इन्द्रप्रस्थ में धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के दौरान जब भगवान श्रीकृष्ण ने भरी सभा में अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तो वहां उपस्थित कई दुष्ट राजाओं के हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठी। इन्हीं में से एक था शिशुपाल का घनिष्ठ मित्र— शाल्व। शाल्व ने उसी यज्ञमंडप में प्रतिज्ञा की थी कि "मैं इस पूरी पृथ्वी को यादवों से विहीन कर दूँगा।" अपनी इस भयंकर प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए शाल्व ने एक ऐसा मार्ग चुना, जिसने पूरे ब्रह्मांड को संकट में डाल दिया। यह कथा उस उन्नत और भयानक 'सौभ विमान' (UFO जैसी उड़ने वाली नगरी) की है, जिसने अजेय द्वारका पर कहर बरपा दिया था।
अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए शाल्व ने भगवान पशुपतिनाथ (शिव) की अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ की। उसने अन्न-जल त्याग दिया और प्रतिदिन केवल एक मुट्ठी धूल (मिट्टी) खाकर जीवित रहने लगा। उसकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर एक वर्ष पश्चात आशुतोष भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए और बोले— "हे शाल्व! तुम्हारी जो इच्छा हो, मांग लो।"
शाल्व ने भगवान शिव से एक ऐसा अकल्पनीय वरदान मांगा: "हे महादेव! मुझे एक ऐसा 'विमान' (उड़नखटोला/नगर) दीजिये जो देवता, असुर, मनुष्य, गंधर्व या नाग—किसी से भी नष्ट न हो सके। वह विमान मेरी इच्छा के अनुसार कहीं भी जा सके और यदुवंशियों के लिए अत्यंत भयंकर हो।"
भगवान शिव ने 'तथास्तु' कहा और असुरों के महान शिल्पकार 'मय दानव' को आज्ञा दी। मय दानव ने लोहे का एक अत्यंत विशाल, अभेद्य और उड़ने वाला नगर बनाया, जिसका नाम 'सौभ विमान' रखा गया। यह सौभ विमान शाल्व को सौंप दिया गया।
वह 'सौभ विमान' कोई साधारण रथ नहीं था। आज की भाषा में इसे एक अत्यंत उन्नत UFO (Unidentified Flying Object) या 'स्टील्थ एयरक्राफ्ट' (Stealth Aircraft) कहा जा सकता है। वह शाल्व की आज्ञा पाते ही आकाश में उड़ सकता था और उसमें से भयंकर अस्त्रों की वर्षा होती थी। भागवत पुराण में उस विमान की गति और माया का अत्यंत वैज्ञानिक वर्णन किया गया है:
अलातचक्रवद् भ्राम्यद् विमानं तद् अदृश्यत ॥
(श्रीमद्भागवत 10.76.21)
उस विमान की माया ऐसी थी कि कभी वह एक दिखाई देता, कभी अनेक रूप ले लेता, और कभी बिल्कुल अदृश्य (गायब) हो जाता। कोई भी योद्धा यह लक्ष्य नहीं साध पाता था कि सौभ विमान वास्तव में है कहाँ!
उस समय भगवान श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ (पांडवों के पास) में थे। शाल्व ने इसी अवसर का लाभ उठाया और अपने सौभ विमान में बैठकर एक विशाल असुर सेना के साथ द्वारका पर आक्रमण कर दिया। उसने द्वारका के सुंदर उद्यानों, परकोटों और महलों को नष्ट करना शुरू कर दिया। सौभ विमान से बिजली, आग, पत्थर और भयंकर बवंडर बरसने लगे।
द्वारका में हाहाकार मच गया। तब श्रीकृष्ण के पराक्रमी पुत्र प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि और अक्रूर जी आदि यदुवंशी महारथियों ने अपने रथों पर सवार होकर शाल्व का सामना किया। प्रद्युम्न ने अपने अमोघ बाणों से सौभ विमान की माया को काटना शुरू किया। प्रद्युम्न के बाणों से शाल्व का सेनापति 'द्युमान' मारा गया। युद्ध इतना भयंकर था कि 27 दिन और रात तक लगातार चलता रहा। प्रद्युम्न के शरीर पर कई घाव लगे, परंतु वे एक पग भी पीछे नहीं हटे।
इन्द्रप्रस्थ में भगवान श्रीकृष्ण को अपशकुन दिखाई देने लगे थे। वे समझ गए कि द्वारका पर संकट है। वे तुरंत अपने सारथि दारुक के साथ द्वारका पहुँचे। द्वारका की दुर्दशा देखकर भगवान ने अपना 'पांचजन्य' शंख बजाया। शंख की ध्वनि सुनते ही शाल्व के सैनिकों के हृदय कांप उठे।
भगवान श्रीकृष्ण ने शाल्व को युद्ध के लिए ललकारा। शाल्व समझ गया कि वह बल से कृष्ण को नहीं हरा सकता, इसलिए उसने अपनी आसुरी माया का प्रयोग किया। उसने 'मनोवैज्ञानिक युद्ध' (Psychological Warfare) का सहारा लिया।
शाल्व ने अपनी माया से भगवान श्रीकृष्ण के पिता 'वसुदेव जी' का एक नकली (Illusionary) रूप बनाया। वह उस नकली वसुदेव को सौभ विमान से लटकाकर कृष्ण के सामने ले आया और चिल्लाकर बोला— "कृष्ण! देख, मैं तेरे पिता को ले आया हूँ। आज तेरे सामने मैं इसका सिर काटूँगा, बचा सकता है तो बचा ले!" और ऐसा कहते ही उसने उस नकली वसुदेव का सिर तलवार से काट दिया।
यह भागवत का एक अत्यंत रहस्यमयी क्षण था। अपने 'पिता' का कटा हुआ सिर देखकर साक्षात परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण एक क्षण के लिए शोक और मोह में डूब गए! उनकी आँखों में आंसू आ गए।
शुकदेव जी कहते हैं कि यह केवल भगवान की एक 'नर-लीला' (मनुष्य की तरह व्यवहार) थी। भगवान यह दिखाना चाहते थे कि संसार में जब व्यक्ति माया के वशीभूत होता है, तो उसका अज्ञान उसे कितना रुलाता है। लेकिन अगले ही क्षण, भगवान ने अपनी अनंत ज्ञानमयी दृष्टि से देखा कि यह केवल एक इन्द्रजाल (काला जादू) है, वसुदेव जी तो महलों में सुरक्षित हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का क्रोध अब भयंकर रूप ले चुका था। उन्होंने अपने धनुष 'शार्ङ्ग' से बाणों की ऐसी झड़ी लगाई कि सौभ विमान छलनी हो गया। शाल्व ने छिपने का प्रयास किया, परंतु भगवान की दृष्टि से कौन बच सकता है?
भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य गदा (कौमोदकी) उठाई और उस विशाल 'सौभ विमान' पर दे मारी। गदा के प्रहार से वह लोहे का अभेद्य और मायावी नगर चूर-चूर होकर समुद्र में गिर पड़ा। विमान के नष्ट होते ही शाल्व अपनी गदा लेकर कृष्ण की ओर दौड़ा।
शाल्वस्य शिर उत्कृत्य कुण्डलोद्द्योतितं हरिः ॥
(श्रीमद्भागवत 10.77.37)
शाल्व के वध होते ही आकाश से देवताओं ने दुंदुभियां बजाईं और भगवान श्रीकृष्ण पर पुष्पों की वर्षा की। द्वारकावासियों का भय समाप्त हो गया और उन्होंने अपने रक्षक का जयजयकार किया।
यह कथा केवल एक युद्ध का वर्णन नहीं है। शाल्व 'अहंकार' का प्रतीक है, जो केवल धूल (भौतिक इच्छाओं) को खाकर जीवित रहता है। उसका सौभ विमान हमारा 'अस्थिर और चंचल मन' (Monkey Mind) है, जो कभी धरती पर तो कभी आकाश में उड़ता रहता है और दिखाई नहीं देता। शाल्व द्वारा रचित नकली वसुदेव संसार की वह 'माया' (Illusion) है, जो हमें झूठे रिश्तों और भय में रुलाती है। और भगवान का सुदर्शन चक्र वह 'परम ज्ञान' है, जिसके प्रकट होते ही चंचल मन (सौभ) नष्ट हो जाता है और अहंकार (शाल्व) का सिर कट जाता है।

