आचार्य विश्वबंधु: वैदिक पदानुक्रम कोष के निर्माता और पांडुलिपियों के रक्षक
एक विस्तृत ऐतिहासिक और अकादमिक विश्लेषण: वह तपस्वी जिसने विभाजन की आग में अपनी जान पर खेलकर वेदों के 'शब्दों' को बचाया और होशियारपुर को 'वैदिक काशी' बना दिया (The Savior of Vedic Manuscripts)
- 1. प्रस्तावना: वैदिक शब्दों का गूगल (Google)
- 2. जीवन परिचय: भेरा से लाहौर तक
- 3. 1947 की महागाथा: लाहौर से पांडुलिपियों का पलायन
- 4. 'वैदिक पदानुक्रम कोष': 16 खंडों का महासागर
- 5. पाठालोचन (Textual Criticism): भारतीय पद्धति का विकास
- 6. वी.वी.आर.आई. (होशियारपुर) की स्थापना
- 7. अन्य साहित्यिक योगदान और संपादन
- 8. निष्कर्ष: आधुनिक वेद-व्यास
यदि आचार्य सायण ने वेदों के **'अर्थ'** (Meaning) को खोला, तो आधुनिक काल में **आचार्य विश्वबंधु** ने वेदों के **'शब्दों'** (Words) को व्यवस्थित किया। उनका कार्य इतना विशाल और तकनीकी है कि उसे एक व्यक्ति द्वारा एक ही जीवन में पूरा करना असंभव लगता है।
उन्होंने **'वैदिक पदानुक्रम कोष'** (Vedic Word Concordance) का निर्माण किया। यह एक ऐसा अद्भुत इंडेक्स है जिसमें वैदिक साहित्य (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद) का **एक-एक शब्द** कहाँ-कहाँ आया है, इसका पूरा विवरण है। 1947 के भारत-पाक विभाजन के दौरान, जब लोग अपनी संपत्ति बचा रहे थे, आचार्य विश्वबंधु पाकिस्तान (लाहौर) से 30 बैगन (Wagons) भरकर पांडुलिपियां और प्रिंटिंग प्रेस भारत लाए थे।
| पूरा नाम | आचार्य विश्वबंधु शास्त्री |
| काल | 30 सितंबर 1897 – 1 अगस्त 1973 |
| जन्म स्थान | भेरा, सरगोधा (अब पाकिस्तान) |
| कर्मभूमि | लाहौर (1924-1947), होशियारपुर (1947-1973) |
| संस्थापक/निदेशक | विश्वेश्वरानंद वैदिक शोध संस्थान (VVRI) |
| महानतम कृति | वैदिक पदानुक्रम कोष (16 विशाल खंड) |
| विशेषज्ञता | कोश-निर्माण (Lexicography) और पाठालोचन (Textual Criticism) |
| सम्मान | पद्म भूषण (1968) |
2. जीवन परिचय: भेरा से लाहौर तक
आचार्य विश्वबंधु का जन्म अविभाजित पंजाब के सरगोधा जिले के भेरा नामक स्थान पर हुआ था। वे बचपन से ही मेधावी थे और आर्य समाज के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज से संस्कृत में एम.ए. किया।
स्वामी विश्वेश्वरानंद की प्रेरणा: उनके जीवन को दिशा तब मिली जब वे स्वामी विश्वेश्वरानंद और स्वामी नित्यानंद के संपर्क में आए। इन संन्यासियों ने वैदिक कोष बनाने का सपना देखा था, लेकिन उनके पास तकनीकी ज्ञान नहीं था। युवा विश्वबंधु ने इस सपने को पूरा करने का बीड़ा उठाया और 1924 में लाहौर में **'विश्वेश्वरानंद वैदिक शोध संस्थान'** की कमान संभाली।
3. 1947 की महागाथा: लाहौर से पांडुलिपियों का पलायन
1947 में जब भारत का विभाजन हुआ, लाहौर दंगों की आग में जल रहा था। संस्थान का कार्यालय डी.ए.वी. कॉलेज लाहौर के पास था।
आचार्य विश्वबंधु को अपनी जान की चिंता नहीं थी, उन्हें चिंता थी उन **हजारों दुर्लभ पांडुलिपियों** और आधे छपे हुए **'वैदिक कोष'** के पन्नों की।
अद्भुत साहस का परिचय देते हुए, उन्होंने और उनके निष्ठावान सहयोगियों ने 4000 मन (लगभग 150 टन) वजन का सामान—जिसमें पांडुलिपियां, टाइप, मशीनें और कागज थे—ट्रकों और मालगाड़ियों में लादा। वे 30 वैगन सामान लेकर भारत आए और पंजाब के **होशियारपुर** (साधु आश्रम) में शरण ली। इस घटना ने उन्हें एक 'अकादमिक नायक' बना दिया।
4. 'वैदिक पदानुक्रम कोष': 16 खंडों का महासागर
होशियारपुर में उन्होंने तंबू और टूटे-फूटे कमरों में पुनः कार्य शुरू किया। उनका महाग्रंथ **"Vaidika-Padanukrama-Kosha"** (A Vedic Word Concordance) 16 विशाल खंडों (Volumes) में प्रकाशित हुआ।
यह कार्य 1935 से 1965 तक (30 वर्ष) चला। इसमें वैदिक साहित्य को चार भागों में बांटा गया:
1. संहिता खंड: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के सभी शब्द।
2. ब्राह्मण-आरण्यक खंड: ब्राह्मण ग्रंथों के शब्द।
3. उपनिषद खंड: 200 से अधिक उपनिषदों के शब्द।
4. वेदांग खंड: सूत्र ग्रंथों के शब्द।
इसमें हर शब्द का व्याकरणिक रूप, स्वर (Accent) और संदर्भ दिया गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा शाब्दिक इंडेक्स है।
5. पाठालोचन (Textual Criticism): भारतीय पद्धति का विकास
आचार्य विश्वबंधु केवल संग्रहकर्ता नहीं थे, वे **'पाठ-समीक्षक'** (Textual Critic) थे।
- वैज्ञानिक विधि: उन्होंने पश्चिमी विद्वानों (जर्मन) की आलोचनात्मक पद्धति को अपनाया लेकिन उसे भारतीय परंपरा के साथ जोड़ा।
- शुद्धिकरण: उन्होंने देखा कि वेदों के जो संस्करण मैक्स मूलर या अन्य ने छापे थे, उनमें कई गलतियां थीं। विश्वबंधु ने दक्षिण भारत और कश्मीर से मंगाई गई पुरानी पांडुलिपियों (Manuscripts) की तुलना करके वेदों का शुद्ध पाठ तैयार किया।
- स्वर प्रक्रिया: उन्होंने लुप्त हो चुके वैदिक स्वरों को पुनः स्थापित करने में युधिष्ठिर मीमांसक की तरह ही महत्वपूर्ण कार्य किया।
6. वी.वी.आर.आई. (होशियारपुर) की स्थापना
आज होशियारपुर स्थित **वी.वी.आर.आई.** (Vishveshvaranand Vedic Research Institute) दुनिया भर में इंडोलॉजी का एक प्रमुख केंद्र है।
आचार्य जी ने इसे पंजाब विश्वविद्यालय (Panjab University) के साथ जोड़ा। आज इसे **VVBIS & IS** (Vishveshvaranand Vishwabandhu Institute of Sanskrit and Indological Studies) के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ दुनिया भर से विद्वान शोध करने आते हैं। इस संस्थान में **'देवनागरी'** के अलावा शारदा, ग्रंथ, और मलयालम लिपियों की हजारों पांडुलिपियां सुरक्षित हैं।
7. अन्य साहित्यिक योगदान और संपादन
वैदिक कोष के अलावा, उन्होंने कई अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों का संपादन किया:
- ऋग्वेद (भाष्य सहित): उन्होंने स्कंदस्वामी, उद्गीथ और वेंकट माधव के भाष्यों के साथ ऋग्वेद का एक आलोचनात्मक संस्करण (Critical Edition) प्रकाशित किया।
- अथर्ववेद: अथर्ववेद का उनका संपादित संस्करण विद्वानों के बीच मानक माना जाता है।
- सिद्ध-भारती: उन्होंने 'सिद्ध-भारती' नामक पत्रिका और शोध लेखों के माध्यम से नए शोधकर्ताओं को मंच प्रदान किया।
8. निष्कर्ष: आधुनिक वेद-व्यास
आचार्य विश्वबंधु एक 'कर्मयोगी' थे। उन्होंने विवाह नहीं किया और अपना पूरा जीवन, अपनी सारी संपत्ति संस्था को दान कर दी। वे दिन में 16-18 घंटे काम करते थे।
आज यदि कोई कंप्यूटर पर एक क्लिक में यह जान सकता है कि 'अग्नि' शब्द वेदों में कितनी बार और कहाँ आया है, तो इसके पीछे आचार्य विश्वबंधु और उनके सहयोगियों की 40 वर्षों की तपस्या है। उन्होंने वेदों को **'डिजिटल युग'** के लिए तैयार कर दिया था, जब कंप्यूटर का नामोनिशान नहीं था। वे सही अर्थों में 20वीं सदी के वेद-व्यास थे।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- Vaidika-Padanukrama-Kosha (16 Vols) - Acharya Vishva Bandhu.
- A Vedic Word Concordance - VVRI Publications.
- The History of VVRI - K.V. Sarma.
- Vedic Textuo-Linguistic Studies - Vishva Bandhu.
