सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव: वैदिक साहित्य के पात्रों और 'चरित्रकोश' के भगीरथ
पद्मश्री से अलंकृत महाराष्ट्र के वह युगप्रवर्तक विद्वान, जिन्होंने वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों और पुराणों में बिखरे हुए सहस्रों ऐतिहासिक पात्रों (Characters) और स्थानों (Places) को 'चरित्रकोश' (Encyclopedia) के रूप में संकलित कर भारतीय इतिहासलेखन को एक अभूतपूर्व वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
- 1. प्रस्तावना: वैदिक पात्रों की ऐतिहासिक भूलभुलैया और एक विश्वकोशीय दृष्टि
- 2. जीवन परिचय: 1894 से 1984 तक की तपस्या और पद्मश्री सम्मान
- 3. 'भारतीय चरित्रकोश मंडल' (पुणे) की ऐतिहासिक स्थापना
- 4. मास्टरपीस: 'भारतवर्षीय प्राचीन चरित्रकोश' (Dictionary of Ancient Indian Biography)
- 5. ऋषियों के नाम-साम्य (Name Ambiguity) का वैज्ञानिक समाधान
- 6. कालक्रम को पूर्णता: मध्ययुगीन और अर्वाचीन चरित्रकोश
- 7. 'प्राचीन भारतीय स्थलकोश': वैदिक भूगोल का प्रामाणिक मानचित्रण
- 8. वेदों और उपनिषदों का मराठी अनुवाद: जनमानस तक श्रुति का प्रसार
- 9. निष्कर्ष: प्राच्य-विद्या (Indology) के आधुनिक व्यास
1. प्रस्तावना: वैदिक पात्रों की ऐतिहासिक भूलभुलैया और एक विश्वकोशीय दृष्टि
भारतीय वैदिक और पौराणिक साहित्य एक असीम महासागर है। ऋग्वेद से लेकर शतपथ ब्राह्मण, 108 उपनिषदों, रामायण, महाभारत और 18 पुराणों में हज़ारों ऋषियों, राजाओं, विदुषियों, और स्थानों का वर्णन आता है। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि भारतीय इतिहास में 'वशिष्ठ', 'विश्वामित्र' या 'व्यास' जैसे नाम किसी एक व्यक्ति के न होकर 'उपाधि' (Title) या 'गोत्र' (Lineage) के रूप में कई पीढ़ियों तक चलते रहे।
इस नाम-साम्य (Name similarity) के कारण पाश्चात्य इतिहासकार अक्सर भ्रमित हो जाते थे और भारतीय इतिहास को 'मिथक' (Myth) कहकर टाल देते थे। इस घोर ऐतिहासिक भूलभुलैया को सुलझाने के लिए एक ऐसी मेधा की आवश्यकता थी जो सम्पूर्ण वाङ्मय का मंथन कर सके। महाराष्ट्र की पुण्यभूमि में जन्मे महामहोपाध्याय सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव (Siddheshwar Shastri Chitrav) ने 'चरित्रकोश' (Biographical Dictionary) के निर्माण का जो भगीरथ प्रयास किया, वह वैश्विक अकादमिक जगत (Indology) में अद्वितीय है।
| पूरा नाम | सिद्धेश्वर शास्त्री विष्णु चित्राव (Siddheshwar Shastri Vishnu Chitrav) |
| काल निर्धारण (Chronology) | 1 फ़रवरी 1894 – 7 जनवरी 1984 |
| कर्मभूमि | पुणे, महाराष्ट्र (भारत) |
| संस्थागत योगदान | संस्थापक: भारतीय चरित्रकोश मंडल (पुणे) |
| महानतम कृति | भारतवर्षीय प्राचीन चरित्रकोश (Dictionary of Ancient Indian Biography - 1932) |
| अन्य प्रमुख ग्रन्थ | प्राचीन भारतीय स्थलकोश, मध्ययुगीन चरित्रकोश, अर्वाचीन चरित्रकोश |
| अनुवाद कार्य | ऋग्वेद, अथर्ववेद और अनेक उपनिषदों का सुबोध 'मराठी अनुवाद' |
| राष्ट्रीय सम्मान | पद्मश्री (Padma Shri) - भारत सरकार द्वारा 1970 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में |
2. जीवन परिचय: 1894 से 1984 तक की तपस्या और पद्मश्री सम्मान
सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव का जन्म 1 फ़रवरी 1894 को हुआ था। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन वैदिक विद्या के अध्ययन और पुणे (Pune) के अकादमिक जगत को समर्पित कर दिया। उनकी शास्त्रीय शिक्षा नितांत परम्परागत थी, परन्तु उनका दृष्टिकोण 'पाश्चात्य एन्साइक्लोपीडिया' (Western Encyclopedic Method) के समान अत्यंत तार्किक, वर्गीकरणात्मक (Categorical) और वैज्ञानिक था।
उनका जीवन एक सच्चे तपस्वी का जीवन था। 1970 में जब भारत सरकार ने उन्हें उनके इस अकल्पनीय और एकाकी बौद्धिक परिश्रम के लिए देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' (Padma Shri) से अलंकृत किया, तब तक वे भारतीय संदर्भ-ग्रंथों (Reference Books) की दुनिया के बेताज बादशाह बन चुके थे।
3. 'भारतीय चरित्रकोश मंडल' (पुणे) की ऐतिहासिक स्थापना
यह महसूस करते हुए कि भारतीय इतिहास के पात्रों का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण किसी एक व्यक्ति के बस का कार्य नहीं है (भले ही उन्होंने स्वयं इसका अधिकांश भार उठाया), सिद्धेश्वर शास्त्री जी ने पुणे में 'भारतीय चरित्रकोश मंडल' (Bharatiya Charitrakosh Mandal) की स्थापना की।
इस मंडल का एकमात्र उद्देश्य था— श्रुति, स्मृति, इतिहास (रामायण-महाभारत) और पुराणों से जानकारी एकत्र करके उन्हें अकारादि क्रम (Alphabetical Order) में सजाना। इस मंडल के तत्वावधान में प्रकाशित कोषों ने आज भी संस्कृत शोधकर्ताओं, लेखकों और इतिहासकारों के लिए "प्राथमिक स्रोत" (Primary Source) का स्थान लिया हुआ है।
4. मास्टरपीस: 'भारतवर्षीय प्राचीन चरित्रकोश' (Dictionary of Ancient Indian Biography)
सन 1932 में जब सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव का 'भारतवर्षीय प्राचीन चरित्रकोश' प्रकाशित हुआ, तो अकादमिक जगत में एक भूचाल आ गया। यह कोई सामान्य शब्दकोश (Dictionary) नहीं था; यह प्राचीन भारत का 'Who's Who' (कौन क्या था) था।
- अकारादि क्रम (Alphabetical Indexing): अ से ज्ञ तक प्रत्येक वैदिक ऋषि, देवता, राजा, महारानी, असुर, और दार्शनिक का नाम वर्णमाला के क्रम में दिया गया।
- मूल सन्दर्भ (Primary Citations): यदि 'तित्तिरि' ऋषि का नाम आया है, तो चित्राव जी ने स्पष्ट लिखा कि उनका उल्लेख महाभारत (सभापर्व 4.12) में कहाँ है, और तैत्तिरीय शाखा से उनका क्या सम्बन्ध है। इसमें हवा-हवाई बातें नहीं, बल्कि श्लोक और पृष्ठ संख्या (Citations) दर्ज़ थे।
- पात्रों का ऐतिहासिक विकास: उन्होंने दर्शाया कि ऋग्वेद का 'रुद्र' (एक कल्याणकारी लेकिन उग्र देवता) कैसे कालान्तर में पुराणों तक आते-आते 'शिव' या 'महादेव' के रूप में विकसित हो गया।
5. ऋषियों के नाम-साम्य (Name Ambiguity) का वैज्ञानिक समाधान
इस चरित्रकोश का सबसे महानतम योगदान 'नामों की गुत्थी' सुलझाना था।
उदाहरण के लिए, 'विश्वामित्र'। पुराणों में एक विश्वामित्र वह हैं जो त्रिशंकु को स्वर्ग भेजते हैं, एक वह हैं जो राम के गुरु हैं, और एक ऋग्वेद के तीसरे मंडल के दृष्टा हैं। सिद्धेश्वर शास्त्री ने अपनी तीक्ष्ण ऐतिहासिक दृष्टि से 'वंश-वृक्ष' (Genealogy) का निर्माण किया और स्पष्ट किया कि 'विश्वामित्र' एक गोत्र है। उन्होंने अपने कोश में विश्वामित्र प्रथम, द्वितीय, तृतीय करके उनके काल (Timeline) और उनके द्वारा रचित ग्रंथों को अलग-अलग श्रेणीबद्ध किया। इसी प्रकार 'वशिष्ठ' और 'व्यास' (कृष्ण द्वैपायन व्यास और अन्य 28 व्यास) के भेदों को वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट किया।
6. कालक्रम को पूर्णता: मध्ययुगीन और अर्वाचीन चरित्रकोश
चित्राव शास्त्री केवल प्राचीन काल पर ही नहीं रुके। उन्होंने सम्पूर्ण भारतीय इतिहास को 3 खण्डों में बाँधने का महासंकल्प लिया:
- प्राचीन चरित्रकोश (Prachin): श्रुति काल से लेकर 11वीं सदी (महमूद गजनवी के आक्रमण) तक के पात्र।
- मध्ययुगीन चरित्रकोश (Madhyayugin - 1937): 11वीं सदी से लेकर 18वीं सदी (पेशवाओं के पतन) तक के ऐतिहासिक शूरवीर, भक्तिकाल के संत (कबीर, तुलसी, ज्ञानेश्वर), और मुग़ल/मराठा शासक।
- अर्वाचीन चरित्रकोश (Arvachin - 1946): 1818 ई. (ब्रिटिश शासन की स्थापना) से लेकर 1945 तक के स्वाधीनता सेनानियों, साहित्यकारों और आधुनिक नेताओं का प्रामाणिक चरित्र-चित्रण।
यह "त्रयी कोष" (Tri-encyclopedia) सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव को आधुनिक भारत का 'सुश्रुत' या 'पाणिनि' बनाता है जिन्होंने इतिहास के 'कंकाल' (Skeleton) को सहेजने का कार्य किया।
7. 'प्राचीन भारतीय स्थलकोश': वैदिक भूगोल का प्रामाणिक मानचित्रण
पात्रों के बाद, इतिहास को प्रमाणित करने के लिए 'भूगोल' (Geography) सबसे आवश्यक होता है। सिद्धेश्वर शास्त्री ने "प्राचीन भारतीय स्थलकोश" (Prachin Bharatiya Sthalakosh - 1969) की रचना की।
इस 800 पन्नों के महाग्रंथ में उन्होंने ऋग्वेद में उल्लिखित 'सप्त-सिन्धु' की नदियों, महाभारत काल के 'कुरुजांगल', 'पांचाल', 'मद्र', 'काम्बोज' आदि राज्यों की आधुनिक भौगोलिक स्थिति (Modern Locations) को रेखांकित किया।
यदि कोई शोधकर्ता यह जानना चाहता है कि कालिदास के मेघदूत में वर्णित 'रामगिरि' वर्तमान में कहाँ है, या अथर्ववेद का 'गांधार' प्रदेश आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान के किस हिस्से में था, तो चित्राव जी का 'स्थलकोश' इसका सबसे प्रामाणिक उत्तर देता है। यह ग्रन्थ आज भी ASI (Archaeological Survey of India) के शोधार्थियों के लिए एक 'गाइडबुक' है।
8. वेदों और उपनिषदों का मराठी अनुवाद: जनमानस तक श्रुति का प्रसार
अपने कोष-निर्माण के ऐतिहासिक कार्य के अतिरिक्त, सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव मराठी साहित्य (Marathi Literature) के एक बड़े आधार-स्तंभ थे। वे मानते थे कि जब तक ज्ञान केवल संस्कृत में बंद रहेगा, तब तक वह समाज के निचले तबके तक नहीं पहुँच सकता।
उन्होंने ऋग्वेद, अथर्ववेद और प्रमुख उपनिषदों का अत्यंत प्रामाणिक और सुबोध 'मराठी अनुवाद' किया। उनका अनुवाद केवल शाब्दिक नहीं था, बल्कि उसमें सायण भाष्य और पाश्चात्य समीक्षा (विट्जेल, मैक्समूलर की तरह) का तुलनात्मक अध्ययन (Comparative notes) भी शामिल था। इससे महाराष्ट्र में वैदिक स्वाध्याय की एक नई क्रान्ति का जन्म हुआ।
9. निष्कर्ष: प्राच्य-विद्या (Indology) के आधुनिक व्यास
जिस प्रकार महर्षि वेदव्यास ने बिखरे हुए वैदिक ज्ञान को चार संहिताओं में संकलित किया था, ठीक उसी प्रकार 20वीं सदी में सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव ने हज़ारों वर्षों के बिखरे हुए भारतीय पात्रों, नायकों, और भौगोलिक स्थानों को अपने 'चरित्रकोश' के पन्नों में চিরस्थायी (अमर) कर दिया।
आज जब हम इंटरनेट पर क्लिक करते ही किसी प्राचीन ऋषि या देवता की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस जानकारी के मूल स्रोत (Primary Database) को 100 वर्ष पूर्व पुणे के इस महान 'पद्मश्री' विद्वान ने लालटेन की रोशनी में हज़ारों पांडुलिपियों को पढ़कर तैयार किया था। सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव का नाम 'इतिहासलेखन' और 'कोष-निर्माण' (Lexicography) के क्षेत्र में सदैव ध्रुव तारे के समान अटल रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ एवं अनुशंसित पठन (References)
- भारतवर्षीय प्राचीन चरित्रकोश - सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव (भारतीय चरित्रकोश मंडल, पुणे, 1932/1964)।
- प्राचीन भारतीय स्थलकोश (खण्ड 1) - सिद्धेश्वर शास्त्री चित्राव (1969)।
- भारतवर्षीय अर्वाचीन एवं मध्ययुगीन चरित्रकोश।
- ऋग्वेद का मराठी अनुवाद - सि. शा. चित्राव।
- पद्मश्री सम्मान अभिलेखागार (भारत सरकार, 1970)।
