देवराज यज्वा: निघंटु के महान व्याख्याता और वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति के मर्मज्ञ | Devaraja Yajva

Sooraj Krishna Shastri
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देवराज यज्वा: निघंटु (वैदिक कोश) के महान व्याख्याता और शब्द-शास्त्री

देवराज यज्वा: निघंटु के महान व्याख्याता और वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति के मर्मज्ञ

एक विस्तृत शोधपरक और ऐतिहासिक विश्लेषण: यास्क के अधूरे कार्य की पूर्णता और 'निघंटु-निर्वचन' की महत्ता (The Master of Vedic Etymology)

वैदिक साहित्य को समझने के लिए छ: वेदांगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) का ज्ञान अनिवार्य है। इनमें से 'निरुक्त' का कार्य वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति (Etymology) बताना है। निरुक्त के आधारभूत ग्रंथ को 'निघंटु' (Nighantu) कहा जाता है, जो वैदिक शब्दों की एक सूची (List) या कोश (Dictionary) है।

महर्षि यास्क ने निघंटु पर अपना प्रसिद्ध भाष्य 'निरुक्त' लिखा, लेकिन यास्क ने निघंटु के सभी शब्दों की व्याख्या नहीं की। उन्होंने केवल कुछ चुने हुए शब्दों को उदाहरण के रूप में समझाया। शेष हजारों शब्दों का क्या? उन शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ कैसे जाने जाएं?

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए 12वीं-13वीं शताब्दी में एक महान विद्वान का उदय हुआ—देवराज यज्वा (Devaraja Yajva)। उन्होंने निघंटु के एक-एक शब्द की विस्तृत व्याख्या करते हुए 'निघंटु-निर्वचन' (Nighantu Nirvachana) नामक ग्रंथ लिखा। देवराज यज्वा का कार्य इसलिए अद्वितीय है क्योंकि उन्होंने वैदिक शब्दों के अर्थ को केवल अनुमान पर नहीं, बल्कि ठोस व्याकरणिक और व्युत्पत्ति-शास्त्र (Philology) के आधार पर सिद्ध किया।

📌 देवराज यज्वा: एक ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम देवराज यज्वा (Devaraja Yajva)
पिता यज्ञेश्वर (Yajneshwara)
दादा (पितामह) देवराज (Devaraja)
काल (Time Period) 12वीं - 14वीं शताब्दी (विद्वानों में मतभेद, संभवतः सायण के समकालीन या पूर्व)
स्थान दक्षिण भारत (संभवतः केरल या तमिलनाडु)
प्रमुख कृति निघंटु निर्वचन (निघंटु भाष्य)
विषय वैदिक कोश और शब्द-व्युत्पत्ति (Etymology)
आधुनिक प्रकाशन बिब्लियोथिका इंडिका (Bibliotheca Indica), एशियाटिक सोसाइटी

2. जीवन परिचय और काल: दक्षिण भारत के वैदिक विद्वान

देवराज यज्वा के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जानकारी उनके ग्रंथ की प्रस्तावना से मिलती है। वे एक अत्यंत प्रतिष्ठित वैदिक परिवार से थे।

वंश और नाम: उनके पिता का नाम यज्ञेश्वर था और उनके दादा का नाम भी देवराज था। भारतीय परंपरा में अक्सर पोते का नाम दादा के नाम पर रखा जाता है। 'यज्वा' उपाधि सूचित करती है कि वे सोम-यज्ञ करने वाले याज्ञिक थे।

स्थान: उनकी व्याख्या शैली और उद्धरणों से स्पष्ट है कि वे दक्षिण भारत के थे। वेदों की व्याख्या की जो परंपरा स्कंदस्वामी और माधव ने दक्षिण में स्थापित की थी, देवराज उसी परंपरा के वाहक थे।

काल निर्धारण: उनका काल निश्चित करना कठिन है, लेकिन उन्होंने अपने ग्रंथ में स्कंदस्वामी, माधव और उव्वट का उल्लेख किया है, जिससे सिद्ध होता है कि वे 11वीं सदी के बाद हुए। दूसरी ओर, सायण (14वीं सदी) ने उनका उल्लेख नहीं किया है, लेकिन देवराज की शैली सायण से मिलती-जुलती है। अधिकांश विद्वान उन्हें 12वीं से 14वीं सदी के बीच का मानते हैं।

3. निघंटु क्या है? (वैदिक शब्दों का विश्वकोश)

देवराज यज्वा के कार्य को समझने के लिए, हमें उस मूल ग्रंथ को समझना होगा जिस पर उन्होंने काम किया—निघंटु। यह विश्व का सबसे पुराना उपलब्ध शब्दकोश (Glossary) है। इसमें वैदिक शब्दों को तीन कांडों (खंडों) में बांटा गया है:

  1. नैघण्टुक काण्ड (Naighantuka Kanda): पर्यायवाची शब्दों का संग्रह। (जैसे, पृथ्वी के 21 नाम, सोने के 15 नाम आदि)।
  2. नैगम काण्ड (Naigama Kanda): अनेकार्थी और कठिन शब्द (Homonyms)। वे शब्द जिनका अर्थ स्पष्ट नहीं है।
  3. दैवत काण्ड (Daivata Kanda): देवताओं के नाम और उनका वर्गीकरण (पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक के देवता)।

कुल मिलाकर निघंटु में लगभग 1770 शब्द हैं। यास्क मुनि ने इन शब्दों की व्याख्या के लिए 'निरुक्त' लिखा, लेकिन उन्होंने सभी शब्दों को नहीं समझाया। जो शब्द यास्क ने छोड़ दिए, वे 'अनाथ' जैसे रह गए थे। देवराज यज्वा ने उन सभी शब्दों को 'सनाथ' किया।

4. 'निघंटु-निर्वचन': देवराज यज्वा का महाग्रंथ

देवराज यज्वा की कृति 'निघंटु-निर्वचन' (जिसे 'निघंटु भाष्य' भी कहते हैं) एक विशाल ग्रंथ है। इस ग्रंथ का उद्देश्य निघंटु में आए प्रत्येक शब्द की व्युत्पत्ति (Derivation) बताना है।

ग्रंथ की प्रतिज्ञा

अपनी भूमिका में देवराज लिखते हैं:
"निघण्टु-समाम्नायेषु येषां पदानां निरुक्त-भाष्ये निर्वचनं न कृतम्, तेषामत्र क्रियते।"
अर्थात: निघंटु की सूची में जिन पदों का निर्वचन (व्युत्पत्ति) निरुक्त भाष्य (यास्क) में नहीं किया गया है, उनका निर्वचन मैं यहाँ कर रहा हूँ।

यह एक बहुत साहसी कदम था। हजारों साल पुराने शब्दों का, जिनका प्रयोग लोक-भाषा में बंद हो चुका था, उनका अर्थ निकालना और व्याकरण से सिद्ध करना एक महान बौद्धिक उपलब्धि थी।

5. व्याख्या पद्धति: निरुक्त और व्याकरण का संगम

देवराज यज्वा की व्याख्या पद्धति अत्यंत वैज्ञानिक और व्यवस्थित है। वे किसी शब्द की व्याख्या तीन चरणों में करते हैं:

  • 1. धातु (Root) की पहचान: सबसे पहले वे बताते हैं कि यह शब्द किस 'धातु' (Verb Root) से बना है। (जैसे, 'अग्नि' शब्द 'अग्' धातु से बना है)।
  • 2. प्रत्यय (Suffix): फिर वे पाणिनि के उणादि सूत्रों का हवाला देकर बताते हैं कि कौन सा प्रत्यय लगने से यह शब्द बना।
  • 3. अर्थ और प्रमाण: अंत में, वे उस शब्द का अर्थ बताते हैं और वेद मंत्रों से उदाहरण (Citation) देते हैं जहाँ वह शब्द प्रयोग हुआ है।

उदाहरण के लिए, 'गौ' (Gau) शब्द के निघंटु में कई अर्थ हैं—पृथ्वी, किरण, वाणी, गाय आदि। देवराज यज्वा संदर्भ सहित बताते हैं कि किस मंत्र में 'गौ' का अर्थ 'पृथ्वी' है और किसमें 'किरण'।

6. यास्क और देवराज: एक तुलनात्मक अध्ययन

यास्क (7वीं सदी ई.पू.) और देवराज (12वीं सदी ई.) के बीच लगभग 2000 वर्षों का अंतर है, लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही था।

विषय यास्क (निरुक्त) देवराज (निघंटु निर्वचन)
दृष्टिकोण सैद्धांतिक (Theoretical) - वे सिद्धांत बताते हैं। व्यावहारिक (Applied) - वे हर शब्द पर सिद्धांत लागू करते हैं।
व्याप्ति चयनात्मक (Selective) - केवल उदाहरण देते हैं। सम्पूर्ण (Exhaustive) - पूरी सूची की व्याख्या करते हैं।
शैली संवादात्मक और दार्शनिक। कोशपरक (Lexicographical) और व्याकरणिक।
स्वतंत्रता स्वतंत्र चिंतक। यास्क और पाणिनि के अनुयायी।

देवराज यज्वा ने यास्क का विरोध नहीं किया, बल्कि उनके कार्य को **"परिपूरित"** (Supplemented) किया। जहाँ यास्क मौन थे, वहाँ देवराज बोले।

7. उद्धरण और स्रोत: लुप्त ग्रंथों की जानकारी

देवराज यज्वा के ग्रंथ का एक और बड़ा ऐतिहासिक महत्व है। उन्होंने अपने भाष्य में कई ऐसे प्राचीन आचार्यों और ग्रंथों का उल्लेख किया है जो अब लुप्त हो चुके हैं या बहुत कम मिलते हैं।

  • स्कंदस्वामी: ऋग्वेद के भाष्यकार। देवराज इनका बहुतायत से उद्धरण देते हैं।
  • माधव: सामवेद और ऋग्वेद के भाष्यकार।
  • उव्वट: यजुर्वेद भाष्यकार।
  • क्षीरस्वामी: अमरकोश और निरुक्त के टीकाकार।
  • अनिरुक्त व्याख्या: एक ऐसा प्राचीन ग्रंथ जो अब उपलब्ध नहीं है।

इन उद्धरणों के कारण, देवराज का ग्रंथ "वैदिक इतिहास का खजाना" बन जाता है। यह हमें बताता है कि 12वीं सदी में कौन-कौन से ग्रंथ विद्वानों के पास उपलब्ध थे।

8. निष्कर्ष: वैदिक अर्थ-मीमांसा के संरक्षक

देवराज यज्वा का योगदान आधुनिक भाषाविज्ञान (Linguistics) और शब्द-व्युत्पत्ति (Etymology) के लिए अमूल्य है। जब 19वीं सदी में पश्चिमी विद्वानों (जैसे रॉथ और मैक्स मूलर) ने वैदिक कोश बनाना शुरू किया, तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या शब्दों का अर्थ खोजना थी। ऐसे समय में, देवराज यज्वा का 'निघंटु-निर्वचन' उनके लिए एक 'रोसेटा स्टोन' (Rosetta Stone) साबित हुआ।

देवराज यज्वा ने सिद्ध किया कि वैदिक शब्द कोई "जादुई मंत्र" नहीं हैं जिनका अर्थ न समझा जा सके, बल्कि वे एक सुव्यवस्थित भाषा का हिस्सा हैं जिसे व्याकरण और निरुक्त के नियमों से डिकोड (Decode) किया जा सकता है।
वेदों के गंभीर विद्यार्थियों के लिए, निघंटु केवल शब्दों की सूची हो सकती है, लेकिन देवराज यज्वा के भाष्य के साथ वह सूची "बोलने लगती है"। वे वैदिक कोश साहित्य के अप्रतिम संरक्षक हैं।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • निघंटु तथा निरुक्त (देवराज यज्वा की टीका सहित) - लक्ष्मण स्वरूप (संपादक)।
  • Introduction to Nighantu Commentary - Bibliotheca Indica.
  • वैदिक साहित्य और संस्कृति - वाचस्पति गैरोला।
  • History of Sanskrit Literature - A.A. Macdonell.
  • निरुक्त मीमांसा - पंडित युधिष्ठिर मीमांसक।

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