महर्षि जैमिनि (Maharishi Jaimini)

Sooraj Krishna Shastri
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महर्षि जैमिनि: मीमांसा दर्शन के प्रवर्तक और सामवेद के आचार्य

महर्षि जैमिनि: सामवेद के आदि आचार्य और पूर्व मीमांसा के प्रवर्तक

(Biographical, Philosophical & Vedic Study)

"जैमिनिः सामवेदज्ञः सुमन्तुश्चाथर्वविद् मुनिः।" अर्थ: महर्षि जैमिनि सामवेद के महान ज्ञाता और व्याख्याता हुए।

भारतीय सनातन संस्कृति में महर्षि जैमिनि (Maharishi Jaimini) का स्थान उन दार्शनिकों में सर्वोपरि है जिन्होंने वेदों के 'कर्मकांड' (Ritualism) को एक तार्किक आधार प्रदान किया। वे भगवान वेदव्यास के चार प्रमुख शिष्यों में से एक थे। जहाँ अन्य ऋषियों ने ज्ञान और भक्ति पर बल दिया, वहीं जैमिनि मुनि ने 'धर्म' को कर्तव्य के रूप में परिभाषित किया। उनके द्वारा प्रतिपादित पूर्व मीमांसा आज भी भारतीय न्याय व्यवस्था और विधि शास्त्र (Jurisprudence) का प्राचीनतम आधार मानी जाती है।

📌 महर्षि जैमिनि: एक दृष्टि में
गुरु महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास
प्रमुख दर्शन पूर्व मीमांसा (Purva Mimamsa)
सम्बन्धित वेद सामवेद (Sama Veda)
प्रसिद्ध ग्रंथ मीमांसा सूत्र, जैमिनि भारत, जैमिनीय ब्राह्मण
विशेष क्षेत्र कर्मकांड, ज्योतिष, साहित्य
प्रमुख सिद्धांत वेदों की अपौरुषेयता और नित्यता
⏳ काल निर्धारण एवं गुरु-परंपरा
युग
द्वापर युग का अंत (व्यास काल)महाभारत काल के समकालीन और वेदों के विभाजन के साक्षी।
दार्शनिक काल
षड्दर्शन कालजब भारतीय दर्शन के छह प्रमुख संप्रदायों का उदय हुआ।

1. पूर्व मीमांसा दर्शन: कर्म और धर्म का विज्ञान

महर्षि जैमिनि द्वारा रचित 'मीमांसा सूत्र' भारतीय दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसमें कुल 12 अध्याय और लगभग 2500 सूत्र हैं।

  • धर्म की परिभाषा: उन्होंने कहा—"चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः"। अर्थात वेदों के वे निर्देश जो हमें श्रेष्ठ कर्म की ओर प्रेरित करते हैं, वही धर्म हैं।
  • वेदों की नित्यता: जैमिनि का मानना था कि वेद अनादि हैं और उनका ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता।
  • अपौरुषेयत्व: वेदों की रचना किसी मनुष्य ने नहीं की है, वे ईश्वरीय वाणी हैं जो ऋषियों के हृदय में प्रकट हुई।
  • कर्म का फल: उन्होंने 'अपूर्व' का सिद्धांत दिया, जिसके अनुसार प्रत्येक शुभ कर्म का एक अदृश्य फल संचित होता है जो उचित समय पर प्राप्त होता है।

2. सामवेद का प्रसार: जैमिनीय शाखा

वेदव्यास जी ने जब वेदों का विभाजन किया, तब उन्होंने जैमिनि को सामवेद की शिक्षा दी।

जैमिनि मुनि ने सामवेद के संगीत और मंत्रों को इतना व्यवस्थित किया कि उनकी अपनी एक अलग शाखा बन गई, जिसे 'जैमिनीय शाखा' कहा जाता है। सामवेद की तलवकार शाखा और केनोपनिषद भी इसी परंपरा का हिस्सा माने जाते हैं। उन्होंने यज्ञों में 'उद्गाता' (सामवेद का पाठ करने वाले) की भूमिका को विशेष गरिमा प्रदान की।

3. साहित्यिक योगदान: जैमिनि भारत और ज्योतिष

महर्षि जैमिनि केवल एक दार्शनिक नहीं, बल्कि एक प्रखर कवि और ज्योतिषी भी थे।

  • जैमिनि भारत: इन्होंने महाभारत की कथा को अपने दृष्टिकोण से लिखा। इसका 'अश्वमेध पर्व' अत्यंत लोकप्रिय है, जिसमें अर्जुन के पराक्रम का अद्भुत वर्णन मिलता है।
  • जैमिनि ज्योतिष: ज्योतिष शास्त्र में इन्होंने 'जैमिनि सूत्र' की रचना की। यह 'पाराशर ज्योतिष' से अलग एक विशेष पद्धति है, जिसे आज भी सटीक भविष्यवाणियों के लिए उपयोग किया जाता है।

4. निष्कर्ष

महर्षि जैमिनि का व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि बिना कर्म के ज्ञान अधूरा है। उन्होंने वेदों के व्यावहारिक पक्ष को दुनिया के सामने रखा और सिद्ध किया कि अनुशासन और कर्तव्य का पालन ही मोक्ष का मार्ग है। उनका मीमांसा दर्शन आज भी हमारी तर्कशक्ति और न्याय भावना को प्रभावित करता है। वे एक ऐसे ऋषि थे जिन्होंने 'शब्द' और 'कर्म' को ईश्वर की साक्षात् मूर्ति माना।


संदर्भ ग्रंथ (References)

  • मीमांसा सूत्र (महर्षि जैमिनि)।
  • श्रीमद्भागवत पुराण (वेद शाखा विभाजन प्रसंग)।
  • जैमिनि भारत (अश्वमेध पर्व)।
  • षड्दर्शन सार - स्वामी दयानंद सरस्वती।

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