समय निरंतर बहता है, लेकिन कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें युगों का समय भी मिटा नहीं सकता। जब भगवान श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में वृंदावन छोड़ा था, तो उन्होंने गोपियों और नंद बाबा से वादा किया था कि वे लौटकर आएँगे। परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। मथुरा, फिर द्वारका की स्थापना, रुक्मिणी हरण, जरासंध वध— दशकों बीत गए। कृष्ण अब केवल एक ग्वाले नहीं, बल्कि आर्यावर्त के सबसे बड़े 'राजनेता' और 'द्वारकाधीश' बन चुके थे। उनके पास असीमित सेना, रानियाँ और ऐश्वर्य था। दूसरी ओर वृंदावन में गोपियाँ, नंद बाबा और यशोदा मैया आज भी उसी 'कन्हैया' के विरह में आँसू बहा रहे थे। दशकों की यह तपस्या तब पूरी हुई, जब एक खगोलीय घटना ने 'द्वारका' और 'वृंदावन' को कुरुक्षेत्र के मैदान में ला खड़ा किया।
ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि एक अत्यंत भयंकर पूर्ण सूर्यग्रहण (Solar Eclipse) लगने वाला है, जो वैसा ही होगा जैसा कल्प के अंत में होता है। ऐसे पवित्र अवसर पर स्नान और दान का अनंत गुना फल मिलता है। यह जानकर संपूर्ण भारतवर्ष के राजा-महाराजा, ऋषि-मुनि और सामान्य जन कुरुक्षेत्र के 'समन्तपञ्चक तीर्थ' की ओर चल पड़े। (यह वही स्थान है जहाँ परशुराम जी ने क्षत्रियों के रक्त से पाँच कुंड भरे थे)।
द्वारका से यदुवंशी (वृष्णि, भोज, अंधक) भी अपने विशाल रथों, हाथियों और चतुरंगिणी सेना के साथ कुरुक्षेत्र पहुँचे। भगवान श्रीकृष्ण, बलराम जी, वसुदेव, देवकी, रुक्मिणी, सत्यभामा और समस्त रानियाँ भी इस यात्रा में शामिल थीं। उनका वैभव और ऐश्वर्य देखकर देवता भी चकित थे।
इधर, वृंदावन में जब नंद बाबा को यह समाचार मिला कि उनके प्राणों से प्रिय कृष्ण कुरुक्षेत्र आ रहे हैं, तो उन्होंने अपने बैलगाड़ियों (छकड़ों) में अपार भेंट की सामग्री भर ली। नंद बाबा, यशोदा मैया, समस्त गोप और कृष्ण के विरह में सूख कर काँटा हो चुकीं गोपियाँ भी कुरुक्षेत्र की ओर दौड़ पड़ीं।
कुरुक्षेत्र के शिविरों में जैसे ही यादवों को पता चला कि वृंदावनवासी आ गए हैं, तो श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव, उग्रसेन सब अपना राजसी वैभव भूलकर दौड़ पड़े।
जब वसुदेव जी ने नंद बाबा को देखा, तो वे दौड़कर उनके गले लग गए। दोनों पिताओं की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी। प्रेम से गला रुंध जाने के कारण वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे। अंततः वसुदेव जी ने रोते हुए कहा— "हे मेरे भाई नंद! आपके इस ऋण को तो मैं अनेक जन्मों में भी नहीं चुका सकता। जब हम कंस के कारागार में लोहे की जंजीरों में जकड़े थे, तब आपने हमारे प्राणों (कृष्ण और बलराम) को अपने बच्चों की तरह पाला। हमारे बच्चे तो आपको ही अपना माता-पिता मानते हैं।"
उधर माता देवकी और रोहिणी भी यशोदा मैया के गले लगकर रो रही थीं। यशोदा मैया की आँखों में वही पुराना वात्सल्य छलक रहा था। देवकी जी ने कहा— "बहन यशोदा! तुमने अपनी छाती का दूध पिलाकर मेरे कृष्ण को जीवन दिया है। कृष्ण तुम्हारा ही पुत्र है।"
इस पूरे महा-मिलन का सबसे रहस्यमयी और भावपूर्ण क्षण वह था, जब गोपियों का सामना भगवान श्रीकृष्ण से हुआ। गोपियों ने कन्हैया को तब देखा था जब वह एक किशोर ग्वाला था, जिसके सिर पर मोरपंख होता था और होंठों पर बाँसुरी।
गोपियों ने जैसे ही भगवान को देखा, उनके प्राण मानो नेत्रों के रास्ते बाहर निकलकर भगवान के चरणों में जा गिरे। वे भगवान को अपने नेत्रों के मार्ग से हृदय में ले गईं और उन्हें कसकर आलिंगन कर लिया। जो योगियों और तपस्वियों को भी ध्यान में प्राप्त नहीं होता, वह गोपियों ने अपने विशुद्ध विरह-प्रेम से प्राप्त कर लिया।
भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि गोपियों का हृदय उनके वियोग में जल रहा है। वे एकांत में गोपियों से मिलने गए। भगवान ने मुस्कुराते हुए उन्हें अपने हृदय से लगा लिया और बोले— "सखियों! क्या तुमने मुझे भुला तो नहीं दिया? मैं जानता हूँ कि मेरे परिजनों (यादवों) की रक्षा के लिए मुझे वृंदावन छोड़ना पड़ा। तुम मेरे विरह में तड़पती रही हो।"
भगवान ने गोपियों के विरह को शांत करने के लिए उन्हें अत्यंत गूढ़ अध्यात्म का उपदेश दिया:
दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.82.44)
भगवान के इन ज्ञानयुक्त वचनों को सुनकर गोपियों का अज्ञान और विरह का ताप नष्ट हो गया। उन्होंने श्रीकृष्ण को परब्रह्म के रूप में पहचाना। फिर भी, उनका प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने भगवान से एक ही प्रार्थना की:
योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः ।
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं
गेहंजुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.82.48)
कुरुक्षेत्र के इस शिविर में पाण्डव और द्रौपदी भी आए हुए थे। स्त्रियों के अंतःपुर (तम्बू) में द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण की अष्ट-पटरानियों (रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि) के बीच अत्यंत सुंदर संवाद हुआ।
द्रौपदी ने आश्चर्य से रुक्मिणी जी और अन्य रानियों से पूछा— "हे महारानियों! आप सब इतनी सुंदरी और भाग्यशालिनी हैं। कृपया मुझे बताएं कि भगवान श्रीकृष्ण ने आप सभी से किस प्रकार विवाह किया?"
तब रुक्मिणी जी ने बताया कि कैसे भगवान ने जरासंध आदि को हराकर उनका हरण किया। सत्यभामा ने स्यमंतक मणि की कथा सुनाई। जाम्बवती ने जामवंत जी के युद्ध का वर्णन किया। अष्ट-पटरानियों और 16,100 रानियों ने अपने-अपने विवाह की कथा सुनाते हुए कहा— "हे द्रौपदी! हम केवल श्रीकृष्ण के चरणों की दासियाँ हैं। परंतु हम आश्चर्यचकित हैं कि इन गोपियों का प्रेम हमसे भी श्रेष्ठ है। इनका विरह और निश्छल भाव देखकर हमारा अहंकार भी पिघल जाता है।"
इस महा-मिलन में भगवान वेदव्यास, नारद, विश्वामित्र, वसिष्ठ, परशुराम और भृगु आदि अनेक महान महर्षि भी पधारे। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आगे बढ़कर उन ऋषियों के चरण धोए और उनका जल अपने सिर पर धारण किया। भगवान ने संसार को यह शिक्षा दी कि चाहे कोई कितना भी बड़ा ईश्वर क्यों न हो, उसे गुरुजनों और ब्राह्मणों (ज्ञानी पुरुषों) का सम्मान अवश्य करना चाहिए।
ऋषियों के उपदेश से प्रेरित होकर, वसुदेव जी ने कुरुक्षेत्र के उसी पवित्र मैदान में एक विशाल 'महायज्ञ' का आयोजन किया। उस यज्ञ में उन्होंने लाखों गायों का दान किया और सभी राजाओं, अतिथियों और वृंदावनवासियों का सत्कार किया। कई महीनों तक यह आनंदोत्सव चलता रहा।
कुरुक्षेत्र का यह महा-मिलन केवल दो परिवारों का मिलन नहीं था, बल्कि यह 'कर्मयोग' (कुरुक्षेत्र), 'ज्ञानयोग' (द्वारका) और 'भक्तियोग' (वृंदावन) का एक ही स्थान पर संगम था। गोपियाँ यह सिद्ध करती हैं कि ईश्वर को पाने के लिए न तो बड़े महलों की आवश्यकता है, न सेनाओं की, और न ही किताबी ज्ञान की; यदि आवश्यकता है, तो केवल 'अनन्य और निश्छल प्रेम' की। गोपियों ने द्वारका के ऐश्वर्य को ठुकरा कर केवल अपने वंशीवाले कन्हैया के रूप को ही अपने हृदय में बसाया, जो प्रेम की पराकाष्ठा है।

