महाकवि सुबंधु: 'वासवदत्ता' के रचयिता और 'प्रत्यक्षर-श्लेष' (Pun) के अद्वितीय गद्यकार | Mahakavi Subandhu

Sooraj Krishna Shastri
By -
0
महाकवि सुबंधु: 'वासवदत्ता' और श्लेष-अलंकार के सम्राट

महाकवि सुबंधु: 'वासवदत्ता' के रचयिता और 'प्रत्यक्षर-श्लेष' के चमत्कारी गद्यकार

एक अत्यंत विस्तृत ऐतिहासिक, अलंकारिक और साहित्यिक विश्लेषण: संस्कृत 'गद्य-त्रयी' का वह अत्यंत आत्मविश्वासी और अलंकृत गद्यकार, जिसने घोषणा की थी कि उसकी रचना का एक-एक अक्षर 'श्लेष' (Puns / Double meanings) से जड़ा हुआ है, और जिसके गर्व को बाणभट्ट जैसे महाकवि ने भी प्रणाम किया।

संस्कृत साहित्य में गद्य (Prose) को कवियों की सबसे बड़ी कसौटी माना गया है (गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति)। इस कठिन कसौटी पर खड़े होने वाले तीन ही सबसे महान स्तंभ हैं, जिन्हें 'गद्य-त्रयी' (The Prose Triad) कहा जाता है: आचार्य दण्डी, महाकवि सुबंधु और महाकवि बाणभट्ट।

इन तीनों में महाकवि सुबंधु (Mahakavi Subandhu) का मार्ग सबसे कठिन और चमत्कारिक था। उन्होंने भाषा के सीधे-सरल प्रवाह को छोड़कर 'श्लेष' (Shlesha Alankara) का मार्ग अपनाया। 'श्लेष' का अर्थ है एक ही शब्द के दो या अनेक अर्थ निकलना (Pun / Play on words)। सुबंधु ने अपनी एकमात्र रचना 'वासवदत्ता' (Vasavadatta) में शब्दों को ऐसे गूंथा है कि पूरा का पूरा ग्रंथ दो अलग-अलग अर्थों में पढ़ा जा सकता है।

📌 महाकवि सुबंधु: एक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक प्रोफाइल
पूरा नाम महाकवि सुबंधु (Mahakavi Subandhu)
जन्म एवं काल निर्धारण (Lifespan) ऐतिहासिक अकादमिक मत (Indology): लगभग छठी शताब्दी ईस्वी का उत्तरार्ध (Late 6th Century CE / 550 ई. - 600 ई.)।
अकाट्य प्रमाण: 7वीं शताब्दी के प्रारंभ में सम्राट हर्षवर्धन के राजकवि बाणभट्ट ने अपने ग्रंथ 'हर्षचरितम्' की प्रस्तावना में सुबंधु की 'वासवदत्ता' की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। अतः यह निर्विवाद है कि सुबंधु बाणभट्ट से पूर्व (छठी शताब्दी के अंत में) विद्यमान थे।
एकमात्र उपलब्ध कृति वासवदत्ता (Vasavadatta) - एक अलंकृत गद्य-काव्य (कथा)।
काव्य की विधा आख्यायिका / कथा (पूर्णतः काल्पनिक प्रेम कथा)।
सर्वप्रमुख अलंकार श्लेष (Pun / Double Meaning) और विरोधाभास। (प्रत्यक्षरश्लेष)।
स्थान (परंपरा में) संस्कृत 'गद्य-त्रयी' (दण्डी, सुबंधु, बाणभट्ट) के मध्य-स्तंभ।

2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: बाणभट्ट की ऐतिहासिक गवाही

सुबंधु के व्यक्तिगत जीवन, माता-पिता या आश्रयदाता राजा के विषय में 'वासवदत्ता' ग्रंथ से कोई स्पष्ट ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती। वे अपने ग्रंथ के मंगलाचरण में शिव और सरस्वती की वंदना करते हैं और दुर्जनों (दुष्टों) की निंदा करते हैं।

परंतु उनका काल-निर्धारण संस्कृत साहित्य में बहुत स्पष्ट है। चूँकि महान बाणभट्ट (606–647 ई.) ने उन्हें अपना पूर्वज और आदर्श माना है, और दूसरी ओर सुबंधु ने स्वयं अपने ग्रंथ में 'न्यायवार्तिक' के रचयिता उद्योतकर (लगभग 550 ई.) और बौद्ध दार्शनिक दिङ्नाग का उल्लेख किया है, इसलिए सुबंधु का समय 550 ई. से 600 ई. के ठीक बीच में एकदम सटीक बैठता है।

3. ऐतिहासिक भ्रम निवारण: भास की 'वासवदत्ता' और सुबंधु की 'वासवदत्ता' में अंतर

साहित्य के विद्यार्थियों में एक बहुत बड़ा भ्रम उत्पन्न हो जाता है। महाकवि भास ने 'स्वप्नवासवदत्तम्' नामक 'नाटक' लिखा था। लेकिन सुबंधु की 'वासवदत्ता' एक 'गद्य-काव्य' (Prose Novel) है।

  • भास की वासवदत्ता: ऐतिहासिक पात्र है। वह राजा प्रद्योत की पुत्री और वत्सराज 'उदयन' की पत्नी थी।
  • सुबंधु की वासवदत्ता: यह पूर्णतः काल्पनिक (Fictional) पात्र है। वह कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) के राजा शृंगारशेखर की पुत्री है और उसका प्रेमी राजकुमार 'कन्दर्पकेतु' है। दोनों ग्रंथों की कहानियों में कोई संबंध नहीं है।

4. 'वासवदत्ता' गद्य-काव्य की कथा: स्वप्न, जादू और प्रेम

सुबंधु की 'वासवदत्ता' एक विशुद्ध 'Fairy Tale' या परियों की कहानी जैसी जादुई प्रेमकथा है।

कथानक (The Plot)

राजा चिंतामणि का पुत्र राजकुमार कन्दर्पकेतु एक रात स्वप्न में एक अत्यंत रूपवती कन्या को देखता है और उसके प्रेम में पागल हो जाता है। वह अपने मित्र 'मकरंद' के साथ उस स्वप्न-सुंदरी की खोज में निकल पड़ता है।

विंध्य के जंगलों में रात गुजारते समय, कन्दर्पकेतु एक पेड़ पर बैठी मैना और तोते (Talking birds) की बातचीत सुन लेता है। तोता मैना को बताता है कि कुसुमपुर के राजा शृंगारशेखर की राजकुमारी वासवदत्ता ने भी स्वप्न में एक राजकुमार (कन्दर्पकेतु) को देखा है और वह विरह में तड़प रही है।

कन्दर्पकेतु कुसुमपुर जाता है। दोनों प्रेमी मिलते हैं। चूँकि राजा वासवदत्ता का विवाह कहीं और करना चाहता है, इसलिए दोनों एक जादुई घोड़े (Magic Steed) पर बैठकर विंध्य के जंगलों में भाग जाते हैं।

जंगल में कन्दर्पकेतु सो जाता है और वासवदत्ता दो जंगली जातियों के युद्ध के बीच फंस जाती है। अनजाने में वह एक मुनि के आश्रम में घुस जाती है और मुनि के शाप से पत्थर की मूर्ति (Stone Statue) बन जाती है। बाद में कन्दर्पकेतु उसे खोजता हुआ आता है और उसके 'स्पर्श' से ही वह पत्थर की मूर्ति पुनः जीवित वासवदत्ता बन जाती है। (यह अत्यंत रूमानी और जादुई आख्यान है)।

5. 'प्रत्यक्षर-श्लेष' का चमत्कार: सुबंधु की अपनी गर्वोक्ति

सुबंधु की कहानी भले ही सरल लगे, लेकिन उसे जिस भाषा में लिखा गया है, वह संस्कृत साहित्य की सबसे जटिल (Complex) भाषा है। सुबंधु ने ग्रंथ की शुरुआत में ही अपनी इस महारत की डंके की चोट पर घोषणा की है:

सरस्वतीदत्तवरप्रसादश्चक्रे सुबन्धुः सुजनैकबन्धुः।
प्रत्यक्षरश्लेषमयप्रबन्धविन्यासवैदग्ध्यनिधिर्निबन्धम्॥
(अर्थ: देवी सरस्वती द्वारा दिए गए वरदान और कृपा से युक्त, सज्जनों के एकमात्र मित्र, 'जिसके ग्रंथ के प्रत्येक अक्षर में श्लेष (Pun) भरा हुआ है' (प्रत्यक्षरश्लेष), ऐसे विन्यास की चतुराई के भंडार सुबंधु ने इस 'वासवदत्ता' ग्रंथ की रचना की है।)
श्लेष (Double Meaning) का एक उदाहरण

सुबंधु एक वाक्य से एक साथ 'पर्वत' और 'राजा' दोनों का वर्णन कर देते हैं।
वे विंध्याचल पर्वत का वर्णन करते हुए लिखते हैं: "सत्पक्षपातोऽपि..."
- पर्वत के पक्ष में अर्थ: जिसमें सुंदर 'पंख' (पक्ष) वाले पक्षी उड़ते हैं। (प्राचीन मान्यता थी कि पर्वतों के भी पंख होते थे)।
- राजा के पक्ष में अर्थ: जो सज्जनों (सत्) का पक्ष लेता है (सत्-पक्षपात)।

पूरी किताब ऐसे ही द्व्यर्थी (Double-meaning) और विरोधाभास (Oxymoron) वाक्यों से भरी पड़ी है। यह एक बौद्धिक व्यायाम (Intellectual Exercise) है।

6. बाणभट्ट की प्रसिद्ध प्रशस्ति: "कवीनामगलद्दर्पो..."

सुबंधु का यह चमत्कार इतना प्रभावशाली था कि जब 7वीं सदी में महाकवि बाणभट्ट ने लिखना शुरू किया, तो उन्होंने सबसे पहले सुबंधु की इसी 'वासवदत्ता' को प्रणाम किया और स्वीकार किया कि इस ग्रंथ ने बड़े-बड़े कवियों का घमंड चूर कर दिया था। बाणभट्ट ने हर्षचरितम् में लिखा:

कवीनामगलद्दर्पो नूनं वासवदत्तया।
शक्त्येव पाण्डुपुत्राणां गतया कर्णगोचरम्॥
(अर्थ: जिस प्रकार इंद्र द्वारा दी गई अमोघ 'शक्ति' (Weapon) को अर्जुन के विरुद्ध प्रयोग के लिए तैयार देखकर पांडवों का घमंड (दर्प) गल गया था, ठीक उसी प्रकार 'वासवदत्ता' को कानों (कर्ण) से सुनते ही बड़े-बड़े कवियों का घमंड चूर-चूर हो गया।)

7. गद्य शैली का मूल्यांकन: दण्डी, सुबंधु और बाणभट्ट की तुलना

संस्कृत की 'गद्य-त्रयी' का तुलनात्मक मूल्यांकन इस प्रकार किया जाता है:

  • आचार्य दण्डी: वे 'पदलालित्य' (Grace) के कवि हैं। उनकी भाषा सरल, कोमल और कहानी अत्यंत यथार्थवादी (Action-oriented) है।
  • महाकवि सुबंधु: वे 'श्लेष' (Pun) के सम्राट हैं। उनका ध्यान कहानी आगे बढ़ाने पर कम, और भाषा के चमत्कार, अलंकारों और लंबे-लंबे वर्णनों (Descriptions) पर अधिक है। उनका एक वाक्य पूरा होने में कई पन्ने लग जाते हैं।
  • महाकवि बाणभट्ट: बाण ने दण्डी का लालित्य और सुबंधु का अलंकार—दोनों को मिलाकर एक ऐसा विराट 'ओजस्वी' (Majestic) गद्य (कादंबरी) रचा, जिसने दोनों को पीछे छोड़ दिया।

8. निष्कर्ष: भाषा को आभूषण पहनाने वाला जौहरी

महाकवि सुबंधु आधुनिक 'थ्रिलर' या 'फास्ट-पेस्ड नॉवेल' (Fast-paced novel) के लेखक नहीं थे। वे शब्दों के एक जौहरी (Jeweler) थे। 'वासवदत्ता' पढ़ते समय पाठक यह भूल जाता है कि कहानी क्या है, वह केवल इस बात पर मुग्ध रह जाता है कि संस्कृत भाषा के शब्दों को कितने अनगिनत तरीकों से तोड़ा, मरोड़ा और नए अर्थों में पिरोया जा सकता है।

सुबंधु ने 'प्रत्यक्षरश्लेष' की जो कसौटी स्थापित की, उसने आने वाली शताब्दियों के संस्कृत कवियों को एक ऐसी बौद्धिक चुनौती दी, जिसे पार करना लगभग असंभव था। वे भारतीय साहित्य के उस युग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जब भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि स्वयं में एक 'महाकला' (Ultimate Art) बन चुकी थी।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • वासवदत्ता - महाकवि सुबंधु (चौखम्बा विद्याभवन, संस्कृत टीका एवं हिंदी अनुवाद सहित)।
  • हर्षचरितम् - बाणभट्ट (सुबंधु की ऐतिहासिक प्रशस्ति हेतु)।
  • संस्कृत गद्य साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।
  • A History of Indian Literature - Maurice Winternitz (गद्य-काव्य का विकास)।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!