आचार्य उद्भट: 'काव्यालंकारसारसंग्रह' और कश्मीर की बौद्धिक संपदा के शिखर
एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, काव्यशास्त्रीय और दार्शनिक विश्लेषण: प्राचीन कश्मीर का वह 'करोड़पति' राज-पंडित जिसने भामह की 'अलंकार-परंपरा' को एक वैज्ञानिक ढांचा दिया, और यह सिद्ध किया कि कविता में 'गुण' और 'अलंकार' दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
- 1. प्रस्तावना: ज्ञान का अभूतपूर्व आर्थिक मूल्यांकन
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: एक लाख दीनार का दैनिक वेतन
- 3. 'काव्यालंकारसारसंग्रह': ग्रंथ की संरचना और विशेषता
- 4. अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण (6 वर्ग और 41 अलंकार)
- 5. उद्भट का दर्शन: 'गुण' और 'अलंकार' में कोई भेद नहीं
- 6. श्लेष (Pun) की सर्वोच्चता: शब्द और अर्थ का जादू
- 7. अनुप्रास की तीन वृत्तियां: उपनागरिका, परुषा और ग्राम्या
- 8. निष्कर्ष: अलंकारवाद का सबसे कड़ा रक्षक
संस्कृत काव्यशास्त्र (Poetics) के इतिहास में 'अलंकार संप्रदाय' (School of Ornaments) का बीजारोपण भले ही आचार्य भामह ने किया था, लेकिन उस संप्रदाय को एक अत्यंत तार्किक, व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप देने का श्रेय आचार्य उद्भट (Acharya Udbhata) को जाता है।
उद्भट केवल एक आलोचक नहीं थे; वे प्राचीन भारत के सबसे प्रतिष्ठित, शक्तिशाली और सबसे अधिक वेतन पाने वाले विद्वानों (Scholars) में से एक थे। उन्होंने अपने ग्रंथ 'काव्यालंकारसारसंग्रह' (Kavyalankarasarasangraha) में अलंकारों का ऐसा वर्गीकरण किया जिसे बाद के सभी आचार्यों (जैसे मम्मट और रुय्यक) ने प्रमाण माना।
| पूरा नाम | आचार्य उद्भट (Acharya Udbhata) |
| जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) |
ऐतिहासिक अकादमिक मत: 8वीं शताब्दी ईस्वी का उत्तरार्ध (Late 8th Century CE / 779 ई. - 813 ई.)। ऐतिहासिक प्रमाण: कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अनुसार, उद्भट कश्मीर के प्रतापी राजा जयापीड (King Jayapida) के दरबार में 'सभापति' (Chief Pundit) थे। वे 'रीति संप्रदाय' के जनक आचार्य वामन के ठीक समकालीन (Contemporary) थे। |
| महानतम कृति | काव्यालंकारसारसंग्रह (Kavyalankarasarasangraha) - 6 वर्गों (अध्यायों) में रचित ग्रंथ। |
| अन्य कृतियाँ (लुप्त) | भामहविवरण (भामह के काव्यालंकार पर टीका) और 'कुमारसंभव' (कालिदास से भिन्न, स्वयं का महाकाव्य)। |
| काव्यशास्त्रीय संप्रदाय | अलंकार संप्रदाय (Alankara Sampradaya) के प्रबल समर्थक। |
| विशेष दार्शनिक मत | गुण और अलंकार में कोई वास्तविक भेद (अंतर) नहीं है। दोनों ही काव्य के आभूषण हैं। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: एक लाख दीनार का दैनिक वेतन
आचार्य उद्भट का ऐतिहासिक काल कल्हण की 'राजतरंगिणी' (12वीं सदी का ऐतिहासिक ग्रंथ) से पूर्णतः सिद्ध होता है। कल्हण ने कश्मीर के राजा जयापीड के दरबार का वर्णन करते हुए उद्भट के सम्मान और उनके वेतन (Salary) का एक अत्यंत विस्मयकारी विवरण दिया है:
उद्भटः सभापतिस्तस्य तस्यैवाभूत् क्षमापतेः॥ (अर्थ: प्रतिदिन एक लाख दीनार (1,00,000 Dinars) का वेतन पाने वाले 'विद्वान उद्भट' उसी क्षमापति (राजा जयापीड) की राजसभा के 'सभापति' (Chief of the Assembly) थे।)
यद्यपि 'एक लाख दीनार' तांबे या चांदी की मुद्राएं हो सकती हैं, फिर भी यह श्लोक भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) का एक ज्वलंत प्रमाण है कि 8वीं शताब्दी के कश्मीर में 'ज्ञान' और 'शास्त्र' को राजाओं द्वारा कितना अधिक महत्व और आर्थिक मूल्य दिया जाता था।
3. 'काव्यालंकारसारसंग्रह': ग्रंथ की संरचना और विशेषता
उद्भट का मुख्य उपलब्ध ग्रंथ 'काव्यालंकारसारसंग्रह' है (जिसका अर्थ है: काव्यालंकारों के सार का संग्रह)।
इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उद्भट ने अलंकारों को समझाने के लिए किसी अन्य कवि (जैसे कालिदास या भारवि) के श्लोकों का उदाहरण नहीं लिया।
उन्होंने अलंकारों की परिभाषा (लक्षण) स्वयं गढ़ी, और उनके 'उदाहरण' (Examples) अपने ही द्वारा रचे गए एक 'कुमारसंभव' नामक महाकाव्य (जो अब लुप्त है) से दिए। यह उनका प्रखर आत्मविश्वास था कि एक आलोचक (Critic) स्वयं एक श्रेष्ठ कवि (Poet) भी हो सकता है।
4. अलंकारों का वैज्ञानिक वर्गीकरण (6 वर्ग और 41 अलंकार)
उद्भट से पूर्व भामह ने 38 अलंकार बताए थे, लेकिन वे बिखरे हुए थे। उद्भट ने एक अत्यंत वैज्ञानिक वर्गीकरण (Scientific Taxonomy) प्रस्तुत किया।
उन्होंने अलंकारों को 6 वर्गों (Vargas/Classes) में विभाजित किया और कुल 41 अलंकारों का अत्यंत सूक्ष्म लक्षण प्रस्तुत किया। उनका यह वर्गीकरण (विशेषकर 'श्लेष' और 'अनुप्रास' के भेद) इतना प्रामाणिक था कि बाद में आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश के रचयिता) ने भी उद्भट की ही परिभाषाओं को लगभग ज्यों का त्यों स्वीकार किया।
5. उद्भट का दर्शन: 'गुण' और 'अलंकार' में कोई भेद नहीं
उद्भट के समकालीन थे आचार्य वामन (जिन्होंने 'रीतिरात्मा काव्यस्य' कहा था)। वामन ने कहा था कि 'गुण' (जैसे माधुर्य, ओज) काव्य के नित्य/आंतरिक धर्म हैं, जबकि 'अलंकार' (जैसे उपमा, रूपक) अनित्य/बाहरी आभूषण हैं।
उद्भट एक पक्के अलंकारवादी (Alankaravadin) थे। उन्होंने वामन के सिद्धांत का खंडन करते हुए कहा:
"गुण और अलंकार में कोई तात्विक भेद नहीं है।"
उनका तर्क था कि जैसे शरीर को सुंदर बनाने का काम आभूषण करते हैं, वैसे ही गुण भी करते हैं। दोनों का एकमात्र उद्देश्य 'काव्य को सुंदर बनाना' (Beautification) है। जब दोनों का उद्देश्य एक ही है, तो एक को 'आत्मा का धर्म' और दूसरे को 'शरीर का धर्म' कहना केवल शब्दों का जाल है। उद्भट के अनुसार, सब कुछ 'अलंकार' ही है।
6. श्लेष (Pun) की सर्वोच्चता: शब्द और अर्थ का जादू
आचार्य उद्भट ने 'श्लेष अलंकार' (Shlesha Alankara - Pun/Double Entendre) को काव्य में एक अत्यंत विशिष्ट और उच्च स्थान प्रदान किया।
उन्होंने श्लेष को दो भागों में बांटा:
1. शब्द-श्लेष: जहाँ एक ही शब्द के दो अर्थ हों, लेकिन शब्द बदलने पर चमत्कार खत्म हो जाए।
2. अर्थ-श्लेष: जहाँ अर्थ में द्विअर्थी चमत्कार हो, और पर्यायवाची शब्द रखने पर भी चमत्कार बना रहे।
उद्भट का यह सिद्धांत बहुत प्रसिद्ध हुआ कि यदि किसी कविता में 'श्लेष' के साथ कोई अन्य अलंकार (जैसे उपमा) आता है, तो 'श्लेष' ही मुख्य माना जाएगा (श्लेष हमेशा अन्य अलंकारों को दबा देता है)। यह उनका एक मौलिक काव्यशास्त्रीय नियम था।
7. अनुप्रास की तीन वृत्तियां: उपनागरिका, परुषा और ग्राम्या
उद्भट ने 'अनुप्रास' (Alliteration / वर्णों की आवृत्ति) का अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि अलग-अलग भावों को जगाने के लिए व्यंजनों (Consonants) की विशेष जमावट (Arrangement) आवश्यक है। उन्होंने इसे 'वृत्ति' (Vritti) नाम दिया:
- उपनागरिका वृत्ति (Upanagarika): अत्यंत मधुर और कोमल व्यंजनों (जैसे श, स, म, न, ल) का प्रयोग। यह शृंगार रस के लिए उपयुक्त है।
- परुषा वृत्ति (Parusha): अत्यंत कठोर और संयुक्त व्यंजनों (जैसे ट, ठ, ड, ढ, र्क, ष्ट) का प्रयोग। यह वीर और रौद्र रस में क्रोध जगाने के लिए उत्तम है।
- ग्राम्या / कोमला वृत्ति (Gramya): जो न बहुत कठोर हो और न बहुत कोमल (मध्यम मार्ग)। यह साधारण हास्य या शांत रस के लिए है।
8. निष्कर्ष: अलंकारवाद का सबसे कड़ा रक्षक
आचार्य उद्भट (8वीं शती) भारतीय काव्यशास्त्र के एक ऐसे स्तंभ हैं, जिन्होंने 'अलंकार' (Figures of Speech) को केवल सजावट की वस्तु न मानकर, उसे कविता के 'अस्तित्व' (Existence) से जोड़ दिया।
यद्यपि बाद के युग में 'ध्वनि संप्रदाय' (आनन्दवर्धन) ने काव्यशास्त्र पर अपना अधिकार कर लिया और अलंकारों को गौण (Secondary) मान लिया गया, फिर भी कोई भी आचार्य उद्भट द्वारा स्थापित की गई अलंकारों की वैज्ञानिक परिभाषाओं (Definitions) को नकार नहीं सका। कल्हण के शब्दों में 'एक लाख दीनार' पाने वाले इस महाविद्वान ने अपने ग्रंथ 'काव्यालंकारसारसंग्रह' से संस्कृत आलोचना-शास्त्र को वह बौद्धिक गरिमा (Intellectual Dignity) प्रदान की, जो आज भी अद्वितीय है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- काव्यालंकारसारसंग्रह - आचार्य उद्भट (प्रतिहारेन्दुराज की 'लघुवृत्ति' टीका सहित)।
- राजतरंगिणी - कल्हण (चतुर्थ तरंग - उद्भट और जयापीड का ऐतिहासिक साक्ष्य)।
- History of Sanskrit Poetics - Dr. P.V. Kane (उद्भट का अलंकार वर्गीकरण)।
- काव्यशास्त्र - डॉ. भगीरथ मिश्र (गुण और अलंकार का अभेद सिद्धांत)।
