतीय चिंतन धारा को गहराई से प्रभावित किया:
क. धर्म का लक्षण (Definition of Dharma)
शबरस्वामी के अनुसार, धर्म कोई वस्तु नहीं है जिसे इन्द्रियों (आँख, नाक, कान) से जाना जा सके। धर्म केवल 'चोदना' (Vedic Injunction/आदेश) से जाना जाता है। जैसे—"स्वर्गकामः यजेत" (स्वर्ग की कामना करने वाला यज्ञ करे)। यहाँ यज्ञ करना ही धर्म है क्योंकि वेद ऐसा कहते हैं।
ख. शब्द और अर्थ का नित्य सम्बन्ध
उन्होंने 'औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धः' सूत्र की व्याख्या करते हुए सिद्ध किया कि शब्द (Word) और उसका अर्थ (Meaning) मनुष्य द्वारा नहीं बनाए गए, बल्कि वे अनादि और नित्य हैं। जैसे ही 'गो' (गाय) शब्द उच्चारित होता है, वैसे ही एक विशेष आकृति का ज्ञान होता है। यह संबंध शाश्वत है।
ग. आत्मा का अस्तित्व (Nature of Self)
बौद्ध दर्शन के 'अनात्मवाद' (No-Self) के विरुद्ध शबरस्वामी ने नित्य आत्मा की सत्ता सिद्ध की। उनका तर्क था—"जो 'मैं' कल था, वही 'मैं' आज हूँ।" यदि आत्मा क्षणिक होती (बौद्ध मत), तो कर्म करने वाला कोई और होता और फल भोगने वाला कोई और। कर्म-फल व्यवस्था के लिए एक नित्य कर्ता (आत्मा) का होना अनिवार्य है।
4. शून्यवाद और विज्ञानवाद का खंडन
शबरस्वामी एक पक्के यथार्थवादी (Realist) थे। उस समय बौद्ध दर्शन की दो शाखाएँ प्रबल थीं:
- शून्यवाद (Nihilism): सब कुछ शून्य है।
- विज्ञानवाद (Idealism/Yogachara): बाहरी दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं, केवल हमारे मन (विज्ञान) के विचार ही सत्य हैं। जैसे स्वप्न में वस्तुएँ दिखती हैं पर होती नहीं।
शबरस्वामी का खंडन: उन्होंने तर्क दिया कि "जाग्रत अवस्था और स्वप्न अवस्था एक समान नहीं हो सकतीं।"
"जब हम जागते हैं, तो इन्द्रियों का वस्तुओं से संपर्क होता है, इसलिए बाहरी दुनिया सत्य है। यदि बाहरी दुनिया नहीं होती, तो 'नीला' या 'पीला' ज्ञान कहाँ से आता? ज्ञान के लिए किसी 'ज्ञेय' (Object) का होना आवश्यक है।"
इस प्रकार उन्होंने जगत को 'मिथ्या' मानने वाले सिद्धांतों को खारिज कर दिया।
5. परंपरा: कुमारिल भट्ट और प्रभाकर
शबरस्वामी के बाद मीमांसा दर्शन दो धाराओं में बंट गया, लेकिन दोनों का आधार 'शाबर-भाष्य' ही रहा:
- भाट्ट मत (कुमारिल भट्ट): इन्होंने शबरस्वामी के मत की अत्यंत तार्किक व्याख्या की और बौद्धों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।
- प्राभाकर मत (प्रभाकर मिश्र): इन्हें 'गुरु' मत कहा जाता है। इन्होंने शबरस्वामी के वाक्यों की एक नई और मौलिक व्याख्या प्रस्तुत की।
6. निष्कर्ष
आचार्य शबरस्वामी का महत्व केवल मीमांसा तक सीमित नहीं है। उन्होंने भारतीय दर्शन को 'संशयवाद' (Skepticism) से बचाकर 'आस्था और तर्क' के ठोस धरातल पर खड़ा किया। उन्होंने सिद्ध किया कि वेद अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित विज्ञान हैं। उनकी लेखन शैली, उनकी तार्किकता और वेदों के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें भारतीय ज्ञान परंपरा का एक देदीप्यमान नक्षत्र बनाती है। आज भी जब कोई 'धर्म' के अर्थ को समझना चाहता है, तो उसे अंततः शबरस्वामी के चरणों में ही बैठना पड़ता है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- मीमांसा सूत्र शाबरभाष्य (हिन्दी अनुवाद सहित)।
- History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta (Vol. 1).
- भारतीय दर्शन - डॉ. राधाकृष्णन।
- Ganganatha Jha's Translation of Shabara Bhashya.
