डॉ. मंगलदेव शास्त्री: तुलनात्मक भाषाशास्त्र और ऋक्प्रातिशाख्य के महान शोधकर्ता | Dr. Mangaldev Shastri

Sooraj Krishna Shastri
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डॉ. मंगलदेव शास्त्री: तुलनात्मक भाषाशास्त्र और ऋक्प्रातिशाख्य के महान शोधकर्ता

डॉ. मंगलदेव शास्त्री: तुलनात्मक भाषाशास्त्र और ऋक्प्रातिशाख्य के महान शोधकर्ता

वह मूर्धन्य वैदिक विद्वान और शिक्षाविद्, जिन्होंने प्राचीन भारतीय प्रातिशाख्य-विज्ञान (Vedic Phonetics) को पाश्चात्य 'तुलनात्मक भाषाशास्त्र' (Comparative Philology) की वैज्ञानिक कसौटी पर कसकर हिंदी अकादमिक जगत में एक नई क्रान्ति का सूत्रपात किया।

विस्तृत विषय सूची (Table of Contents)

1. प्रस्तावना: प्राच्य विद्या और पाश्चात्य वैज्ञानिक दृष्टि का महासंगम

बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जब भारतीय विद्वान अपनी वैदिक परम्पराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे थे, तब एक ऐसी मेधा की आवश्यकता थी जो प्राचीन संस्कृत व्याकरण (पाणिनि, यास्क, शौनक) का भी प्रकांड विद्वान हो और साथ ही आधुनिक यूरोपीय भाषाविज्ञान (Modern Linguistics) के सिद्धांतों को भी भली-भांति समझता हो। इस ऐतिहासिक आवश्यकता को डॉ. मंगलदेव शास्त्री (Dr. Mangal Deva Shastri) ने पूर्ण किया।

डॉ. मंगलदेव शास्त्री मात्र एक पारंपरिक पंडित नहीं थे; वे ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से दीक्षित एक ऐसे आधुनिक शोधकर्ता (Researcher) थे जिन्होंने संस्कृत के सबसे कठिन और वैज्ञानिक ग्रन्थ 'ऋक्प्रातिशाख्य' (Rgveda-Pratishakhya) का ऐसा समालोचनात्मक संस्करण (Critical Edition) तैयार किया, जिसने पाश्चात्य विद्वानों (जैसे मैक्समूलर और रेग्नियर) के शोध को भी पीछे छोड़ दिया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 'तुलनात्मक भाषाशास्त्र' (Comparative Philology) के जटिल सिद्धांतों को पहली बार अत्यंत प्रामाणिक रूप से हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया।

📌 डॉ. मंगलदेव शास्त्री: एक अकादमिक एवं ऐतिहासिक प्रोफाइल
पूरा नाम डॉ. मंगलदेव शास्त्री (Dr. Mangal Deva Shastri)
काल निर्धारण (Chronology) जन्म: 1890 ई. (बदायूँ, उ.प्र.) – मृत्यु: 1976 ई.
उच्च शिक्षा शास्त्री (गुरुकुल कांगड़ी), डी.फिल. (D.Phil, ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय, यू.के.)
प्रमुख धारित पद प्रधानाचार्य, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी (1937-1958) एवं पूर्व कुलपति, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय
मुख्य शोध क्षेत्र वैदिक ध्वनि-विज्ञान (Phonetics), तुलनात्मक भाषाशास्त्र (Comparative Linguistics), प्रातिशाख्य
सबसे महान कृति ऋग्वेदप्रातिशाख्यम् (उवट भाष्य, अंग्रेजी अनुवाद व टिप्पणियों सहित 3 खण्डों में)
भाषाविज्ञान पर प्रसिद्ध ग्रन्थ तुलनात्मक भाषाशास्त्र अथवा भाषा-विज्ञान (1926)
वैचारिक पृष्ठभूमि आर्य समाज की गुरुकुलीय परम्परा एवं आधुनिक पाश्चात्य वैज्ञानिक शोध-पद्धति का समन्वय

2. जीवन और शिक्षा: गुरुकुल से ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय (D.Phil) तक

डॉ. मंगलदेव शास्त्री का जन्म 1890 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदायूँ ज़िले के एक प्रतिष्ठित आर्य समाजी परिवार में हुआ था। उस समय के रिवाज़ के अनुसार उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू-फारसी के मदरसों में हुई, परन्तु उनके भीतर संस्कृत पढ़ने की तीव्र लालसा थी।

प्रसिद्ध आर्यसमाजी संन्यासी स्वामी दर्शनानन्द जी के प्रभाव से उन्होंने गुरुकुल में प्रवेश लिया और 1909 में 'शास्त्री' की उपाधि प्राप्त की। उनकी मेधा इतनी विलक्षण थी कि वे उच्च शोध के लिए इंग्लैंड गए और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय (Oxford University) से पाश्चात्य भाषाविज्ञान और वैदिक साहित्य में डी.फिल. (D.Phil.) की सर्वोच्च उपाधि प्राप्त की। एक ओर गुरुकुल का कठोर वैदिक 'स्वाध्याय' और दूसरी ओर ऑक्सफ़ोर्ड की 'Critical Research Methodology'— इन दोनों के दुर्लभ संयोग ने उन्हें 20वीं सदी का सबसे प्रामाणिक 'भाषाशास्त्री' बना दिया।

3. 'प्रातिशाख्य' क्या है? वैदिक ध्वनि-विज्ञान का प्राचीनतम शास्त्र

वेदों के ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए प्राचीन महर्षियों ने छः वेदांगों की रचना की थी, जिनमें 'शिक्षा' (Phonetics) और 'व्याकरण' (Grammar) प्रमुख हैं। वेद की प्रत्येक शाखा के उच्चारण (स्वर, मात्रा, बलाघात, सन्धि) के विशिष्ट नियम होते हैं। इन नियमों को जिस शास्त्र में संकलित किया गया, उसे 'प्रातिशाख्य' (Pratishakhya) कहते हैं।

ध्वनि-विज्ञान (Science of Phonetics)

पाश्चात्य विद्वान मानते हैं कि संसार में 'स्वनविज्ञान' (Phonetics) और 'आकारिकी' (Morphology) का सबसे प्राचीन और सबसे वैज्ञानिक अध्ययन भारत के 'प्रातिशाख्यों' में ही हुआ है।

ऋग्वेदप्रातिशाख्य (Rikpratishakhya) महर्षि शौनक द्वारा रचित है (जो शैशिरीय शाखा के अनुयायी थे)। इसमें यह विस्तार से बताया गया है कि वैदिक मन्त्रों की 'संहिता' (continuous text) बनाते समय 'पद-पाठ' (word-by-word text) में कैसे और कहाँ ध्वनि-परिवर्तन (Sandhi), नासिक्यकरण (Nasalization), और स्वर-भक्ति का नियम लागू होता है।

4. ऋक्प्रातिशाख्य का ऐतिहासिक सम्पादन: डॉ. मंगलदेव का 3-खण्डों का महाग्रंथ

डॉ. मंगलदेव शास्त्री से पूर्व, ऋक्प्रातिशाख्य का संस्करण एम. ए. रेग्नियर (M.A. Regnier, 1872) और मैक्समूलर (Max Müller, 1869) ने प्रकाशित किया था। किन्तु पाश्चात्य होने के कारण, वे वैदिक उच्चारण की सूक्ष्मतम गहराइयों और भाष्यकारों (जैसे उवट) के पारिभाषिक शब्दों को पूर्णतः नहीं समझ पाए थे।

डॉ. मंगलदेव शास्त्री ने 'उवट भाष्य' सहित ऋग्वेदप्रातिशाख्य का एक अत्यंत बड़ा, वैज्ञानिक तथा प्रामाणिक अध्ययन तीन खण्डों (3 Volumes) में प्रस्तुत किया (इंडियन प्रेस, इलाहाबाद, 1922-1931):

  • प्रथम खण्ड: इसमें प्रातिशाख्य के सूत्रों को 'कारिका' के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसमें शौनक की भाषा, शैली और रचना-काल पर विस्तृत ऐतिहासिक प्रकाश डाला गया।
  • द्वितीय खण्ड: इसमें ऋग्वेदप्रातिशाख्य के मूल सूत्र और उनके साथ ग्यारहवीं शताब्दी के विद्वान 'उवट' के विस्तृत भाष्य का पाठांतर (Variant readings) सहित प्रामाणिक संपादन किया गया।
  • तृतीय खण्ड: इस खण्ड में डॉ. शास्त्री ने सूत्रों का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद (English Translation) किया और आधुनिक भाषाविज्ञान (Modern Linguistics) की दृष्टि से अत्यंत बहुमूल्य टिप्पणियाँ (Notes) दीं।

5. उवट भाष्य और मैक्समूलर की त्रुटियों का परिमार्जन

डॉ. मंगलदेव शास्त्री के इस संस्करण की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने मैक्समूलर आदि की त्रुटियों का सुधार किया। जहाँ मैक्समूलर ने कई पारिभाषिक शब्दों को 'सामान्य संस्कृत' मानकर गलत अनुवाद कर दिया था, वहीं डॉ. शास्त्री ने प्राचीन 'परम्परा' और आधुनिक 'तुलनात्मक अध्ययन' का सहारा लिया।

उन्होंने अपनी भूमिका में सिद्ध किया कि पाणिनीय व्याकरण का जो विशाल भवन खड़ा है, उसकी नींव प्रातिशाख्यों के ध्वनि-विज्ञान पर ही आधारित है। उन्होंने ऋक्प्रातिशाख्य और वाजसनेयि-प्रातिशाख्य का तुलनात्मक विवेचन भी किया, जिससे स्पष्ट हुआ कि वैदिक ध्वनियों का वर्गीकरण आधुनिक पश्चिमी 'Acoustic Phonetics' से कहीं अधिक सूक्ष्म और दोषरहित है।

6. 'तुलनात्मक भाषाशास्त्र': हिंदी भाषाविज्ञान की आधारशिला

उन्नीसवीं सदी में सर विलियम जोंस, फ्रांज बॉप (Franz Bopp) और मैक्समूलर जैसे विद्वानों ने ग्रीक, लैटिन और संस्कृत की तुलना करके 'तुलनात्मक भाषाशास्त्र' (Comparative Philology) नामक एक नए विज्ञान को जन्म दिया था। किन्तु यह ज्ञान केवल अंग्रेजी और जर्मन भाषाओं तक सीमित था।

सन् 1926 में डॉ. मंगलदेव शास्त्री ने "तुलनात्मक भाषाशास्त्र अथवा भाषा-विज्ञान" नामक एक कालजयी ग्रन्थ हिंदी में लिखा। इस ग्रन्थ के माध्यम से उन्होंने पश्चिमी भाषाविज्ञान (Western Linguistics) की आधुनिकतम प्रणालियों को हिंदी माध्यम के छात्रों और प्राध्यापकों के लिए सुलभ कराया। हिंदी भाषा में 'ध्वनि-विज्ञान' (Phonology), 'रूप-विज्ञान' (Morphology), और 'वाक्य-विज्ञान' (Syntax) की तकनीकी शब्दावली (Terminology) गढ़ने का बहुत बड़ा श्रेय डॉ. शास्त्री को ही जाता है।

7. भाषा की वैज्ञानिक परिभाषा और भाषा-विज्ञान के अंग

भाषा क्या है? इस पर पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों में बहुत मतभेद था। डॉ. मंगलदेव शास्त्री ने अपनी पुस्तक में भाषा की जो सटीक परिभाषा दी, वह आज भी हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों को रटाई जाती है:

"भाषा मनुष्य की उस चेष्टा या व्यापार को कहते हैं, जिससे मनुष्य अपने उच्चारणोपयोगी शरीरावयवों से उच्चारण किए गए वर्णात्मक या व्यक्त शब्दों द्वारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं।"
भाषाविज्ञान के प्रकार (Types of Linguistics)

डॉ. शास्त्री ने भाषाविज्ञान के अध्ययन को अत्यंत व्यवस्थित रूप से वर्गीकृत किया:
1. वर्णनात्मक (Descriptive): किसी एक भाषा के वर्तमान स्वरूप (ध्वनि, शब्द, वाक्य) का विश्लेषण (जैसे पाणिनीय व्याकरण)।
2. ऐतिहासिक (Historical): किसी भाषा के क्रमिक विकास का अध्ययन (प्राचीन रूप से आधुनिक रूप तक)।
3. तुलनात्मक (Comparative): दो या दो से अधिक भाषाओं (जैसे संस्कृत, लैटिन, ग्रीक) की ध्वनियों और व्याकरण की तुलना करके उनके 'मूल-स्रोत' (Proto-language) का पता लगाना।

8. कुलपति और शिक्षाविद्: राजकीय संस्कृत महाविद्यालय का आधुनिकीकरण

डॉ. मंगलदेव शास्त्री केवल एक बंद कमरे के शोधकर्ता नहीं थे। 1937 से 1958 तक वे राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी (Government Sanskrit College, Benares) के प्रधानाचार्य रहे। यह वही ऐतिहासिक संस्थान है जिसकी स्थापना 1791 में जोनाथन डंकन ने की थी।

उनके कार्यकाल में इस संस्था ने अभूतपूर्व अकादमिक प्रगति की। उन्होंने संस्कृत के पारंपरिक पाठयक्रम में 'आधुनिक भाषाविज्ञान', 'पाश्चात्य दर्शन' और 'तुलनात्मक धर्मशास्त्र' को सम्मिलित करवाया। बाद में जब इस महाविद्यालय को विश्वविद्यालय का दर्ज़ा मिला (जो आज सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है), तो वे इसके गौरवशाली उपकुलपति (Vice-Chancellor) भी बने। वे प्रख्यात शोध पत्रिका 'सरस्वती सुषमा' के संपादक मंडल के प्रमुख स्तंभ थे।

9. अन्य प्रमुख साहित्यिक अवदान

डॉ. शास्त्री की कलम से संस्कृत और हिंदी साहित्य को कई अन्य अमूल्य ग्रन्थ प्राप्त हुए:

  • भारतीय संस्कृति का विकास: इस ग्रन्थ में उन्होंने वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक भारतीय चिंतन-धारा के विकास का ऐतिहासिक और दार्शनिक विश्लेषण किया है।
  • प्रबन्ध-प्रकाश (भाग 1 और 2): संस्कृत निबन्ध लेखन और उच्च-स्तरीय अकादमिक लेखन की उत्कृष्ट मार्गदर्शिका।
  • अमृत मन्थन (जीवन का दिव्य पक्ष): दार्शनिक और आध्यात्मिक निबंधों का संग्रह।
  • संस्कृत साहित्य का इतिहास: जिसमें उन्होंने पाश्चात्य 'काल-निर्धारण' (Chronology) की त्रुटियों को सुधारते हुए भारतीय साहित्यों का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत किया।

10. निष्कर्ष: आधुनिक भाषाविज्ञान के भारतीय पुरोधा

डॉ. मंगलदेव शास्त्री का जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन वैदिक ज्ञान और आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।

जहाँ 19वीं सदी के यूरोपीय विद्वान 'संस्कृत' को इंडो-यूरोपीय भाषा-परिवार की जननी मानकर उस पर शोध कर रहे थे, वहीं भारत में डॉ. मंगलदेव शास्त्री ने उस शोध को 'भारतीय दृष्टि' प्रदान की। उनका 'ऋक्प्रातिशाख्य' पर किया गया शोध आज भी वेद-पाठियों और ध्वनि-वैज्ञानिकों (Phoneticians) के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ है। उनकी 'तुलनात्मक भाषाशास्त्र' की पुस्तक ने हिंदी भाषा को वह वैज्ञानिक शब्दावली और वैचारिक आधार दिया, जिसके बिना आधुनिक भारतीय विश्वविद्यालयों में भाषाविज्ञान का अध्ययन संभव ही नहीं था। भारतीय विद्या-जगत उनके इस भगीरथ अकादमिक अवदान के लिए सदैव ऋणी रहेगा।


संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)

  • ऋग्वेदप्रातिशाख्यम् (उवट भाष्य सहित - 3 खण्ड) - डॉ. मंगलदेव शास्त्री, इण्डियन प्रेस लिमिटेड, इलाहाबाद (1922-1931)।
  • तुलनात्मक भाषाशास्त्र अथवा भाषा-विज्ञान - डॉ. मंगलदेव शास्त्री।
  • भारतीय संस्कृति का विकास - डॉ. मंगलदेव शास्त्री।
  • संस्कृत-वाङ्मय बृहद् इतिहास (वेद खण्ड) - प्रातिशाख्यों के सन्दर्भ।
  • सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक अभिलेखागार।

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