डॉ. किशोर नाथ झा: वैदिक मीमांसा और न्याय दर्शन के अद्भुत समन्वयक
एक अत्यंत विस्तृत, दार्शनिक और ऐतिहासिक विश्लेषण: भारत के वह मूर्धन्य समकालीन आचार्य जिन्होंने 'प्रमाण शास्त्र' (न्याय) और 'वाक्य शास्त्र' (मीमांसा) की जटिल गुत्थियों को सुलझाकर, मिथिला की बौद्धिक परंपरा को आधुनिक युग में पुनर्जीवित किया। (The Living Legend of Nyaya and Mimamsa)
- 1. प्रस्तावना: 'तर्क' और 'श्रद्धा' का दार्शनिक मिलन
- 2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: मिथिला से इलाहाबाद तक
- 3. न्याय और मीमांसा: दो भिन्न धाराओं का परिचय
- 4. डॉ. झा का शोध: वैदिक मीमांसा और न्याय का समन्वय
- 5. 'उदयनाचार्य ग्रंथावली': न्याय-कुसुमांजलि और ईश्वर सिद्धि
- 6. वाचस्पति मिश्र के 'न्यायतत्त्वालोक:' का ऐतिहासिक संपादन
- 7. तंत्र और मीमांसा: 'महाकाल संहिता' का संपादन
- 8. ज्ञानमीमांसा (Epistemology): शब्द-प्रमाण की स्थापना
- 9. निष्कर्ष: प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा के रक्षक
भारतीय दर्शनशास्त्र (Indian Philosophy) के छह प्रमुख आस्तिक स्कूल (षड्दर्शन) हैं। इनमें से दो सबसे जटिल और बौद्धिक रूप से उन्नत स्कूल 'न्याय' (Nyaya - तर्कशास्त्र/Logic) और 'मीमांसा' (Mimamsa - वैदिक अर्थ-निर्णय/Hermeneutics) हैं। ऐतिहासिक रूप से इन दोनों के बीच कई वैचारिक मतभेद रहे हैं। मीमांसक वेदों को 'अपौरुषेय' (बिना किसी रचयिता के) मानते हैं और ईश्वर के बजाय 'कर्म' (यज्ञ) को प्रधानता देते हैं। वहीं, नैयायिक 'ईश्वर' को वेदों का रचयिता और सृष्टि का निर्माता मानते हैं।
इन दोनों परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली धाराओं के बीच 'समन्वय' (Synthesis) स्थापित करने और उनके अत्यंत प्राचीन, लुप्तप्राय ग्रंथों का आधुनिक संपादन करने का भगीरथ कार्य डॉ. किशोर नाथ झा ने किया है। वे भारत के उन गिने-चुने विद्वानों में से हैं जिन्हें नव्य-न्याय की अत्यंत क्लिष्ट पारिभाषिक भाषा (Technical Language of Navya-Nyaya) पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
| पूरा नाम | डॉ. किशोर नाथ झा (Dr. Kishor Nath Jha) |
| जन्म एवं जीवन काल | जन्म: 20वीं सदी का पूर्वार्ध (विशेषतः 1930-40 का दशक)। यह वर्तमान समकालीन युग के वयोवृद्ध और अत्यंत प्रतिष्ठित विद्वान हैं। इनका सक्रिय अकादमिक जीवन 1970 के दशक से लेकर 21वीं सदी के प्रारंभिक दशकों तक प्रखर रूप से जारी रहा है। |
| मूल स्थान | मिथिला (बिहार) - नव्य-न्याय की ऐतिहासिक जन्मभूमि। |
| प्रमुख संस्थान | गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ (इलाहाबाद/प्रयागराज), कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय। |
| अकादमिक पद | पूर्व अध्यक्ष (बिहार राज्य संस्कृत अकादमी), ख्यातिप्राप्त प्राध्यापक एवं निदेशक। |
| महानतम संपादन कार्य | उदयन ग्रंथावली, न्यायतत्त्वालोकः (वाचस्पति मिश्र), महाकाल संहिता (गुह्यकाली खण्ड)। |
| विशेषज्ञता | प्रमाण शास्त्र (तर्क/न्याय), वाक्य शास्त्र (मीमांसा), और तंत्र शास्त्र। |
2. जीवन परिचय एवं काल निर्धारण: मिथिला से इलाहाबाद तक
डॉ. किशोर नाथ झा का जन्म और लालन-पालन बिहार के 'मिथिला' क्षेत्र में हुआ। मिथिला वह पवित्र भूमि है जहाँ गंगेश उपाध्याय जैसे महर्षियों ने 'तत्त्वचिन्तामणि' लिखकर पूरे भारत में नव्य-न्याय (Neo-Logic) की क्रांति ला दी थी। इसी मिट्टी के संस्कार डॉ. झा को जन्म से प्राप्त हुए।
वे 20वीं सदी के उत्तरार्ध के उन प्रमुख विद्वानों में गिने जाते हैं जिन्होंने पारंपरिक 'टोल' (पाठशाला) शिक्षा और आधुनिक विश्वविद्यालय शिक्षा का सेतु तैयार किया। उन्होंने लंबे समय तक गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ (इलाहाबाद) में शोध एवं अध्यापन कार्य किया। अगस्त 2010 में, उनके अकादमिक कद को सम्मानित करते हुए उन्हें बिहार राज्य संस्कृत अकादमी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
3. न्याय और मीमांसा: दो भिन्न धाराओं का परिचय
डॉ. झा के शोध को समझने के लिए पहले यह समझना आवश्यक है कि 'न्याय' और 'मीमांसा' क्या हैं:
- मीमांसा (वाक्य शास्त्र): इसे 'पूर्व मीमांसा' भी कहते हैं (जैमिनि मुनि द्वारा स्थापित)। इसका मुख्य कार्य वेदों के जटिल वाक्यों का सही अर्थ निकालना और यज्ञ-कर्मकांड के नियम तय करना है। मीमांसा मानती है कि वेद 'नित्य' हैं, और 'शब्द' तथा 'अर्थ' का संबंध प्राकृतिक है, किसी ईश्वर का बनाया हुआ नहीं।
- न्याय (प्रमाण शास्त्र): इसे गौतम मुनि ने स्थापित किया। यह सत्य को जानने की 'वैज्ञानिक विधि' (Epistemology) है। न्याय दर्शन मानता है कि ईश्वर ने इस जगत और वेदों को रचा है। न्याय का सारा ज़ोर 'प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द' जैसे प्रमाणों पर है।
4. डॉ. झा का शोध: वैदिक मीमांसा और न्याय का समन्वय
डॉ. किशोर नाथ झा ने अपने ग्रंथों और शोधपत्रों में यह स्थापित किया कि वैदिक ज्ञान को पूर्ण रूप से समझने के लिए एक साधक या विद्वान को 'पद, वाक्य और प्रमाण' तीनों का ज्ञाता होना चाहिए।
डॉ. झा के अनुसार, व्याकरण (पद) शब्द को शुद्ध करता है, मीमांसा (वाक्य) उस शब्द का वैदिक अर्थ निर्धारित करती है, और न्याय (प्रमाण) उस अर्थ की तार्किक सत्यता (Logical Validity) को सिद्ध करता है।
मीमांसक जब बौद्ध दार्शनिकों के तर्कों का सामना करते थे, तो वे न्याय दर्शन के 'अनुमान' (Syllogism) का ही सहारा लेते थे। इसी प्रकार, नैयायिकों को जब वेदों की प्रमाणिकता (Authoritativeness of Veda) सिद्ध करनी होती थी, तो वे मीमांसा के 'आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि' के नियमों का उपयोग करते थे। डॉ. झा ने अपने ग्रंथों में दिखाया कि ये दोनों दर्शन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक (Complementary) हैं।
5. 'उदयनाचार्य ग्रंथावली': न्याय-कुसुमांजलि और ईश्वर सिद्धि
डॉ. किशोर नाथ झा का सबसे महान अकादमिक अवदान 10वीं शताब्दी के महान मैथिल दार्शनिक उदयनाचार्य के ग्रंथों का संपादन है।
उन्होंने "उदयन ग्रंथावली" (Udayan Granthavali) और 'न्यायशास्त्र में आचार्य उदयन का अवदान' नामक पुस्तकें लिखीं। उदयनाचार्य वह व्यक्ति थे जिन्होंने बौद्ध दर्शन के 'ईश्वर-निषेध' (Atheism) को तार्किक रूप से ध्वस्त किया था।
डॉ. झा ने उदयन की प्रसिद्ध रचना 'न्याय-कुसुमांजलि' की अत्यंत सूक्ष्म व्याख्या की। इसमें ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए 9 अकाट्य तर्क दिए गए हैं (जैसे "कार्यात् आयोजन धृत्यादेः..." अर्थात यह ब्रह्मांड एक 'कार्य' है, इसलिए इसका कोई 'कारण' या बनाने वाला अवश्य होगा)। डॉ. झा ने इन प्राचीन तर्कों को आधुनिक संदर्भ में सुलभ बनाया।
6. वाचस्पति मिश्र के 'न्यायतत्त्वालोक:' का ऐतिहासिक संपादन
इंडोलॉजी में डॉ. झा का एक और ऐतिहासिक कार्य है—वाचस्पति मिश्र (द्वितीय) कृत 'न्यायतत्त्वालोक:' (Nyaya Tattva Loka) का संपादन।
यह गौतम मुनि के न्यायसूत्रों पर एक अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन टीका (Commentary) है, जिसकी पांडुलिपियाँ नष्ट हो रही थीं (Old and Rare Book with pin holes)। डॉ. झा ने इस 'पिन-होल' वाली जीर्ण-शीर्ण पांडुलिपि का 650 पृष्ठों का विशाल और शुद्ध संस्कृत संस्करण तैयार किया। इस ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि कैसे मध्यकालीन नैयायिकों ने वेदों (श्रुति) को एक 'ईश्वरीय शब्द-प्रमाण' के रूप में स्थापित किया।
7. तंत्र और मीमांसा: 'महाकाल संहिता' का संपादन
मीमांसा और न्याय के साथ-साथ डॉ. झा की पकड़ 'आगम' (Tantra) पर भी थी। उन्होंने "महाकाल संहिता (गुह्यकाली खण्ड और कामकला खण्ड)" का विशाल संपादन किया।
डॉ. झा ने महाकाल संहिता की भूमिका (Foreword - by G.C. Tripathi) और संपादन में यह प्रमाणित किया कि तंत्र कोई अंधविश्वास या जादू-टोना नहीं है। जिस प्रकार 'मीमांसा' वैदिक यज्ञों का विधान करती है, उसी प्रकार 'तंत्र' आंतरिक योग और प्रतीकात्मक पूजा का विधान करता है। उन्होंने 'नव काली' (Nine manifestations of Kali) के स्वरूप को दार्शनिक और तार्किक रूप से स्पष्ट किया।
8. ज्ञानमीमांसा (Epistemology): शब्द-प्रमाण की स्थापना
डॉ. किशोर नाथ झा का सारा कार्य भारतीय 'ज्ञानमीमांसा' (Theory of Knowledge) पर केंद्रित है। आधुनिक युग में 'शब्द-प्रमाण' (Verbal Testimony) का महत्व बहुत अधिक है, क्योंकि हम जो भी विज्ञान या इतिहास पुस्तकों से सीखते हैं, वह 'शब्द-प्रमाण' ही है।
न्याय दर्शन कहता है कि "आप्तोपदेशः शब्दः" (एक विश्वसनीय और यथार्थ वक्ता का कथन ही शब्द प्रमाण है)। डॉ. झा ने मीमांसा के अर्थ-निर्णय के नियमों—आकांक्षा (Expectancy), योग्यता (Compatibility), और सन्निधि (Proximity)—को नैयायिक चश्मे से विश्लेषित किया और बताया कि कोई भी वाक्य (चाहे वह वेद का हो या किसी आधुनिक विज्ञान की पुस्तक का) तभी सार्थक होता है जब उसमें ये तीनों गुण मौजूद हों।
9. निष्कर्ष: प्राचीन शास्त्रार्थ परंपरा के रक्षक
डॉ. किशोर नाथ झा का जीवन उन महान 'शास्त्रार्थ' (Philosophical Debates) परंपराओं का एक आधुनिक प्रतिबिंब है, जो कभी मिथिला और काशी के घाटों पर गूंजा करती थीं।
उन्होंने सिद्ध किया कि भारतीय दर्शन (चाहे वह न्याय हो या मीमांसा) केवल हवा में की गई कल्पनाएं नहीं हैं, बल्कि ये पश्चिमी लॉजिक (Western Logic) से कहीं अधिक परिष्कृत, विश्लेषणात्मक (Analytical) और गणितीय रूप से सटीक हैं। डॉ. किशोर नाथ झा जैसे विद्वान उस मज़बूत कड़ी (Bridge) के समान हैं, जो हजारों वर्ष पुरानी बौद्धिक संपदा को क्षरित होने से बचाकर उसे आने वाली पीढ़ियों के हाथों में सुरक्षित सौंप रही है।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- न्यायतत्त्वालोकः (Nyaya Tattva Loka) - वाचस्पति मिश्र, संपादन: डॉ. किशोर नाथ झा (Ganganath Jha Kendriya Sanskrit Vidyapeetha)।
- उदयन ग्रंथावली (Udayan Granthavali) - संपादन: डॉ. किशोर नाथ झा।
- न्यायशास्त्र में आचार्य उदयन का अवदान - डॉ. किशोर नाथ झा।
- महाकाल संहिता (गुह्यकाली खण्ड एवं कामकला खण्ड) - संपादन: डॉ. किशोर नाथ झा।
- मीमांसारसपल्वलम् (Mimamsa Rasa Palvalam) - संपादन: डॉ. किशोर नाथ झा।
