Akrita Droha (Ahinsa): वैष्णव का परम गुण और वास्तविक अहिंसा क्या है?

Sooraj Krishna Shastri
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अकृत-द्रोह (अहिंसा)

"वैष्णव का परम गुण और वास्तविक आध्यात्मिक अहिंसा का रहस्य"

वैष्णव का अकृत-द्रोह स्वभाव

श्री चैतन्य चरितामृत में वर्णित एक शुद्ध वैष्णव के छब्बीस गुणों में से दूसरा गुण है— 'अकृत-द्रोह' (अहिंसा)। अकृत-द्रोह का अर्थ है किसी के भी प्रति शत्रुता या द्रोह का भाव न रखना। इस भौतिक संसार में केवल एक सच्चा वैष्णव ही पूर्ण रूप से अहिंसक हो सकता है, क्योंकि उसकी दृष्टि शरीर तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह हर जीव में परमात्मा का अंश देखता है।

आम तौर पर संसार में लोग अहिंसा का अर्थ केवल किसी को शारीरिक चोट न पहुँचाना समझते हैं, परंतु श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर समझाते हैं कि वास्तविक अहिंसा बहुत गहरी है। इस संसार में मुख्य रूप से हिंसा दो प्रकार की देखने को मिलती है:

१. प्रत्यक्ष हिंसा (लौकिक)

अपने मन, शरीर और शब्दों से सीधे तौर पर दूसरों को कष्ट पहुँचाना या उन पर हिंसा दिखाने का प्रयास करना। किसी को अपशब्द कहना, ईर्ष्या करना या शारीरिक चोट पहुँचाना इस श्रेणी में आता है।

२. परोक्ष/आध्यात्मिक हिंसा

किसी जीव को अन्याय करने वाले दूसरे जीव के क्रूर व्यवहार से न रोकना। सबसे बड़ी हिंसा यह है कि किसी जीव को अज्ञानता (माया) में भटकते हुए देखकर भी उसे हरि-भक्ति का मार्ग न दिखाना और उसे जन्म-मृत्यु के चक्र में सड़ने देना।

वास्तविक करुणा क्या है?

एक सच्चा वैष्णव केवल शारीरिक स्तर पर मदद नहीं करता, बल्कि वह आत्मा का उद्धार करता है। वह जीवों को अन्याभिलाष (भौतिक इच्छाओं), सकाम कर्म (फल की इच्छा से किए गए कार्य) और शुष्क चिंतन (ज्ञान के अहंकार) के आवरण से मुक्त होने का उपदेश देता है।

"जब एक वैष्णव किसी बद्ध जीव को श्री हरि की सेवा में लगने के लिए प्रेरित करता है, तो वह वास्तव में उसे माया के क्रूर प्रहारों से बचा रहा होता है। यही उसकी सबसे बड़ी 'अहिंसक' विशेषता है।"

जो व्यक्ति रजोगुण (Passion) और तमोगुण (Ignorance) से प्रेरित होकर दूसरों से ईर्ष्या करता है, उसे सभी लोग हिंसक अभक्त मानते हैं। लेकिन एक वैष्णव के अंतर्निहित स्वभाव में इन दोनों प्रकार की हिंसा (शारीरिक और आध्यात्मिक) को कभी जगह नहीं मिलती। वह मन, वचन और कर्म से पूर्णतः अजातशत्रु होता है।

👁️ अज्ञानी जीवों की दृष्टि और वैष्णव का प्रेम

अक्सर देखा जाता है कि जब कोई वैष्णव मायावादी चिंतकों, सकाम कर्मियों या भौतिकतावादियों की विचारधारा का खंडन करता है, तो अज्ञानी लोग उसे गलत समझ लेते हैं। जिनके पास अपने भविष्य के कर्मफलों (Reactions) की कोई दृष्टि नहीं है, वे सोचते हैं कि— "यह वैष्णव तो ज्ञानियों और कर्मियों से नफरत करता है, यह उनकी निंदा कर रहा है।"

परंतु वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। चूँकि एक शुद्ध वैष्णव स्वभाव से अत्यंत दयालु (कृपालु) होता है, वह उन जीवों की दुर्दशा देखकर द्रवित हो जाता है। वह माया में फँसे जीवों से ईर्ष्या नहीं करता, बल्कि करुणा से प्रेरित होकर उनके लिए परम शुभ (कल्याण) की इच्छा रखता है।

एक डॉक्टर जब मरीज का सड़ा हुआ अंग काटता है, तो वह क्रूर नहीं, बल्कि कृपालु होता है। उसी प्रकार, एक वैष्णव जो बद्ध जीवों के कष्टों के लिए दुखी होता है और उन्हें माया से निकालकर हरि की सेवा का निर्देश देता है, वही संसार का सबसे बड़ा 'अहिंसक' महापुरुष है।

— सन्दर्भ: श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद (सज्जन तोषणी, खंड 20, अंक 3, 1917)

परम विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम्

कलियुग के इस अंधकारमय युग में, जहाँ हर तरफ कलह, अज्ञानता और आध्यात्मिक हिंसा का बोलबाला है, यह हरिनाम संकीर्तन आंदोलन संपूर्ण मानवता के लिए परम वरदान है। यह आत्मा को भगवान श्रीकृष्ण से सीधे जोड़ने और हृदय में सुप्त 'भगवत्-प्रेम' को जाग्रत करने की सर्वोत्तम और सबसे सरल विधि है।

"इसीलिए सदा ही तृण से भी अधिक विनीत भाव (नम्रता) धारण करके भगवान के पवित्र नामों का जप करिए और जीवन में वास्तविक आनंद प्राप्त कीजिए।"

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

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