भरतस्वामी: सामवेद के प्राचीन भाष्यकार, होयसल कालीन विद्वान और वैदिक संगीत के मर्मज्ञ
एक विस्तृत शोधपरक और ऐतिहासिक मीमांसा: सायण से पूर्व की सामवेद व्याख्या परंपरा (The Great Pre-Sayana Commentator of Samaveda)
- 1. प्रस्तावना: सामवेद और उसके व्याख्याता
- 2. जीवन परिचय और काल: होयसल नरेश रामनाथ का संरक्षण
- 3. सामवेद का स्वरूप: गान और संहिता का भेद
- 4. भरतस्वामी का भाष्य: संरचना और शैली
- 5. द्राह्यायण श्रौतसूत्र पर कार्य: कर्मकांड का स्पष्टीकरण
- 6. भरतस्वामी बनाम सायण: एक तुलनात्मक अध्ययन
- 7. पांडुलिपियों की खोज: बर्नैल और माधव शास्त्री
- 8. निष्कर्ष: दक्षिण भारतीय वैदिक परंपरा का स्तम्भ
भारतीय वैदिक वांग्मय में सामवेद (Samaveda) का स्थान अद्वितीय है। गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है—"वेदानां सामवेदोऽस्मि" (वेदों में मैं सामवेद हूँ)। यह वेद देवताओं को प्रसन्न करने वाला 'संगीत' है। परन्तु, सामवेद के मंत्रों का अर्थ और उनका गायन (सामगान) अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। इसे समझने के लिए भाष्यकारों की एक लंबी श्रृंखला रही है।
प्रायः आचार्य सायण (14वीं सदी) को ही वेदों का एकमात्र भाष्यकार मान लिया जाता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा नाम दर्ज है जिसने सायण से लगभग 100 वर्ष पूर्व सामवेद पर एक अत्यंत प्रामाणिक और विद्वतापूर्ण भाष्य लिखा था। वे थे—भरतस्वामी (Bharataswami)। वे दक्षिण भारत के होयसल साम्राज्य के समय के एक महान वैदिक विद्वान थे। उनका कार्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे न केवल संहिता (मंत्र भाग) की व्याख्या करते हैं, बल्कि श्रौतसूत्रों (यज्ञ विधियों) के भी मर्मज्ञ थे।
| पूरा नाम | भरतस्वामी (Bharataswami) |
| काल (Time Period) | 13वीं शताब्दी का उत्तरार्ध (लगभग 1290 - 1300 ई.) |
| संरक्षक राजा | होयसल नरेश रामनाथ (Hoysala King Ramanatha) |
| स्थान | श्रीरंगम (तमिलनाडु) / मैसूर क्षेत्र |
| पिता | नारायण (Narayana) |
| गोत्र | काश्यप गोत्र (Kashyapa Gotra) |
| प्रमुख कृतियाँ | 1. सामवेद-संहिता भाष्य 2. द्राह्यायण श्रौतसूत्र भाष्य |
| शाखा | कौथुम-राणायनीय (Kauthuma-Ranayaniya) |
2. जीवन परिचय और काल: होयसल नरेश रामनाथ का संरक्षण
प्राचीन भारतीय ऋषियों की तरह भरतस्वामी ने भी अपने जीवन के बारे में बहुत कम लिखा है, लेकिन उनके ग्रंथों की पुष्पिकाओं (Colophons) से हमें ठोस ऐतिहासिक जानकारी मिलती है। वे एक उच्च कुलीन ब्राह्मण थे।
काल निर्धारण (Dating)
भरतस्वामी ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि उन्होंने होयसल नरेश रामनाथ (Hoysala King Ramanatha) के शासनकाल में अपना भाष्य रचा। इतिहास के अनुसार, राजा रामनाथ ने **1254 ई. से 1295 ई.** तक शासन किया। वे कन्नड़ क्षेत्र (मैसूर) और तमिल क्षेत्र (श्रीरंगम) दोनों के शासक थे। अतः भरतस्वामी का काल **13वीं शताब्दी का अंत** (1290-1300 ई.) निश्चित होता है।
स्थान: वे श्रीरंगम (कावेरी तट) में निवास करते थे। श्रीरंगम उस समय वैष्णव संप्रदाय और वैदिक शिक्षा का एक महान केंद्र था।
श्रीरङ्गे निवसन् विप्रेः भरतस्वामीति विश्रुतः॥" अर्थ: होयसल नरेश रामनाथ के प्रिय, श्रीरंगम में निवास करने वाले विप्रों (ब्राह्मणों) के बीच 'भरतस्वामी' नाम से विख्यात...
3. सामवेद का स्वरूप: गान और संहिता का भेद
भरतस्वामी के कार्य को समझने के लिए सामवेद की संरचना को समझना आवश्यक है। सामवेद केवल पाठ (Text) नहीं है, वह गान (Singing) है। इसके दो मुख्य भाग हैं:
- आर्चिक (Archika): यह मंत्रों का संग्रह है (जो अधिकतर ऋग्वेद से लिए गए हैं)। इसे 'योनि' (Source) कहा जाता है।
- गान (Gana): यह वह विधि है जिससे मंत्रों को गाया जाता है (ग्रामगेय, अरण्यगेय आदि)।
भरतस्वामी ने मुख्यतः सामवेद-संहिता (आर्चिक भाग) पर भाष्य लिखा। उन्होंने बताया कि ऋग्वेद के मंत्र जब सामवेद में आते हैं, तो उनका विनियोग (Ritual Application) कैसे बदल जाता है और उद्गाता (सामवेद का पुरोहित) उन्हें किस संदर्भ में गाता है।
4. भरतस्वामी का भाष्य: संरचना और शैली
भरतस्वामी की टीका अत्यंत विद्वतापूर्ण और प्रामाणिक है। इसे अक्सर 'भरत-भाष्य' कहा जाता है।
- संक्षिप्तता: सायण की तुलना में उनकी शैली संक्षिप्त है। वे अनावश्यक विस्तार से बचते हैं।
- यज्ञ-परक व्याख्या: उन्होंने स्पष्ट किया कि सामवेद के मंत्रों का मुख्य उद्देश्य सोम-यज्ञों (Soma Sacrifices) में देवताओं को आहूत करना है।
- स्वर-प्रक्रिया: सामवेद में 'स्वर' (Musical Note) ही सब कुछ है। भरतस्वामी ने मंत्रों के स्वरों की विशुद्ध व्याख्या की है। उन्होंने बताया कि किस मंत्र को किस तान (Tune) में गाया जाना चाहिए।
- व्याकरण: वे पाणिनीय व्याकरण का प्रयोग करते हैं, लेकिन केवल वहां जहां अर्थ स्पष्ट करने की आवश्यकता हो।
5. द्राह्यायण श्रौतसूत्र पर कार्य: कर्मकांड का स्पष्टीकरण
केवल संहिता पर भाष्य लिखना पर्याप्त नहीं था। यज्ञ की विधियों को समझने के लिए 'श्रौतसूत्रों' की आवश्यकता होती है। सामवेद की राणायनीय शाखा का प्रमुख श्रौतसूत्र **'द्राह्यायण श्रौतसूत्र'** है।
भरतस्वामी ने इस जटिल ग्रंथ पर भी भाष्य लिखा। यज्ञ में 'सोम रस' कैसे निकाला जाए, 'स्तोत्र' (Stotras) कब गाए जाएं, और 'ऋत्विजों' (Priests) की क्या भूमिका हो—इन सबका निर्धारण भरतस्वामी ने अपनी टीका में किया। यह कार्य सिद्ध करता है कि वे केवल पुस्तकीय विद्वान नहीं थे, बल्कि यज्ञशालाओं के व्यावहारिक ज्ञाता भी थे।
6. भरतस्वामी बनाम सायण: एक तुलनात्मक अध्ययन
सायण (14वीं सदी) भरतस्वामी के बाद आए। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि सायण ने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के कार्यों का अवलोकन किया था।
| विषय | भरतस्वामी (13वीं सदी) | सायणाचार्य (14वीं सदी) |
|---|---|---|
| काल | पूर्वगामी (Predecessor) | अनुगामी (Successor) |
| शैली | सूत्रवत और संक्षिप्त। | विस्तृत और कथा-प्रधान। |
| आधार | होयसल कालीन परंपरा। | विजयनगर कालीन परंपरा। |
| व्याप्ति | मुख्यतः सामवेद और उसके सूत्र। | चारों वेद। |
कई विद्वानों (जैसे बर्नैल) का मानना है कि सायण ने सामवेद भाष्य लिखते समय भरतस्वामी के भाष्य से बहुत सहायता ली। जहाँ सायण का अर्थ अस्पष्ट होता है, वहाँ भरतस्वामी का अर्थ अधिक प्राचीन और रूढ़िबद्ध (Traditional) माना जाता है।
7. पांडुलिपियों की खोज: बर्नैल और माधव शास्त्री
लंबे समय तक भरतस्वामी का नाम केवल संदर्भों में मिलता था। 19वीं शताब्दी में प्रसिद्ध प्राच्यविद्याविद ए.सी. बर्नैल (A.C. Burnell) ने तंजौर (तमिलनाडु) के पुस्तकालयों में भरतस्वामी की पांडुलिपियों की खोज की।
बाद में, माधव शास्त्री जैसे भारतीय विद्वानों ने इन पांडुलिपियों का संपादन किया। यह खोज वैदिक अध्ययन के लिए क्रांतिकारी थी, क्योंकि इससे पता चला कि सायण से पहले भी दक्षिण भारत में वेद भाष्य की एक सुदृढ़ परंपरा विद्यमान थी। यह सिद्ध करता है कि 13वीं शताब्दी में जब उत्तर भारत पर आक्रमण हो रहे थे, दक्षिण भारत (होयसल और चोल राज्य) वेदों के संरक्षण का किला बना हुआ था।
8. निष्कर्ष: दक्षिण भारतीय वैदिक परंपरा का स्तम्भ
भरतस्वामी का जीवन और कृतित्व हमें भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय से परिचित कराता है। वे होयसल साम्राज्य की बौद्धिक उपलब्धि के प्रतीक हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि 'संगीत' और 'मोक्ष' अलग नहीं हैं। सामवेद के 'गान' के माध्यम से ईश्वर की आराधना कैसे की जाए, यह उन्होंने अपनी टीका में सिखाया।
आज यदि हम सामवेद के मंत्रों का अर्थ और उनके विनियोग को समझ पा रहे हैं, तो इसमें भरतस्वामी के **'सामवेद भाष्य'** का योगदान अमूल्य है। वे सायण के पूर्वज और वैदिक संगीत के सच्चे संरक्षक के रूप में सदैव याद किए जाएंगे। उनका कार्य हमें स्मरण दिलाता है कि भारत की ज्ञान परंपरा अविच्छिन्न है—एक दीपक से दूसरा दीपक जलता रहा है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- सामवेद संहिता (भरतस्वामी और सायण भाष्य सहित) - वैदिक संशोधन मंडल।
- A.C. Burnell: The Samavidhana Brahmana (Introduction contains details on Bharataswami).
- वैदिक साहित्य का इतिहास - आचार्य बलदेव उपाध्याय।
- History of Indian Philosophy - S.N. Dasgupta.
- होयसल कालीन संस्कृति और साहित्य - ऐतिहासिक शोध पत्र।
