महाभारत युद्ध की रणभेरी बज चुकी थी। कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर से अठारह अक्षौहिणी सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। ऐसे समय में, भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए पांडवों का साथ (विशेषकर अर्जुन के सारथी के रूप में) देने का निश्चय किया। परंतु भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई, साक्षात शेषनाग के अवतार बलराम जी (दाऊ भैया) के लिए यह एक अत्यंत धर्मसंकट की स्थिति थी। उनके लिए दुर्योधन और भीम दोनों ही उनके गदा-युद्ध के प्रिय शिष्य थे। वे दोनों में से किसी का पक्ष लेकर दूसरे का नाश नहीं देखना चाहते थे। इसलिए, युद्ध से विरक्त (तटस्थ) होकर बलराम जी ने 'तीर्थयात्रा' पर जाने का निर्णय लिया। इसी परम पावन तीर्थयात्रा के दौरान नैमिषारण्य में एक ऐसी घटना घटी, जिसने ज्ञान और अहंकार के बीच के अंतर को संसार के सामने स्पष्ट कर दिया।
प्रभास क्षेत्र और सरस्वती नदी के तटों के अनेक तीर्थों में स्नान और दान करते हुए, बलराम जी शौनक आदि महान ऋषियों के आश्रम 'नैमिषारण्य' पहुँचे। नैमिषारण्य वह पवित्र स्थान है जहाँ हजारों ऋषि-मुनि एक सहस्र (1000) वर्ष तक चलने वाले एक महान यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे।
जैसे ही बलराम जी (जो परम तेजोमय और साक्षात भगवान हैं) यज्ञ मंडप में पधारे, सभी ऋषि-मुनि, तपस्वी और ब्राह्मण उनके सम्मान में अपने आसनों से उठ खड़े हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर, वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ बलराम जी का स्वागत किया, उनकी पूजा की और उन्हें सर्वोच्च आसन पर बैठने की प्रार्थना की।
उस यज्ञ मंडप में 'व्यास आसन' (कथावाचक का सर्वोच्च आसन) पर महर्षि वेदव्यास जी के एक प्रमुख शिष्य बैठे थे, जिनका नाम था— रोमहर्षण सूत (इन्हें सूतजी भी कहा जाता है)। रोमहर्षण ने सभी पुराणों, इतिहास और धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। परंतु, इस अपार ज्ञान के कारण उनके भीतर 'अहंकार' (विद्या-मद) उत्पन्न हो गया था।
जब साक्षात परमेश्वर बलराम जी मंडप में आए और सभी वरिष्ठ ऋषि खड़े हो गए, तब भी रोमहर्षण सूत अपने आसन से नहीं उठे। उन्होंने न तो खड़े होकर बलराम जी का स्वागत किया, न प्रणाम किया और न ही कोई आदर भाव दिखाया। वे अपने व्यास-आसन पर अभिमान से तन कर बैठे रहे, यह सोचकर कि 'मैं तो सबसे बड़ा कथावाचक हूँ, मैं क्यों उठूं?'
बलराम जी ने देखा कि रोमहर्षण 'धर्मध्वजी' (केवल धर्म का दिखावा करने वाला पाखंडी) बन गया है। भगवान ने संसार को यह शिक्षा देने के लिए कि 'ज्ञान यदि अहंकार को जन्म दे तो वह मृत्यु के समान है', एक कठोर निर्णय लिया।
वध्या मे धर्मध्वजिनस्ते हि पातकिनोऽधिकाः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.78.27)
ऐसा विचार करके बलराम जी ने अपने हाथों में 'कुशा' (एक प्रकार की पवित्र घास) का एक छोटा सा तिनका लिया और उसे रोमहर्षण सूत की ओर फेंक दिया। वह कुशा का तिनका साक्षात ब्रह्मास्त्र बन गया और उसने पलक झपकते ही रोमहर्षण के प्राण हर लिए। रोमहर्षण सूत निर्जीव होकर व्यास आसन से नीचे गिर पड़े।
यह दृश्य देखकर नैमिषारण्य के सभी ऋषि कांप उठे। यज्ञ मंडप में "हा-हा! यह क्या अनर्थ हो गया!" की ध्वनि गूंजने लगी। शौनक आदि ऋषियों ने दुःखी होकर बलराम जी से कहा—
"हे प्रभो! आपने यह क्या किया? यद्यपि आप परमेश्वर हैं, परंतु हम ऋषियों ने इस यज्ञ के पूर्ण होने तक रोमहर्षण सूत को अजेय रहने और लंबी आयु का वरदान दिया था। साथ ही हमने ही इन्हें 'व्यास-आसन' पर बिठाया था। आपने हमारे वरदान को झूठा कर दिया। अनजाने में ही सही, परंतु आप पर 'ब्रह्महत्या' (व्यास आसन पर बैठे ब्राह्मण के वध) का पाप लग गया है।"
बलराम जी ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक कहा— "हे महर्षियों! आप लोग जो कहेंगे, मैं वह प्रायश्चित (Atonement) अवश्य करूँगा। मेरा उद्देश्य केवल इसके अहंकार को नष्ट करना था। यदि आप चाहें, तो मैं अपनी योगमाया से इसे पुनः जीवित कर सकता हूँ।"
ऋषियों ने कहा— "हे राम! आपका अस्त्र (कुशा) अमोघ है, उसका वार व्यर्थ नहीं जाना चाहिए, और हमारा वरदान भी सत्य रहना चाहिए। कृपया आप कोई ऐसा उपाय करें जिससे दोनों बातें रह जाएं।"
ऋषियों की बात मानकर बलराम जी ने रोमहर्षण के पुत्र 'उग्रश्रवा' (सौती) को व्यास-आसन पर बिठाया। बलराम जी ने उग्रश्रवा को दीर्घायु, असीमित ज्ञान और सभी पुराणों का वक्ता होने का वरदान दिया। (यही उग्रश्रवा सौती हैं, जिन्होंने बाद में शौनक आदि ऋषियों को महाभारत और भागवत की कथा सुनाई)।
इसके पश्चात ऋषियों ने बलराम जी से कहा— "प्रभो! हमारा यज्ञ पूरा होने वाला है, परंतु इल्वल का पुत्र 'बल्वल' नाम का एक भयंकर राक्षस हर पूर्णिमा और अमावस्या (पर्व के दिनों) को आकाश से हमारे यज्ञ कुंड में रक्त, पीप, विष्ठा और हड्डियां गिराकर हमारा यज्ञ अशुद्ध कर देता है। आप उसका वध करके हमारे इस यज्ञ को पूर्ण कराएं, यही आपकी तीर्थयात्रा का पहला प्रायश्चित होगा।"
उसी दिन पर्व का समय था। अचानक आकाश में भयंकर आंधी चलने लगी और बल्वल राक्षस यज्ञ मंडप के ऊपर मंडराने लगा। उसने गंदगी बरसानी शुरू ही की थी कि बलराम जी ने अपना अमोघ 'हल और मूसल' (Plow and Club) का स्मरण किया।
बलराम जी ने अपने हल की नोक से आकाश में उड़ते हुए उस भयंकर राक्षस को फंसा लिया और उसे ज़मीन पर खींच लिया। फिर उन्होंने अपने मूसल से उसके सिर पर ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर फट गया और वह पहाड़ की तरह धरती पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। ऋषियों ने प्रसन्न होकर बलराम जी पर पुष्प वर्षा की और उनका अभिषेक किया।
नैमिषारण्य के ऋषियों को निर्भय करने के पश्चात, बलराम जी अपनी तीर्थयात्रा पर आगे बढ़ गए। वे कोशी, सरयू, प्रयाग (त्रिवेणी संगम), काशी (वाराणसी), गया, गंगासागर, महेंद्र पर्वत (जहाँ उन्होंने परशुराम जी के दर्शन किए), कांचीपुरम, कावेरी, श्रीरंगम, मदुरै, रामेश्वरम, कन्याकुमारी और पंढरपुर जैसे भारतवर्ष के सभी प्रमुख तीर्थों में गए। उन्होंने पूरे एक वर्ष तक पृथ्वी की परिक्रमा की।
अंत में वे कुरुक्षेत्र पहुँचे, जहाँ भीम और दुर्योधन का अंतिम गदा-युद्ध चल रहा था। उन्हें शांत करने का प्रयास करने के बाद, वे वापस अपनी राजधानी द्वारका लौट आए।
श्रीमद्भागवत की यह कथा हमें अत्यंत महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य सिखाती है:
- विद्या ददाति विनयं: सच्चा ज्ञान मनुष्य को विनम्र (Humble) बनाता है। यदि कोई बहुत बड़ा डिग्री-धारी या धर्मशास्त्रों का ज्ञाता है, परंतु उसमें बड़ों का आदर करने की नम्रता नहीं है, तो उसका वह ज्ञान 'रोमहर्षण' की भांति उसी के पतन का कारण बन जाता है।
- परमात्मा से कुछ नहीं छिपता: आप समाज को अपने बाहरी आचरण से धोखा दे सकते हैं (जैसे रोमहर्षण व्यास-आसन पर बैठकर महान दिखता था), परंतु ईश्वर आपके हृदय में छिपे अहंकार को देख लेते हैं।
- बल और धर्म का संतुलन: बलराम जी ने अपने 'हल' का उपयोग धर्म की रक्षा (राक्षस वध) के लिए किया, और 'तीर्थयात्रा' का उपयोग शांति और आत्मशुद्धि के लिए। यही बल का सही उपयोग है।

