डॉ. कपिल देव द्विवेदी: 'वेदों में विज्ञान' के उद्गाता, संस्कृत व्याकरण के आधुनिक पाणिनि और पद्मश्री विभूति | Dr. Kapil Dev Dwivedi

Sooraj Krishna Shastri
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डॉ. कपिल देव द्विवेदी: संस्कृत और वैदिक विज्ञान के आधुनिक सेतु

डॉ. कपिल देव द्विवेदी: 'वेदों में विज्ञान' के उद्गाता और संस्कृत व्याकरण के आधुनिक आचार्य

एक विस्तृत अकादमिक और वैज्ञानिक विश्लेषण: वह विद्वान जिन्होंने संस्कृत को 'गणित' की तरह सरल बनाया और वेदों में छिपे 'भौतिक विज्ञान' को दुनिया के सामने रखा (The Pioneer of Vedic Science)

आधुनिक भारत में यदि कोई ऐसा विद्वान हुआ जिसने संस्कृत भाषा को आम छात्रों के लिए सुलभ बनाया और साथ ही वेदों को अंधश्रद्धा से निकालकर विज्ञान की प्रयोगशाला में प्रतिष्ठित किया, तो वे थे **पद्मश्री डॉ. कपिल देव द्विवेदी** (Dr. Kapil Dev Dwivedi)।

वे एक ही जीवन में दो महान कार्य कर गए:
1. उन्होंने **'रचनानुवादकौमुदी'** (Rachnanuvad Kaumudi) लिखकर संस्कृत व्याकरण को गणित की तरह तर्कसंगत और सरल बना दिया।
2. उन्होंने **'वेदों में विज्ञान'** (Science in the Vedas) लिखकर यह सिद्ध किया कि वेद केवल पूजा की पुस्तकें नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के विज्ञान और तकनीक के दस्तावेज हैं।

📌 डॉ. कपिल देव द्विवेदी: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम डॉ. कपिल देव द्विवेदी
जीवन काल 16 दिसंबर 1917 – 29 अगस्त 2011 (94 वर्ष)
जन्म स्थान गहमार, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा एम.ए. (संस्कृत, हिंदी), डी.फिल., साहित्याचार्य
कार्यक्षेत्र कुलपति, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय (हरिद्वार)
महानतम कृति (व्याकरण) रचनानुवादकौमुदी (प्रारंभिक, मध्य, प्रौढ़)
महानतम कृति (शोध) वेदों में विज्ञान (Vedon Mein Vigyan)
सम्मान पद्मश्री (1991), राष्ट्रपति सम्मान

2. जीवन परिचय: गाजीपुर से गुरुकुल कांगड़ी तक

डॉ. कपिल देव द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के प्रसिद्ध गाँव **गहमार** में हुआ था। यह गाँव अपनी वीरता के लिए जाना जाता है, लेकिन डॉ. द्विवेदी ने कलम को अपना हथियार बनाया।

शिक्षा और करियर: उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे एक मेधावी छात्र थे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक प्राध्यापक के रूप में की और बाद में वे **गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय**, हरिद्वार के कुलपति (Vice-Chancellor) बने। उन्होंने 80 से अधिक पुस्तकों की रचना की। उनका पूरा जीवन संस्कृत भाषा के प्रचार और वैदिक विज्ञान के शोध में समर्पित रहा।

3. 'रचनानुवादकौमुदी': संस्कृत सीखने की वैज्ञानिक पद्धति

डॉ. द्विवेदी की पहचान छात्रों के बीच उनकी व्याकरण पुस्तकों के कारण है। उन्होंने देखा कि छात्र 'लघुसिद्धांतकौमुदी' को रटते तो हैं, लेकिन संस्कृत बोल या लिख नहीं पाते।

संरचनात्मक विधि (Structural Method)

उन्होंने **"रचनानुवादकौमुदी"** (Rachnanuvad Kaumudi) श्रृंखला लिखी।
1. प्रारंभिक रचनानुवादकौमुदी: शुरुआती छात्रों के लिए।
2. रचनानुवादकौमुदी: इंटरमीडिएट स्तर।
3. प्रौढ़ रचनानुवादकौमुदी: उच्च स्तर के विद्वानों के लिए।

विशेषता: इसमें उन्होंने हिंदी से संस्कृत अनुवाद के नियम, धातु रूप और शब्द रूप को **गणितीय सूत्रों** की तरह प्रस्तुत किया। आज भी यूपीएससी (UPSC) और राज्य सेवाओं में संस्कृत विषय लेने वाले छात्रों के लिए यह 'अनिवार्य पुस्तक' है।

4. 'वेदों में विज्ञान': जीवन का महाशोध

व्याकरण के बाद, उनका दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कार्य वैदिक विज्ञान पर है। उनकी पुस्तक "वेदों में विज्ञान" (Vedon Mein Vigyan) इस विषय का विश्वकोश है।

उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती और पं. मधुसूदन ओझा की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने तर्क दिया कि वेद केवल ऋषियों की कविताएं नहीं हैं, बल्कि उनमें सृष्टि के **मौलिक नियमों** (Fundamental Laws of Universe) का वर्णन है।

डॉ. द्विवेदी ने कहा: "भारत विश्वगुरु इसलिए था क्योंकि हमारे पास विज्ञान था, केवल इसलिए नहीं कि हम पूजा-पाठ करते थे।"

5. वैदिक विज्ञान के प्रमुख उदाहरण (जल, विद्युत, विमान)

अपनी पुस्तकों में डॉ. द्विवेदी ने मंत्रों का उद्धरण देकर वैज्ञानिक तथ्यों को उजागर किया:

प्रमुख शोध बिंदु
  • जल विज्ञान (Hydrology): उन्होंने ऋग्वेद और अथर्ववेद से सिद्ध किया कि वैदिक ऋषि जल चक्र (Water Cycle) और बादलों के निर्माण की प्रक्रिया (O₂ + H₂ का संयोग - मित्रावरुण) को जानते थे।
  • चिकित्सा विज्ञान: अथर्ववेद में वर्णित कृमि (Bacteria/Virus) सिद्धांत और सूर्य चिकित्सा (Chromotherapy) पर उन्होंने विस्तृत शोध किया।
  • खगोल विज्ञान: उन्होंने बताया कि वेदों में पृथ्वी के घूमने, ग्रहण लगने और सौर मंडल की संरचना के स्पष्ट संकेत हैं।
  • विमान विद्या: उन्होंने ऋग्वेद के उन मंत्रों की व्याख्या की जिनमें 'त्रि-तलीय' (Three-storeyed) और 'त्रि-चक्र' (Three-wheeled) वाहनों का वर्णन है जो अंतरिक्ष में उड़ सकते थे।

6. सांस्कृतिक साहित्य: देवताओं का वैज्ञानिक स्वरूप

डॉ. द्विवेदी ने देवताओं के पौराणिक स्वरूप की जगह उनके **'वैज्ञानिक स्वरूप'** (Scientific Aspect) को प्रस्तुत किया।

  • शिव और शक्ति: उन्होंने 'शिव' को कल्याणकारी तत्व और 'शक्ति' को ऊर्जा (Energy) के रूप में परिभाषित किया।
  • यज्ञ: उन्होंने यज्ञ को केवल कर्मकांड न मानकर पर्यावरण शुद्धि (Environmental Purification) की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया बताया। उन्होंने "वैदिक यज्ञाहुति और प्रदूषण निवारण" पर शोध किया।
  • 16 संस्कार: उन्होंने संस्कारों के पीछे छिपे मनोविज्ञान और समाजशास्त्र को अपनी पुस्तकों में समझाया।

7. विश्व भारती अनुसंधान परिषद और अन्य संस्थाएं

अपने शोध को संस्थागत रूप देने के लिए उन्होंने **'विश्व भारती अनुसंधान परिषद'** (ज्ञानपुर, भदोही) की स्थापना की।

इस संस्था के माध्यम से उन्होंने 100 से अधिक ग्रंथों का प्रकाशन किया। उनका लक्ष्य था कि वेदों का ज्ञान केवल संस्कृत के विद्वानों तक सीमित न रहे, बल्कि वह हिंदी और अंग्रेजी के माध्यम से आम जनता और वैज्ञानिकों तक पहुँचे। उन्होंने वेदों का एक ऐसा भाष्य लिखा जो आधुनिक विज्ञान के छात्रों को भी आकर्षित कर सके।

8. निष्कर्ष: पद्मश्री डॉ. द्विवेदी की विरासत

1991 में भारत सरकार ने उनकी सेवाओं के लिए उन्हें **पद्मश्री** से सम्मानित किया। 2011 में 94 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हुआ, लेकिन वे अपने पीछे ज्ञान का एक विशाल भंडार छोड़ गए।

डॉ. कपिल देव द्विवेदी एक ऐसे **'सेतु'** (Bridge) थे जिन्होंने प्राचीन गुरुकुल परंपरा और आधुनिक विश्वविद्यालय शिक्षा को जोड़ दिया।
आज यदि कोई छात्र संस्कृत व्याकरण को आसानी से समझ पा रहा है, या कोई वैज्ञानिक वेदों में विज्ञान के सूत्र खोज रहा है, तो कहीं न कहीं वह डॉ. द्विवेदी के कार्यों का ऋणी है। वे आधुनिक युग के **'वेद-व्यास'** और **'पाणिनि'** दोनों की भूमिका में नजर आते हैं।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • वेदों में विज्ञान - डॉ. कपिल देव द्विवेदी (विश्व भारती अनुसंधान परिषद)।
  • रचनानुवादकौमुदी - डॉ. कपिल देव द्विवेदी (विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी)।
  • वैदिक भौतिकी - डॉ. कपिल देव द्विवेदी।
  • संस्कृत साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास - डॉ. कपिल देव द्विवेदी।

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